भारतकोश
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हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

'गया' मरहटों को देने के लिये बादशाह को मजबूर किया। वह स्वयं आगे बढ़ा और उसने मथुरा, वृन्दावन, गढ़मुक्तेश्वर, पुष्पवती, पुष्कर और कई हिन्दू तीर्थ-स्थानों पर अधिकार जमा लिया। फिर मरहटों की एक टुकड़ी लेकर बनारस पर चढ़ दौड़ा और उसे भी जीत कर क़ब्ज़े में कर लिया। इस प्रकार हिन्दुओं की एक चिर-अभिलाषा पूर्ण हुई। राघोबा ने बड़े गर्व के साथ पेशवा को लिख भेजा कि उत्तर भारत के लगभग सभी पवित्र नगरों को मुसलिम-पंजे से छीन कर अपने अधिकार में कर लिया गया है। उन स्थानों पर भी—जिन्हें हिन्दू बहुत ही श्रद्धा की दृष्टि से देखते थे मरहटों द्वारा हिन्दुओं की विजय ध्वजा फहराने लगी है। इससे हिन्दुओं की स्वतन्त्रता और हिन्दू-पद-पादशाही के आन्दोलनों की रहनुमाई तथा प्रतिनिधित्व करने का मरहटों का दावा और भी न्याय-पूर्ण हो जाता है। मुग़ल बादशाह ने सोचा कि मरहटे काफ़ी बढ़ चुके हैं इस- लिये अब उनसे युद्ध छेड़ देना चाहिये। नया वज़ीर ग़ाज़ीउद्दीन मरहटों का मित्र था। ज्यों ही उसे पता लगा कि मुग़ल-सम्राट् छिप-छिप कर उसके और मरहटों के विरुद्ध साज़िश कर रहा है, उसने होल्कर को बुलाया। होल्कर ने भी ५० हज़ार सेना के साथ ऐसी आसानी से शाही फ़ौज को भगाया कि बेगमों की रक्षा करने वाला भी वहां कोई न रहा और वे मरहटों के हाथ पड़ गईं। ग़ाज़ीउद्दीन को साथ लिये मरहठा-फ़ौज दिल्ली में जाकर प्रविष्ट हो गई और महलों में जा करके बूढ़े बादशाह को गद्दी से उतार कर आलमगीर द्वितीय—अर्थात् संसार विजयी—नाम से एक नये मनुष्य को गद्दी पर बैठाया। इस नाम के दो बादशाह हुये। पहला आलमगीर औरङ्गज़ेब था। उसने सोचा था कि वह अपने शाही क्रोध की सांस से हिन्दू-जीवन के टिमटिमाते चिराग़ को बुझा दूँगा। अल्लाह की क़सम खाकर उसने उस पर फूँक मारी, पर उसने उसकी दाढ़ी झुलस दी और शीघ्र ही उसने अग्नि ऐसा भयंकर रूप धारण कर

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लिया कि सह्याद्रि पर्वत को जा पकड़ा और उसमें से ऐसे शोले निकले जिसने लाखों मनुष्यों, मन्दिरों की चोटियों, कलशों, पहाड़ों और तराइयों तथा जल और स्थल सब को जा घेरा। इस प्रकार वह होमाहुति की एक प्रचण्ड अग्नि बन गई। पहले आलमगीर ने मरहठों को पहाड़ी चूहों के रूप में देखा था, पर इन चूहों ने इतनी उन्नति की कि उनके पैने पंजों ने कितने ही मुसल- मान-शेरों का पेट फाड़ दिया और उनका रक्त दूसरे आलमगीर की राजधानी में मरहठों के पैरों में बहने लगा। पहला आलमगीर शिवाजी को एक साधारण राजा भी स्वीकार न करता था; पर उसका दूसरा उत्तरा- धिकारी, आलमगीर द्वितीय, जो उसी का वंशज था, अपने आपको तभी बादशाह कहला सका जब कि शिवाजी की सन्तान ने कुछ कृपा करके उसे बादशाह बना रहने दिया। हिन्दुस्तान की मुसलिम-दुनिया भयभीत हो गई। वह हिन्दू-राज्य की शक्ति तथा प्रताप देखकर अपार क्रोध में जलती-भुनती खाक होने लगी। रुहेले और पठान फ़र्रुखाबाद और दूसरी जगहों में पराजित हुये, वज़ीर तथा नवाब अपनी जगहों से हटाये गये, मौलवी और मौलाना काफ़िरों की उन्नति-शील दशा देख कर "हलाली ध्वजा" के घटते प्रताप का स्मरण कर अधीर होने लगे; यहाँ तक कि स्वयं बादशाह भी अपने राज्य को भालों की नोकों पर स्थापित देखकर घबड़ा गया। अतः राज्यहीन तथा विवश होने पर भी मुसलमानों ने मरहठों के नाश करने और बदला लेने की कसम खायी और गुप्त रूप से षड्यन्त्र रचने लगे। यह कहते आश्चर्य होता है—यद्यपि यह आश्चर्य की विशेष बात नहीं भी है—कि मरहठों के उत्तर भारत के इस उत्कर्ष से कुछ हिन्दू-राजे भी असन्तुष्ट हो गये और जयपुर के माधवसिंह, जोधपुर के विजयसिंह, जाटों तथा अन्यान्य छोटे-छोटे सरदारों ने अपने स्वाभाविक बैरियों के साथ मिलने में विलम्ब नहीं किया। उन्होंने मुसलमानों को इस हिन्दू-शक्ति को नष्ट करने के लिये एक षड्यन्त्र रचने के लिये उभारा, जो अकेले ही हिन्दू-

