भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

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[ ५६ ] उद्देश्य को उपस्थित करने में कभी नहीं चूकते थे। स्वामी जी ने अपने यौवनकाल में घोर तपस्या की थी और कई योग की सिद्धियां भी प्राप्त करली थी। उदाहरणतः वे साल में पूरा एक महीना पृथ्वी के नीचे दब कर समाधि लगाया करते थे। बाजीरावो की तरह उन्होंने भी भारत के सारे तीर्थों का भ्रमण किया था जिसके परिणामस्वरूप वे हिन्दुओं की पराधीनता और राजनैतिक गुलामी को अनुभव करके बड़े दुखी हुये। यद्यपि उनमें देशभक्ति की अग्नि प्रज्वलित थी तो भी उसको प्रचण्डरूप में प्रज्वलित करने के लिये एक और चिनगारी की आवश्यकता थी। जंजीरा के मुसलमान शासकों ने उनकी इस देशभक्ति को प्रचण्ड करने के लिये यह चिनगारी फेंकी। सिद्दी महाराष्ट्र राज्य के कट्टर शत्रु थे। उन्हें पता था कि यदि मरहठे इसी प्रकार प्रतिदिन सशक्त होते गये तो उनका कोंकण पर से अधिकार छिन जायेगा। इसी कारण वे मरहठों के विरुद्ध अग्रेजों, डचों तथा पुर्तगेजों की सहायता किया करतेथे और प्रायः वे मरहठों के प्रदेशों पर आक्रमण भी करते रहते थे। वे इतने पर ही सन्तोष न करते थे किन्तु बड़ी निर्दयता के साथ — जोकि धर्मांध मुसलमानों की एक विशेषता है— सैकड़ों ही बालकों और बालिकाओं को उठा कर ले जाया करते थे और उन्हें ज़बर्दस्ती मुसलमान बना लेते थे। हिन्दुओं के मन्दिरों को मिट्टी में मिला देते थे और इसी प्रकार से हिन्दुओं पर असह्य अत्याचार करते रहते थे। परशुराम का तीर्थ भी इन कट्टर-धर्मियों के हाथों से सुरक्षित न रह सका। यह स्थान स्वामी जी को बड़ा प्रिय था। इस पवित्र भूमि पर स्वामी जी योग और तपस्या किया करते थे। सिद्दी ने इस मन्दिर को गिरा दिया। इसकी सारी सम्पत्ति लूट ली और ब्राह्मणों को अत्यन्त कष्ट दिये। इस क्रूरतापूर्ण घटना ने स्वामी जी के मन में कभी भी न बुझने वाली क्रोधाग्नि प्रज्वलित कर दी। इस प्रकार उनके जीवन से अच्छे-बुरे सबके प्रति समदृष्टि का भाव — जोकि प्रत्येक हिन्दु साधु की सम्पत्ति है और