भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

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पृष्ठ 60

[ ६० ] जिस पर सब को आरूढ़ रहना होता है—एकदम लुप्त हो गई। परिणामतः उन्होंने अपना सारा जीवन हिन्दुओं की स्वतन्त्रता के युद्ध के उद्देश्य तथा उसकी वृद्धि के लिये अर्पण करने का दृढ़ निश्चय कर लिया। स्वामी जी का इतना अधिक प्रभाव था कि सिद्दी उनको अपना पक्का दुश्मन बनाने का साहस न रखता है अतः उनसे प्रार्थना की कि आप अब भी तीर्थ में रह सकते हैं, आपको अब किसी प्रकार की पीड़ा नहीं पहुँचाई जायगी। परन्तु स्वामी जी ने इसका यों कड़ा उत्तर दिया—"तुमने हिन्दू देवताओं और ब्राह्मणों पर अत्याचार किये हैं। अब वह भी उसी प्रकार से बदला लेकर तुम्हारा नाश करेंगे"। आंगरे ने भी उन्हें सान्त्वना देनी चाही और उन्हें कोंकण में ही रहने के लिये प्रार्थना की—पर उन्होंने उत्तर दिया—'नहीं' मैं उस स्थान का एक जल-बिन्दु भी ग्रहण न करूंगा जिस पर बेईमान मुसलमानों का राज्य है। मैं कोंकण में अवश्य प्रवेश करूंगा— पर उस समय जब कि मेरे पीछे बदला लेने वाली हिन्दुओं की सेना होगी।" ऐसा कह कर स्वामी जी सितारा को चले गये। तब से वे उन अधर्मी शत्रुओं के विरुद्ध—विशेषकर जंजीरा के सिद्दी और गोआ के पुर्तगेज़ों के विरुद्ध—धार्मिक युद्ध के लिये निरन्तर प्रचार करते रहे। उनका पत्र-व्यवहार आज उपलब्ध है जिसे पढ़ कर साधारण पाठक भी अनुमान कर सकता है कि उन्होंने किस प्रकार पूर्ण उत्साह से मरहठों के हिन्दू-धर्म, और कश्मीर से ले कर रामकुमारी तक हिन्दुओं की राजनैतिक स्वतन्त्रता प्राप्त करने के दृढ़ निश्चय का परिशोषण किया था। स्वामी जी के शिष्यों—शाहू जी और बाजीरावों दोनों का ने शीघ्र ही सिद्दी के अत्याचारों का बदला लेने को दृढ़ निश्चय कर लिया। मरहटा प्रतिनिधियों ने षड्यन्त्र करने आरम्भ कर दिये और वे कोंकण में सिद्दी और साथ ही पुर्तगेज़ों के साथ एक बड़ा युद्ध करने के लिये भूमि तैयार करने में जुट गए। दिल्ली से अरकाट तक उन्हें एक साथ ही कई शक्तियों के साथ संघर्ष करना पड़ रहा था इसलिये वे