[ ६० ] स्वतन्त्रता तथा हिन्दुओं के धार्मिक कृत्यों को नाश करने वालों का सामना पूर्ण रूप से कर सकती थी, तथा उसके लिये तैयार थी । मुसलिम-जगत् के नेताओं ने अपनी परम्परागत नीति के अनुसार मूर्तिपूजकों तथा काफ़िरों के विरोध के लिये भारत के बाहर से अपने सहधर्मियों के बुलाने का निश्चय किया । इसका मुख्य कारण यह था कि भारतवर्ष के मुसलमान मरहठों का किसी भी प्रकार से सामना नहीं कर सकते थे— न ही युद्ध में, न ही धोखा देने में, न ही चालाकी में, न ही औरंगजेबी मक्कारी में । नजीबखां रुहेला, जिसे मरहठों के नाश से हर प्रकार मे लाभ था, तथा मल्का जमानी, जो किसी समय शाही महल में अग्रगण्य षड्यन्त्र- कारिणी स्त्री थी, और जिसे हिन्दुओं से भिक्षा मांग कर जीवन निर्वाह करना असह्य था, इस भीषण षड्यन्त्र के नेता बने । उन लोगों ने अपने पूर्वजों का, जिन्होंने ऐसे ही डर और आशा में नादिरशाह को बुलाया था, अनुसरण करने का निश्चय किया और गुप्त पत्र-व्यवहार द्वारा अहमदशाह अब्दाली के पास, विधर्मियों पर चढ़ाई करके मुसलिम- राज्य को बचाने की विनीत प्रार्थना लिख भेजी । अहमदशाह ने उनके निमन्त्रण को स्वीकार कर लिया क्योंकि उसमें उसका भी स्वार्थ छिपा हुआ था । हिन्दुस्तान पर विजय प्राप्त करने की उसकी चिर-अभिलाषा थी । पर असली और सब से बड़ा कारण, जिससे वह युद्ध छेड़ना चाहता था, यह था कि मरहठों का प्रताप और तेज तथा राज्य मुल्तान के पास उसकी सीमा तक पहुँच गया था; और इसके बढ़ने का डर इसे प्रतिदिन लगा रहता था । अहमदशाह ने पहले ही मुल्तान और पंजाब को अपने राज्य में मिला लिया था । लेकिन १७५० में थटा, मुल्तान और पंजाब को भीतरी तथा बाहरी आक्रमणों से बचाने तथा वहां शांति-स्थापना का काम मरहठों ने अपने हाथ में लिया था और वहाँ चौथ लगाने का अधिकार भी प्राप्त

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कर लिया था। इसके अनुसार ही उन्होंने अपने अभिलाषित वजीर ग़ाज़ीउद्दीन को, १७५४ में, अब्दाली से पंजाब और मुल्तान वापस लेने में सहायता दी थी। यह उसे एक खुली ललकार थी। ठीक उसी समय नजीबखां के षड्यन्त्र ने मुहम्मद अब्दाली को पूर्ण विश्वास दिला दिया कि भारत के मुसलमान और नवाब उनकी मदद करेंगे। तभी से वह हिन्दुस्तान का शाही ताज पाने का स्वप्न देखने लगा और जो सफलता नादिरशाह भी न प्राप्त कर सका था उसे प्राप्त करने को उद्यत हो गया।

मुख्य-मुख्य मरठे सरदारों को दक्खिन में संलग्न समझ कर उसने ८० हज़ार मनुष्यों की फ़ौज लेकर सन् १७५६ में सिन्धु नदी को पार कर पंजाब और दिल्ली को क़रीब २ बिना युद्ध के ले लिया और बादशाह की पदवी धारण कर ली। विजयी पठानों की परम्परानुसार वह क्रोधित भी हुआ और दिल्ली-निवासियों की कुछ घंटों तक क़तल-आम की आज्ञा देकर अपनी शाही ताजपोशी की शान को पूर्ण किया। उन थोड़े ही घंटों के भीतर १८ ००० निरपराध मनुष्यों का निरंकुशता से वध किया गया। तत्पश्चात् वह मुसलमान-धर्म के रक्षक का पद पाने तथा अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिये हिन्दुओं के पवित्र तीर्थ-स्थानों और नगरों को, जिनको मरहटों ने अभी अभी वापिस लिया था, नष्ट करने के लिये रवाना हुआ। सब से पहले मथुरा उनका शिकार बना। लेकिन यह शहीदों की तरह समाप्त हुआ। ५,००० जाटों ने, जब तक उनके शरीर में प्राण रहे, मुसलमानों के इस टिड्डू-दल का बड़ी वीरता- पूर्वक सामना किया। मथुरा पर क्रोध उतारने के बाद, मरहठों को अपमानित करने के लिये वृन्दावन पर चढ़ दौड़ा, पर गोकुलनाथ की रक्षा में एकत्रित सशस्त्र ४,००० नागों ने जिस वीरता से युद्ध करके उसकी अमर विजय की आशा को निराशा में परिणत कर दिया, वह चिरस्मरणीय है। २,००० वैरागी मारे गये, परन्तु उन्होंने अपने गोकुल-

