हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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के उत्कर्प˙ को नहीं देख सकते थे। वे प्रत्यक्ष तथा गुप्त दोनों रीतियों से उसे सहायता भी देते रहे जिससे वह मरहठों के कुचलने में समर्थ हो सकें। लेकिन नादिरशाह को फौरन ही मालूम हो गया कि उसे मई सन् १७३६ ई० मे ऐसी हिन्दू-शक्ति का सामना करना है, जो इससे बिलकुल ही भिन्न है, जिसका सामना सन् ११२०—११२४ के बीच मुहम्मद गजनवी को करना पड़ा था। कूटनीति, राजनीति, देशभक्ति, उत्साह, सैनिक और संगठन शक्ति के साथ-साथ मरहठों में आत्म- बलिदान का सर्वोच्च भाव भी मौजूद था। पर आत्म-बलिदान तथा इसी प्रकार की अन्य चतुराईयां केवल उस अवस्था में ही की जाती थीं जब उन्हें यह विश्वास हो जाता था कि ऐसे बलिदान से मरहठों की अपेक्षा शत्रुओं को ही अधिक हानि होगी। महाराष्ट्र के हिन्दू जब से अपनी मातृ-भूमि, अपने धर्म और जाति के नाम पर उठे थे तब से हर प्रकार से मुसलमानों से श्रेष्ठ सिद्ध हुए थे। उनका दृढ़ विश्वास था कि इन लड़ाइयों से हम भगवान् राम और कृष्ण की इच्छाओं को पूर्ण कर रहे हैं। वे नादिरशाह से नहीं डरते थे। मरहठा राजदूतों और कूटनीतिज्ञों ने बाजीराव को बड़े जोरदार शब्दों में लिखा— “नादिरशाह कोई ईश्वर नहीं है। वह सारी सृष्टि का नाश नहीं कर सकता। वह किसी को अपने से अधिक शक्ति-शाली जान लेने पर अवश्य सन्धि कर लेगा; बल की परीक्षा हो जाने पर ही मित्रता की बात आरम्भ हो सकती है। शान्ति सर्वदा युद्ध के पश्चात् ही होती है। इसलिये मरहठा-सेना को आगे बढ़ने दो। यदि केवल राजपूत और दूसरे हिन्दू आप (बाजीराव) के नेतृत्व में साहस के साथ सामना करें तो बड़े २ कार्य सम्पादन हो सकते हैं। निजाम की सहायता पा लेने पर नादिरशाह लौट जाने वाला पुरुष नहीं है, बल्कि वह सीधे हिन्दू राज्यों पर चढ़ाई कर देगा। सारे हिन्दू राजों महाराजों तथा सवाई जयसिंह बड़ी उत्सुकता से आप (बाजी-