हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ८६ ] मरहठे महान् युद्ध लड़ रहे थे इसलिए उसे निचले दक्षिण का काम अधूरा ही छोड़ आना पड़ा और परिणामतः वह अपनी सेनाओं को भी वापिस ले आया। इसी बीच सन् १७५३ ई० में राघोबा ने अहमदाबाद ले लिया और दिल्ली में मरहठा-प्रभाव का विरोध करने के कारण जाटों से ३० लाख रुपया वसूल किया। इसी समय जोधपुर की गद्दी के लिये राजपूतों में घरेलू झगड़ा खड़ा हो गया। विजयसिंह के मुक़ाबले में रामसिंह ने मरहठों से सहायता की प्रार्थना की जो स्वीकार कर ली गई और दत्ताजी तथा जयप्पा ने स्वयं सेना लेकर सहायता के लिये प्रस्थान किया। इस युद्ध में बड़ा रक्तपात हुआ। ५० हजार की मरहठा सेना ने विजयसिंह को हरा दिया और वह भागकर नागौर चला गया। जयप्पा ने घेरा डाल दिया। लेकिन राजपूतों और मरहठों-यानी हिन्दू-हिन्दू की लड़ाई बालाजी को अच्छी नहीं लगती थी, इसलिये उसने बार बार शिन्डे पर ज़ोर दिया कि राजपूताने में सुलह करा दो और मरहठों के सब से प्रिय कार्य, तीर्थ स्थानों अर्थात् काशी और प्रयाग को मुक्त कराने का काम हाथ में लो। पर उसी समय विजयसिंह ने ऐसा नीचतापूर्ण कार्य किया जिससे महाराष्ट्र भर में सनसनी फैल गई और सुलह होना असम्भव हो गया। आप लोगों को याद होगा कि विजयसिंह के चचा ने पिलाजी गायकवाड़ को अपने खेमे में आमन्त्रित कर मार के डाला था। विजयसिंह ने भी उन्हीं का अनुकरण किया, यद्यपि वह जानता था कि पिलाजी की हत्या का बदला किस बुरी तरह लिया गया था। तीन राजपूत हत्यारे विजय- सिंह के खेमे से भिखारियों का रूप धारण करके निकल कर जयप्पा के खेमे के सामने मरहठा घुड़शाला के पास गिरे हुये चनों को चुनने लगे और ज्यों ही अपने शरीर पर देह पोंछने का एक अंगोछा डाले जयप्पा स्नानकेलिये बाहर निकले, हत्यारे झपटे और उनके शरीर में उन्होंने तलवारें घुसेड़ दीं। जयप्पा को प्राणघातक चोट लगी। दो हत्यारे पकड़े गये और एक भाग गया। राजपूत सेना ने तुरन्त ही निकलकर घबराई