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नाथ की रक्षा करके शत्रुओं को भगा देने में सफलता प्राप्त की । तुरन्त ही अब्दाली आगरे को रवाना हुआ और शहर पर अधिकार जमाने के पश्चात् किले पर चढ़ दौड़ा । इस क़िले में ग़ाज़ीउद्दीन, पठानों या फ़ारसियों से घृणा करने वाले मुसलमानों के साथ, जो भारत में पठानों या फारस वालों का राज्य पसन्द नहीं करते थे, छिपा बैठा था और मरहटों के आने की राह देख रहा था । लेकिन उसी समय जयपुर, जोधपुर, उदयपुर तथा अन्य बहुत से दूसरे राजे क्या कर रहे थे ? वे मरहटों से घृणा करते और पूछते थे कि उन्हें हिन्दू-पद-पादशाही के आन्दोलन उठाने का क्या अधिकार है ? उचित तो यह था कि उस समय ये लोग उत्तर में हिन्दू-हितों की रक्षा करते और पृथक् २ अथवा संगठित होकर हिन्दू-धर्म या हिन्दू-पद- पादशाही को सुरक्षित रखते और इसमें अपने आपको मरहटों से सुयोग्य सिद्ध करते, पर ऐसा करने वाला एक भी मनुष्य न निकला । अहमदशाह अब्दाली लाखों मृतवत् हिन्दुओं के बीच से बिना रोक- टोक सीधे दिल्ली और फिर आगरा चला आया और घोषणा के अनुसार दक्खिन की ओर भी बढ़ा । झुण्ड-के-झुण्ड मुसलमान-राजपूत, जाट और दूसरे हिन्दू-राजाओं तथा सरदारों के सामने “काफ़िरों को मारो” इत्यादि उच्चारण करते हुये, हिन्दुओं के मकानों, मन्दिरों और तीर्थों को कुचलते हुये अहमद अब्दाली के पास आने लगे । पर मरहटों के अति- रिक्त उनकी ओर उँगली उठाने वाला भी कोई न निकला । अब्दाली के हमले का समाचार, महाराष्ट्र के पूनास्थित नेताओं के दिल पर नादिरशाह के हमले से कुछ विशेष प्रभाव न डाल सका । रघुनाथराव की अध्यक्षता में एक शक्तिशाली सेना उत्तर की ओर भेजी गई । यह समाचार अब्दाली को आगरे के समीप मिला । वह एक चतुर और अनुभवी सेनापति था और उसने अपने जीवन में कई इनकलाब देखे थे । उसने सोचा कि और आगे बढ़ना तथा ऐसे भयानक शत्रु का मुका-

[ ६३ ] बला करना मृत्यु के मुख में पड़ना है, इसलिये मिले हुए को ही सुदृढ़ करने का निश्चय करके लौट पड़ा और दिल्ली पहुँच कर मलका ज़मानी की लड़की से शादी कर ली ताकि वह अपने मुग़ल-शासन के दावे को दृढ़ बना सके । सरहिन्द की रक्षा के लिये १० हज़ार फ़ौज छोड़ कर और अपने लड़के तिमूरशाह को लाहौर का वाइसराय बना कर जितनी जल्दी आया था, उतनी ही जल्दी वापिस लौट गया । मरहठों ने दक्षिण में फँसे होने पर भी जितनी जल्दी हो सका, चलकर अहमदशाह का बना बनाया सारा काम बिगाड़ दिया। सखाराम भगवन्त, गंगाधर, यशवन्त और दूसरे मरहठे-सेनापति द्वाबा में जा पहुँचे और विप्लव मचाने वाले रुहेलों और पठानों को नीचा दिखाया । इस प्रका र ही गाज़ीउद्दीन की जान बचाई । विट्ठल शिवदेव दिल्ली को रवाना हुआ और १५ दिन की घमासान लड़ाई के पश्चात् पठान-क़ौम के जन्मदाता और मरहठों के कट्टर शत्रु नजीबखां को जीवित ही पकड़ कर दिल्ली पर अधिकार कर लिया । वहां से मरहठी-सेना अब्दाली की लगभग १०,००० फ़ौज का सामना करने के लिये, जो कि अब्दुल समद की अध्यक्षता में सरहिन्द में पड़ी थी, चल पड़ी। फ़ौज को हरा कर अब्दुल समद को बन्दी कर लिया। अब सेना ने लाहौर की ओर बढ़ने का निश्चय किया । पर मरहठों की इस सफलता से अब्दाली का पुत्र वाइसराय तैमूर, जिसने पंजाब और मुल्तान अपने अधीन कर रक्खा था, ऐसा डरा कि उसे मरहठों का सामना करने का साहस ही न हुआ और लाहौर से भाग गया । रघुनाथराव ने बड़ी धूमधाम से लाहौर में प्रवेश किया । जहानखां और तैमूर ने बड़ी चालाकी से परपा होने का उद्योग किया, पर मरहठों ने उनका ऐसा पीछा किया कि उनका हटना हार में परिवर्तित हो गया और सारी सेना, पुत्र और वाइसराय, जो मरहठों को कुचलने आये थे, अपनी सारी वस्तुओं को, जोकि जान की अपेक्षा कम मूल्यवान थीं, छोड़ कर भाग निकले । उनके खेमे लूट लिये गये और बहुत बड़ी तादाद में सामान और नक़द रुपये हाथ लगे । इस

