हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
पृष्ठ 88, कुल 254 में से
संदर्भ में पढ़ें'गया' मरहटों को देने के लिये बादशाह को मजबूर किया। वह स्वयं आगे बढ़ा और उसने मथुरा, वृन्दावन, गढ़मुक्तेश्वर, पुष्पवती, पुष्कर और कई हिन्दू तीर्थ-स्थानों पर अधिकार जमा लिया। फिर मरहटों की एक टुकड़ी लेकर बनारस पर चढ़ दौड़ा और उसे भी जीत कर क़ब्ज़े में कर लिया। इस प्रकार हिन्दुओं की एक चिर-अभिलाषा पूर्ण हुई। राघोबा ने बड़े गर्व के साथ पेशवा को लिख भेजा कि उत्तर भारत के लगभग सभी पवित्र नगरों को मुसलिम-पंजे से छीन कर अपने अधिकार में कर लिया गया है। उन स्थानों पर भी—जिन्हें हिन्दू बहुत ही श्रद्धा की दृष्टि से देखते थे मरहटों द्वारा हिन्दुओं की विजय ध्वजा फहराने लगी है। इससे हिन्दुओं की स्वतन्त्रता और हिन्दू-पद-पादशाही के आन्दोलनों की रहनुमाई तथा प्रतिनिधित्व करने का मरहटों का दावा और भी न्याय-पूर्ण हो जाता है। मुग़ल बादशाह ने सोचा कि मरहटे काफ़ी बढ़ चुके हैं इस- लिये अब उनसे युद्ध छेड़ देना चाहिये। नया वज़ीर ग़ाज़ीउद्दीन मरहटों का मित्र था। ज्यों ही उसे पता लगा कि मुग़ल-सम्राट् छिप-छिप कर उसके और मरहटों के विरुद्ध साज़िश कर रहा है, उसने होल्कर को बुलाया। होल्कर ने भी ५० हज़ार सेना के साथ ऐसी आसानी से शाही फ़ौज को भगाया कि बेगमों की रक्षा करने वाला भी वहां कोई न रहा और वे मरहटों के हाथ पड़ गईं। ग़ाज़ीउद्दीन को साथ लिये मरहठा-फ़ौज दिल्ली में जाकर प्रविष्ट हो गई और महलों में जा करके बूढ़े बादशाह को गद्दी से उतार कर आलमगीर द्वितीय—अर्थात् संसार विजयी—नाम से एक नये मनुष्य को गद्दी पर बैठाया। इस नाम के दो बादशाह हुये। पहला आलमगीर औरङ्गज़ेब था। उसने सोचा था कि वह अपने शाही क्रोध की सांस से हिन्दू-जीवन के टिमटिमाते चिराग़ को बुझा दूँगा। अल्लाह की क़सम खाकर उसने उस पर फूँक मारी, पर उसने उसकी दाढ़ी झुलस दी और शीघ्र ही उसने अग्नि ऐसा भयंकर रूप धारण कर