हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
पृष्ठ 67, कुल 254 में से
संदर्भ में पढ़ें[ ६७ ] गोआ के वायसराय को एक के बाद दूसरे पुर्तगेज़ो-किलों के छिन जाने के समाचार पहुँचने लगे। सिरिगाओं, तारापुर, तथा दहानु के किलों को मरहठों ने अल्प समय में ही अपने अधीन कर लिया और उनकी सेनाओं को यमपुरी पहुँचा दिया । आक्रमणकारियों तथा अभिरक्षकों की धीरतापूर्ण कथा यह सुप्रसिद्ध है । उसे इस छोटी सी पुस्तक में विस्तारपूर्वक वर्णन करने की कोई आवश्यकता दिखाई नहीं देती। मरहठे इस सारे ही युद्ध काल में बड़ी भयंकरता से लड़ते रहे। उसका वर्णन हम एक प्रत्यक्ष साक्षी के मुख से कराते हैं। उसका कथन है—"यहां तक कि बड़े २ अधिकारी भी इस युद्ध में अपने स्थानों पर खड़े होकर लड़ने लग पड़े। अपने प्यारे नेता बाजीराव की धिक्कारों से बचने के लिये वे अपनी जानें हथेली में लेकर रण क्षेत्र में कूद पड़े। उधर पुर्त- गेज़ों की ओर भी एक सेनापति के पीछे दूसरा सेनापति हाथ में तलवार लेकर युद्ध अग्नि में कूदने से न झिझकता था। मरहठे आक्रमण करते पर बड़ी हानि उठाकर उन्हें पीछे हटना पड़ता। वे बार २ हमले करते पर हर समय पीछे धकेल दिये जाते। दोनों ओर का भयंकर नुकसान होने लगा। कई बार तो मरहठों की अपनी सुरंगें ही फट जातीं जिसके कारण उनके सहस्रों सिपाही मारे जाते। पर बदला लेने वाली उस दृढ़-प्रतिज्ञ मरहठा सेना ने हार नहीं मानीं। उन्होंने १८ बार आक्रमण किया। पुर्तगेज़ों ने भी १८ बार ही उन्हें पीछे धकेल दिया। पर हर बार मरहठों का उत्साह बढ़ता ही गया, घटा नहीं। इस प्रकार घेरा पड़ा ही रहा। नादिर शाह आया भी और वापिस भी चला गया पर वह घेरा यों का त्यों ही पड़ा रहा। बसीन पर फिर भी अधिकार न किया जा सका। अंत में चिम्मा जीअप्पा निराश हो गया और क्रुद्ध होकर अपने योद्धाओं को गर्ज कर कहने लगा—"देखो ! मैं अवश्य बसीन के किले में प्रवेश करूंगा। यदि आप मुझे आज जीवित अवस्था में वहां नहीं ले जा सकते तो कल तुम मेरे सिर को अपनी तोपों द्वारा उस किले की दीवार तक फेंक देना ताकि मैं अपने मृत्यु