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प्रकार "श्रीरामदासजी" द्वारा शिवाजी को दिया हुआ "गेरुआ झण्डा" आख़िरकार हिन्दुस्तान की उत्तरी सीमा पर गाड़ दिया गया। हिन्दू 'अटक' पर पहुँच गये। पृथ्वीराज की पराजय के पश्चात् यह पहला ही मौका था जब श्रुति-प्रसिद्ध पवित्र सिन्धुतट पर हिन्दुओं की गौरवान्वित पताका फहराने लगी और युद्ध में विजयी हिन्दुओं के घोड़े उसका स्वच्छ जल-पान कर निर्भीक हो अपनी परछाहीं देखने लगे। मरहठों के इस विजय-समाचार ने हिन्दू जाति में बिजली का संचार कर दिया। अन्ताजी मानकेश्वर ने रघुनाथराव को लिख भेजा "लाहौर ले लिया गया, दुश्मन को भगा दिया गया और सीमा-प्रदेश तक उसका पीछा किया गया। हमारी सेना सिन्ध तक पहुँच गई। सचमुच यह बड़ा आनन्दप्रद समाचार है ! उत्तर के समस्त राजे, राव, सूबेदार और नवाब तथा अन्य लोग इससे प्रभावित होकर डर गये हैं। हमारी जाति के साथ किये हुए अत्याचारों का बदला केवल मरहठे ही ले सकते थे। सारे भारतवर्ष का बदला केवल उन्होंने ही अब्दाली से लिया। मैं अपने भावों को शब्दों द्वारा आपके पास भेजने में असमर्थ हूँ। वीरता के ऐसे काम किये गये हैं जो अवतारों की वीरता से कम नहीं हैं।" इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि स्वयं मरहठों को भी अपनी इस विजय पर विस्मय हुआ। द्वारिका से जगन्नाथ तक और रामेश्वर से मुल्तान तक, उनकी तलवार विजयी रही तथा उनके शब्द क़ानून बने। उन्होंने खुल्लम-खुल्ला भारत-राज्य के उत्तराधिकारी तथा रक्षक होने का ढिंढोरा पिटवा दिया और उन तमाम लोगों को, जो ईरान, तूरान या अफगा- निस्तान और इंग्लैंड, फ्रांस या पुर्तगाल से आये और इसमें बाधा डाली, नीचा दिखा कर अपनी मर्यादा की प्रतिष्ठा रक्खी। शिवाजी का 'हिन्दू-पद-पादशाही' का मनोरथ सामान्यतः पूरा हो गया। स्वामी रामदास की शिक्षा कर्तव्यरूप में परिणत हुई। मरहठे विजय-लाभ

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करते हुए हिन्दू-ध्वजा को सिन्ध के तट तक ले गये। शाहू जी ने बाजी- राव को ऐसा ही करने की आज्ञा दी थी। पर अब तो और भी आगे बढ़ने की सम्भावना प्रतीत होने लगी थी। अटक की विजय ने राजनैतिक क्षेत्र में मरहठों का प्रभाव बढ़ा दिया। अब वह दिल्ली की चारदिवारी के अन्दर संकुचित नहीं रह सकता था। काश्मीर काबुल और कंधार से मरहठों के यहां उनके प्रतिनिधि, भेदिये तथा राजदूत अधिकाधिक संख्या में आने लगे। एक समय वह था जब गद्दी से उतारे जाने पर हिन्दू राजे काबुल और फारस के मुसलमान-बादशाहों से सहायता मांगा करते थे। पर अब समय ने पलटा खाया। रघुनाथराव के पास प्रतिदिन काबुल और कन्धार से पद-च्युत राजाओं क प्रार्थना-पत्र आने लगे। ४ मई सन् १७५८ को सेनापति ने नाना साहब को लिखा—"सुल्तान तैमूर और जहानखां की सेनायें हरा दी गई हैं और उनके खेमे और सारी सामग्री हम लोगों के हाथ लगी है। केवल थोड़े व्यक्ति ही भाग कर ज़िन्दा अटक पार कर सके हैं। ईरान के शाह ने अब्दाली को पराजित कर दिया और स्वयं मुझे पत्र लिखा है जिसमें अनुरोध किया है कि मैं और आगे कन्धार तक बढ़ं, क्योंकि हम दोनों की सम्मिलित शक्ति से नष्ट हो जाने पर ही अब्दाली अटक को हमारा सीमाप्रान्त स्वी- कार करेगा। लेकिन मैं विचार करता हूं कि हम अटक तक ही क्यों सीमाबद्ध हो जांय । अकबर से औरङ्गजेब तक काबुल और कंधार के दोनों सूबे "हिन्दू-राज्य" के अन्तर्गत रहे हैं। फिर उन्हें हम विदे- शियों को क्यों दें? मैं सोचता हूं कि ईरान का बादशाह प्रसन्नता- पूर्वक ईरान तक सीमाबद्ध रहेगा और वह काबुल और कन्धार के हमारे दावे पर आपत्ति नहीं करेगा। पर वह उसे चाहे या न चाहे मैंने तो निश्चित कर लिया है कि उन प्रांतों को अपने राज्य का एक भाग समझूं और उन पर हमारा शासन हो। अब्दाली का भतीजा पहले ही से हमारे पास आया है और उसने राज्य पर अपने अधिकार का दावा

