हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ८७ ] हुई और सेनापति हीन मरहठा सेना पर आक्रमण कर दिया, ताकि उसको नष्ट भ्रष्ट कर दिया जाये परन्तु शूरवीर सेनापति के असीम आत्मबल के कारण उनका यह आशा फलवती न हुई। उसने अपनी मृत्यु-शय्या के पास रोते हुए साथियों को एकत्रित करके शत्रुओं का सामना करने के लिये उत्साहित किया। और उन्हें कहा कि स्त्रियों की तरह रोने से पहिले शत्रुओं पर विजय प्राप्त करो। अपने मरते हुये सरदार के इन उत्साहवर्धक वाक्यों ने मरहठा-फ़ौज को क्रोध और जोश से भर दिया। मरहठों ने उन्हें फिर हरा दिया। दूसरे मरहठा सरदार भी शिन्दे की सहायता को दौड़ पड़े। अन्ताजी मानकेश्वर १० हजार सेना लेकर राजपूताने में जा पहुंचा और विजयसिंह के पक्ष- पाती तमाम राजपूतों को उचित दण्ड देने लगा। विवश होकर विजय- सिंह ने रामसिंह का अधिकार मान लिया और सुलह की प्रार्थना की तथा मरहठों को अजमेर एवं अन्याय स्थानों की लड़ाई का खर्च दिया। इसी समय बूंदी के अबोध राजकुमार की विधवा माता ने अपने शत्रुओं के ख़िलाफ़ शिन्दे की सहायता मांगी। दत्ताजी ने उसकी इच्छानु- सार ही वह कार्य सम्पादन किया, जिस पर प्रसन्न होकर राजमाता ने ७५ लाख रुपये शिन्दे को इनाम दिया। १२ सिन्ध की ओर प्रस्थान ☸ फेहून नदम माहोरस गेले लाहोरास जिंकित शेंडे। अरे त्यांनीं अटकेत पात्र धडकत लाविले झेंडे ॥ सरदार पदरचे कसे कुंजर सिंह जसे कुंणि शार्दूल गेंडे ॥—'प्रभाकर' इन्ही दिनों राघोबा दिल्ली में बड़े बड़े काम कर रहा था। उसने गाजीउद्दीन को शाही वजीर बनने में सहायता दी और 'कुरुक्षेत्र' तथा ✵ मरहठों ने माहुर को अपने अधीन करके लाहौर को भी अपने आधिपत्य में ले लिया। तत्पश्चात् अल्प समय में ही अटक तक पहुँच कर अपनी विजय पताका वहां भी फहरा दी। उनके जो सरदार थे, वे सिंहों, व्याघ्रों और गैंडों के समान साहसी और निर्भय थे।