हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ६१ ] उचित अवसर की प्रतीक्षा और निरीक्षण करने लगे । उसी समय वहां सिद्दियों में आंतरिक युद्ध छिड़ गया । जिसके फलस्वरूप गद्दी के एक दावेदार ने मराठा सेना से सहायता मांगी । मराठा सेनाधिपति ने झट उसका हाथ पकड़ लिया और शाहू जी को लिख भेजा कि मरहटों की कूटनीति सफल हो गई है । इस अभिलषित समाचार को पा कर शाहू जी को रोमहर्ष हो आया और उन्होंने बाजीराव को लिख भेजा । 'इस पत्र को मत पढ़ो, पहले घोड़े पर सवार हो जाओ, फिर इस पत्र को पढ़ना' । सन् १७३३ में युद्ध आरम्भ हो गया । सह्याद्री से उतर कर मराठा सेनाओं ने तला-घोसला के किले को छीन लिया और मुस- लमानों को पराजित करते हुए सिद्दी के प्रदेशों को भी जीत लिया । तत्पश्चात बाजीराव ने रायगढ़ के किले में आक्रमण करके पुनः उसे अपने आधीन कर लिया । इसी प्रसिद्ध किले पर शिवाजी का सिंहासन था । यहीं पर उनका राज्यतिलक हुआ था । स्वतन्त्रता का युद्ध आरंभ होने के समय से इस पर मुसलमानों का अधिकार रहा था । जब महा- राष्ट्रियों ने अपने राजा की राजधानी के पुनर्लाभ का समाचार सुना तो वे प्रसन्नता से फूले न समाये । इसके साथ साथ मराठों ने समुद्र में भी बहुत सी सफलताएं प्राप्त कीं । मानाजी आंगरे ने सिद्दी के जंगी बेड़े को जंजीरा के समीप बुरी तरह से हरा कर भगा दिया । इस घटना से अंग्रेज भी घबरा उठे और उन्होंने पहले तो सिद्दी को गुप्त रूप से हथियारों और गोला बारूद से सहायता देनी आरम्भ की फिर खुल्लमखुल्ला सहायता देनी आरम्भ कर दी, तथा मरहटों के साथ लड़ने के लिये कप्तान हाल्डेन के नेतृत्व में एक सेना भेजी । परन्तु खांडोजी नरहर, खारडे, मोरे, मोहिते तथा माथुरबाई जैसी देवियों ने उनके विरुद्ध युद्ध आरम्भ कर दिया । अन्ततः सन् १७३६ में चिम्मा जी अप्पा ने रणस्थल में प्रवेश