[ ६६ ] करते हुए अब्दाली के मुक़ाबले में हमसे सहायता की प्रार्थना की है। मेरा विचार उसे सिंध के पार पड़े राज्य के हिस्से का गवर्नर बना देने तथा उसकी रक्षा के लिये कुछ सेना भेज देने का है । इस समय मेरा दक्खिन को लौटना परमावश्यक है । मेरे उत्तराधिकारी देखेंगे कि यह मेरी बड़ी आशा फलित होगी । काबुल और कन्धार में नियमानुसार हम लोगों का शासन प्रारम्भ हो जायगा ।” १३ हिन्दू-पद-पादशाही ꕤ इरानपासुनि फिरंगनापर्यंत शत्रुची उथे फौजी । सिंधुपासुनि सेतुबन्धपर्यंत रणांगण भू माजली ॥ तीन खंडिच्या पुंडांची ती परन्तु सेना बुडेविली । सिंधुपासुनी सेतुवन्धपर्यंत समरभू लढवीली ॥ वर्षा काल समीप होने के कारण रघुनाथराओ पत्र लिखने के पश्चात् शीघ्र ही सेना के साथ दक्षिण को लौट आया । यह बड़े दुर्भाग्य की बात हुई कि उसे ऐसा करना पड़ा और नये जीते हुए सूबों को, जहां सेना भी कम रक्खी गई थी. सहसा छोड़ना पड़ा । सब से भयानक बात तो यह थी कि पठानों का षड्यन्त्रकारी नेता नजीबखां, जो 'पकड़ लिया गया था और जिसे अब्दाली के साथ मिल कर मरहठों को धोखा देने के कारण सारे मरहठा-सरदारों ने मार डालना ही श्रेयस्कर समझा था, अभी तक जीवित था और उसका कोई उचित प्रबन्ध न हो सका था । ꕤ ईरान से लेकर गोआ तक शत्रु फैले हुए थे । सिंध से लेकर रामेश्वर तक समरभूमि बन चुकी थी । विदेशियों की सेना में तीन द्वीपों की सेनायें सम्मिलित थीं, पर हमने सिंध से लेकर रामेश्वर तक उन से युद्ध जारी रखा और उनको परा- जित कर दिया ।

यह बड़ा ही मक्कार और धूर्त मनुष्य था । इसने मल्हरराव से सैकड़ों क्षमा याचनाएं कीं और कहा—"आप मेरे पिता हैं, मुझे अपने बुरे कर्मों पर बड़ा पश्चात्ताप हो रहा है । कृपा करके पिता जिस तरह अपने पुत्र की प्राण रक्षा करता है, आप भी मेरी रक्षा कीजिए" इत्यादि । मर- हठों के हित के लिये प्राण न्यौछावर करने वालों को धर्मपुत्र स्वीकार करने के लिये मल्हरराव सदैव उत्सुक रहते थे । फलस्वरूप उन्होंने नजीबखां की ओर से ऐसी बहस की कि जान लेने को प्रस्तुत होते हुए भी रघुनाथराव को उसे छोड़ देना पड़ा । हम शीघ्र ही देखेंगे कि अपनी प्राण-भिक्षा पाने वाले नजीबखां ने किस प्रकार अपना जीवन ही अपने प्राणदाता के विरुद्ध षड्यन्त्र रचने में व्यतीत किया । राजनैतिक दांव-पेचों के कारण मरहठे अब तक कई अंशों में दिल्ली के बादशाह के नाम पर कार्य कर रहे थे । ऐसा करने से उन्हें रुकावट कम तथा लाभ अधिक होता था । उनकी यह स्थिति अंग्रेजों की उसी स्थिति के समान थी जिसे वे मरहठों की अवनत दशा के पूर्व सन् १८१८ ई० में धारण किये हुए थे । जिस राजनैतिक पालिसी से १८५७ ई० तक अंग्रेज केवल बादशाह के एजेण्ट होने का बहाना करते चले आये—यद्यपि वास्तव में वे ही बादशाह थे, उसी नीति ने मरहठों को भी शीघ्रता न करने पर विवश किया । क्योंकि ऐसा करने से न केवल मुसलमान ही बल्कि अँगरेज़, फ्रांसीसी, पठान और हिन्दू-राजे सब उनके शत्रु बन जाते । इसका कारण यह था कि इनमें से सब की दृष्टि मुग़ल-सिंहासन और उसके उत्तराधिकार की तरफ लग रही थी और हर एक यही चाहता था कि मुग़ल-सम्राट् तब तक मृत्यु शय्या पर पड़ा रहे, जब तक राज्य के अन्य दावेदार मिट न जांय और वह आसानी से उसके हाथ पड़ जाये । परन्तु उत्तर भारत तथा स्वयं बालाजी द्वारा दक्खिन में प्राप्त सफलता ने मरहठों को इतना शक्तिशाली बना दिया कि बालाजी और सदाशिव भाऊ से लेकर साधारण पुरुष तक, सबके मन में यह बात

बैठ गई कि अब इस कार्य को सम्पूर्ण कर देना चाहिये। मरहठों की बड़ी परिषदों में इन योजनाओं पर विचार होने लगा। अब उन्हें अपनी शक्ति पर विश्वास हो गया था और वे समझने लग गये थे कि अब भारतवर्ष का मुसलमानी राज्य उन्होंने समाप्त कर दिया है। वे अपने आप को एशिया की एक महान् शक्ति समझते थे और अब पूना भारतवर्ष का ही नहीं. प्रत्युत् समस्त एशिया का राजनैतिक केन्द्र बन गया था। मुग़ल-राज्य चूर २ होकर अब उनके पैरों पर लोटता था अतः मरहठों ने उन उन सारी रुकावटों को, जो उन के दिल्लीश्वर बनने में बाधक थीं, नष्ट करने का दृढ़ निश्चय कर लिया। सदाशिव राओ भाऊ ने अन्य मरहठा-सेनापतियों की अपेक्षा इस महत्वपूर्ण कार्य को विशेष गौरव की दृष्टि से देखा और इसे पूर्ण करने या इसी के लिये लड़ते २ प्राण त्याग देने का दृढ़ संकल्प कर लिया। उन लोगों ने मुसलमान-राज्य को नष्ट भ्रष्ट कर डाला। हिन्दुओं ने विजेताओं पर विजय प्राप्त की और भाऊ की वाक्पटुता से प्रभावित हो, उन लोगों ने इस चतुरता से उद्योग करने की ठान ली कि अगले कुछ ही वर्षों में सारे भारत को स्वतंत्र करा लेंगे और खुल्लम-खुल्ला उसे हिन्दू- शासन में लायेंगे।

इस विचार से तीन बड़े युद्धों की आयोजना की गई। पंजाब और मुल्तान में जाकर नये जीते हुए सूत्रों में शांति-स्थापन तथा निय- मित शासन-प्रणाली चलाने का भार दत्ताजी शिन्दे को सौंपा गया और उसे यह आज्ञा दी गई कि वहां से लौटकर वह काशी और प्रयाग को आवे, जहां रघुनाथराव दूसरी सेना लेकर उससे मिलेगा। वहां से ये दोनों संयुक्त सेनायें बंगाल की ओर रवाना हों और समुद्रपर्यन्त सारे देश को मुसलमानों से स्वतन्त्र करादें तथा १७५७ में प्लासी की लड़ाई के विजेता अँगरेज़ों को भी, जो बङ्गाल के मालिक बनने के इच्छुक हैं, वहां से बिल्कुल हटादें। दत्ताजी, जनको जी और रघुनाथ- राओ को उत्तर भारत को, सिन्ध और मुल्तान से लेकर समुद्र तक

[ ६६ ] स्वाधीन करने की आज्ञा देने के साथ ही बालाजी ने अपने पुत्र विश्वास राश्रो भाऊ को साथ लेकर सारे दक्षिण की विजय का भार स्वयं अपने हाथ में ले लिया । तदनुसार अपनी सेनाओं के साथ दत्ताजी ने उत्तर की ओर प्रस्थान किया । बालाजी और भाऊ ने सबसे पहिले निज़ाम का दक्षिण से अस्तित्व मिटाने का कार्य हाथ में लिया । उन्होंने एक बड़ी सेना और तोपखाने के साथ, निज़ाम पर आक्रमण किया । एक बड़े घमसान के युद्ध के बाद सन् १७५० ई० में उद्‌गिर के स्थान पर बड़ी सफलता पूर्वक विजय प्राप्त की । मुसलमानी सेना नष्ट कर दी गई । निज़ाम इतना डर गया कि उसने शाही मुहरें भाऊ के हाथों मे दे दी और अत्यन्त नम्रता- पूर्वक किसी भी शर्त पर सुलह करने की प्रार्थना की । उनमें संधि हो गई जिसके अनुसार नागर, बरहानपुर, सलहर, मलहर, अशीरगढ़ और दौलताबाद के क़िलों और साथ ही नान्देड़ फूलम्बरी, अम्बद और बीजापुर के ज़िलों पर उनका अधिकार हो गया । भाऊश्रो भी इस सुलहनामे से संतुष्ट हो गया । निज़ाम की अब कोई शक्ति न रही । उत्तरी भाग को छोड़ सारा दक्षिण, इस साल के बीतने से पहले ही, मुसलिम-शासन से मुक्त हो गया । अन्त में नागर और बीजापुर पर मरहठी ध्वजा फहराने लगी । यहां के राजा लोग छोटे विद्रोही शिवाजी के तोराना लेने और वहां पर "हिन्दू-विप्लववादियों" का झंडा खुल्लमखुल्ला गाड़ने पर घृणायुक्त हंसी हंसा करते थे । इस बड़ी राजनैतिक तथा सैनिक विजय के पश्चात्, उद्‌गिर विजेताओं की इच्छा हैदरअली पर चढ़ाई करके उसका नाश करने की हुई, क्योंकि उसने मैसूर को घेरा हुआ था और चाहता था कि वहां के हिन्दू-राज्य को उलटकर स्वयं बादशाह बन बैठे। वहां के हिन्दूराजा और उनके मन्त्री ने मरहठों के यहां एक बड़ी करुणापूर्ण प्रार्थना लिख भेजी कि आप लोग आकर इस साहसी मुसलमान की अभिलाषा

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असफल करके हमारी रक्षा करें। सदाशिवराव भाऊ ने, जो ऐसे ही समय की प्रतीक्षा में था और चाहता था कि हैदरअली को परास्त करके सारे दक्खिन को मुक्त कराये, फौरन ही हैदरअली पर चढ़ाई करने के विचार से रवाना होने का निश्चय कर लिया, पर उसी समय पेशवा के यहां उत्तर से बड़ी बुरी खबर आई। भाऊ लिखता है, कि सफलता का प्याला, जिसे मैं मुँह से लगाने ही वाला था, मेरे हाथ से छीन लिया गया। जो मरहठा फौज दत्ताजी की अध्यक्षता में उत्तर की ओर गई थी, वह १७५८ ई० के अन्त में दिल्ली पहुँची जहां से पेशवा की आज्ञानुसार नवीन विजित लाहौर और मुल्तान के सूबों का प्रबन्ध करने के लिये वह आगे बढ़ा। मावा जी शिन्दे और त्रिम्बक बापूजी को अटक तक का प्रबन्ध करने के लिये नियत करने के बाद उसने लाहौर, सरहिन्द तथा अन्य प्रसिद्ध स्थानों में सेनायें रक्खीं। अब पंजाब का काम सम्पूर्ण हो जाने के कारण वह वहां से चला आया और अपने सुपुर्द किये गये दूसरे काम के लिये गंगा पार करके पटना पहुँचा, जहां उसने अंग्रेजों के साथ हिसाब चुकाने के पश्चात् हिन्दू-राज्य को समुद्र-तट तक फैलाना था। सींधिया द्वारा पराजित नजीबखां, जिसने दत्ताजी को बंगाल की लड़ाई में सहायता देने तथा विश्वासपूर्वक सेवा करने की झूठी प्रतिज्ञा की थी, धीरे धीरे अपनी शक्ति और प्रभाव को बढ़ा रहा था। इस पर क्रोधित होकर पेशवा ने दत्ताजी को लिखा, “तुम कहते हो कि अगर हम नजीबखां को 'बख्शी' बना दें तो वह हमें तीस लाख रुपया देगा, किन्तु मैं आज्ञा देता हूँ कि उसका एक पैसा भी न छूना। नजीबखां आधा अब्दाली है, उसका विश्वास न करो और एक नीच जहरीले सांप को न पालो।” पर दत्ताजी ने पेशवा की इस आज्ञा की अवहेलना करके बड़ी भारी भूल की। वह उसकी छटी मक्कारी पर ऐसा

[ १०१ ] विमोहित हो गया कि उसने नजीबखां की, गंगा पार करने के लिये नावों का पुल बनाने की प्रतिज्ञा पर पूर्ण विश्वास कर लिया। बगल पर हमला करने में एक ओर मरहठों को देर होती गई, दूसरी ओर नजीबखां उनके विरुद्ध मुसलमानों का गुट तैयार करने की विशेष सुविधा मिलती गई। इस कार्य में उसे इतनी सफलता प्राप्त हुई कि उसने दिल्ली के बादशाह की हस्ताक्षरयुक्त एक चिट्ठी अब्दाली के पास भेज दी जिसमें उससे एक बार फिर भारत पर आक्रमण करने की प्रार्थना की गई। इस उत्साह भरी प्रार्थना ने धार्मिक-हठी पठानों को धर्म और अल्लाह के नाम पर जगा दिया। क्या अब्दाली हिन्दुस्तान को विध- र्मियों और मूर्ति-पूजकों के पंजे से छुड़ाकर मुसलमानी बादशाहत को बचाकर धर्म का रक्षक नहीं हो जायगा ? उधर अब्दाली भी अपने लड़के की हार से लज्जित हुआ पड़ा था, क्योंकि मरहठों ने हिन्दुस्तान का ताज उसके हाथ से छीन लिया था। उन्हों ने उसे मुल्तान और पंजाब से निकाल ही नहीं दिया था वे तो प्रत्युत काबुल और कंधार पर भी "हिन्दुस्तान के राज्य का भाग होने" का दावा करने लगे थे। और इसका बदला वह कुछ भी न ले सका था। अब वह फिर भारत पर आक्रमण करने, इस राज्य को अधिकृत करने तथा मरहठों की हिन्दू- पद-पादशाही स्थापित करने की महत्त्वाकांक्षा को, जो सामान्यतः सम्पूर्ण हो चुकी थी, नाश करने को उद्यत हो गया। उसने इस गुट का नेता बनने का वचन दे दिया और एक बड़ी सेना के साथ सिन्ध पार करके लाहौर ले लिया। अब्दाली के हमले का समाचार ज्यों ही दिल्ली पहुँचा, नजीबखां ने नकाब उतार दी और खुल्लमखुल्ला अब्दाली का अनुयायी बन गया। अब दत्ताजी को पेशवा की आज्ञा की अवहेलना करने की अपनी भूल मालूम हुई और उसने यह समझ लिया कि नजीब और शुजा ने पूरी तरह धोखा देकर उसे दुश्मनों के बीच घेरकर फंसा दिया है। शुजा एक तरफ था और दूसरा ओर नजीब, रुहेले तथा पठान थे। पीछे से

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अब्दाली बड़ी भारी सेनाओं के साथ बढ़ा आ रहा था। अटक और लाहौर में पड़ी हुई मरहठों की छोटी २ सेनाओं को इस सुविशाल फौज के मुकाबले में परास्त होना पड़ा। मरहठों के अतिरिक्त हिन्दुओं की दूसरी एकमात्र शक्ति, जिसने बड़ी वीरता से उत्तर-भारत में मुसलमानों का सामना किया, उन सिखों की थी जो अभी २ विकसित हो रहे थे। इन बहादुर शूरवीरों ने शक्तिभर उन्हें रोकने तथा उनको नष्ट करने का प्रयत्न किया। पर अभी तक ये लोग सुसंगठित नहीं थे, अतः वे अपने सूबे को भी स्वतन्त्र न कर सके। वह समय अभी आने वाला था। मार्ग में उसका किसी ने विशेषरूप से मुकाबला न किया। इस प्रकार वह अविरुद्ध गति से शीघ्र ही अपनी सेना सहित सरहिन्द पहुँच आया। राज- पूताने तथा अन्य स्थानों के बहुत से राजे और राजकुमार अब्दाली से सहानुभूति रखते थे—उसी अब्दाली के साथ जिसने कि हिन्दुओं के पवित्र स्थान मथुरा का नाश किया था और जो हिन्दुओं का कट्टर वैरी था। केवल एक दत्ताजी की सेना थी जो अब्दाली के "दिल्ली- सम्राट्" बनने के मार्ग में बाधक थी। दत्ताजी ने होल्कर को शीघ्र सहायता के लिये आने को लिखा, पर नजीब के उस धर्मपिता, सेनापति होल्कर ने अपने को छोटे २ सरदारों के साथ लड़ने में व्यस्त रखना ही उचित समझा। इस प्रकार अपार शत्रु-सेना में फंसी हुई मरहठा फौज को अपना जान बचाने का केवल एक मार्ग था कि वह दिल्ली छोड़ कर हट जाय। प्रत्येक अनुभवी और शूरवीर पुरुष ने दत्ताजी पर जोर दिया कि होल्कर के आने तक यहां से हट चलिये। उसके वीर भतीजे जनको जी राव ने भी यही प्रार्थना की, पर दत्ताजी ने किसी की एक न मानी। जब वह अनुभव करने लगा कि मेरे भोलेपन के कारण ही इस सेना की यह दुर्गति हुई तो वह चिन्ता-सागर में डूब गया। उसने हिन्दुओं के कट्टर दुश्मन नजीब की जान बचाई थी और उस पर विश्वास किया था। पर अब उसने दृढ़ निश्चय कर लिया कि अब इस ओर अधिक भीरुता न दिखायेगा। इसलिये जो भी उससे पीछे हटने को कहता, वह

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उसे केवल एक ही उत्तर देता था कि—"जो चाहें हट जांय। मैं किसी को विवश नहीं करता, पर मैं अपनी जगह से नहीं हिल सकता। हट कर मैं नाना साहब और भाऊ को कौन-सा मुंह दिखलाऊंगा ? मैं लड़ाई में अब्दाली का सामना करूंगा और यदि ईश्वर की इच्छा हुई तो या तो उसे मिटा दूंगा, या लड़ते हुए अपने प्राण दे दूंगा।" इसी बीच में, गाज़ीउद्दीन को पता लग गया कि बादशाह पठानों के षड्यन्त्र में शामिल है और इस प्रकार मुझे मार कर मेरा पद छीनना चाहता है। अतएव उसको पृथक् करके मार डाला और दूसरे मनुष्य को गद्दी पर बिठा कर मरहठी सेना से जा मिला ! दत्ताजी ने अपनी प्रतिज्ञानुसार ही कुरुक्षेत्र में अब्दाली का सामना किया। उसकी व्यक्तिगत वीरता के कारण मरहठे सिपाही इतने उत्तेजित हो उठे कि अब्दाली को विवश होकर पीछे हटना पड़ा और उसे विश्वास हो गया कि वह अकेला सींधिया का सामना करने में असमर्थ है। अतएव उसने यमुना पार करने का उद्योग किया, जिसमे सफलता प्राप्त करने के पश्चात् शुक्रताल पर नजीबखां की सेना से जा मिला। शुजा भी अहमदखां, बङ्गश और कुतबशाह के साथ उनसे वहां जा मिला। मुसलमानों का गुट इस बार इतना दृढ़ हो गया जितना इससे पहले कभी नहीं हुआ था। जब यह स्पष्ट दिखाई देने लगा कि इस ज्वार का रोकना अकेले दत्ताजी के लिये असम्भव है। इसलिये उसके सलाहकारों ने एक बार फिर पीछे हटने के लिये कहा। पर उस वीर ने पहले ही की तरह दृढ़ उत्तर दिया "जो चाहें चले जांय, दत्ताजी अवश्य क्षत्रिय-धर्म का पालन करेगा"। इस वीर सेनापति के मुख से निकले हुये ये शब्द निरर्थक न गये, प्रत्युत इनका बड़ा प्रभाव पड़ा और किसी ने उसका साथ न छोड़ा। १० जनवरी सन् १७६० ई० को मरहठी सेना यमुना के घाट के लिये रवाना हुई, ताकि वह अब्दाली को, जो यमुना पार करने के उद्योग में था, पीछे हटाये। लड़ाई प्रारम्भ हुई और क्रमशः बायाजी,

[ १०४ ] मालोजी तथा अन्यान्य मरहठे-सेनापति वीरता के साथ अपार शत्रु सेना का सामना करते हुये शहीद हो गये । दुश्मन मिल गये और एक दूसरे का साथ देने लगे । संयोगवश मरहठों की ध्वजा रुहेला और पठान सेना के बीच में घिर गई, जिसे बचाने के लिये मरहठे आगे बढ़े और घमसान का युद्ध होने लगा । दत्ताजी और जनकोजी झण्डे को खतरे में देखकर आपे से बाहर हो गये । दोनों ही टूट पड़े और लगे शूरवीरता दिखाने । एकाएक बहादुर जनकोजी को गोली लगी और वह घायल होकर घोड़े से गिर पड़ा । दत्ताजी ने इसे देखा, पर किसी रक्षित जगह पर जाकर लड़ने के बजाय सीधे आगे बढ़ा । जो शत्रु सामने आया माग गया, और अपने अनुयायियों के साथ दत्ताजी आगे बढ़ता ही गया, और शत्रु सेना में उलझ गया ! आखिर होनी होकर ही रही । दत्ताजी को भी एक गोली लगी, जिसमें घायल होकर वह पृथ्वी पर गिर पड़ा । नजीबखां के धर्मगुरु और पठान षड्यन्त्र के एक उत्साही कार्य- कर्त्ता कुतुबशाह ने मरहठा-सेनापति को गिरते देखा और वहां जाकर इस प्रकार व्यङ्गपूर्ण शब्दों में पूछा “पटेल, क्या हम लोगों से फिर लड़ोगे ?” मरते हुये जनरल ने निर्भीक उत्तर दिया, “हाँ, अगर बचा तो मैं फिर लड़ूंगा ।” इन शब्दों का उस वीर के मुख से निकलना था कि उस नीच और कायर का क्रोध भड़क उठा । उसने घायल योद्धा को पैर की ठोकर मारी और तलवार खींच कर बड़े गर्व के साथ विजयरूप में उसका सिर काट कर ले गया । इस प्रकार दत्ताजी का अन्त हुआ । संसार-भर में आज तक इस मरहठा वीर की तरह किसी भी सिपाही ने ऐसी सच्चाई, ईमानदारी के साथ अपनी राष्ट्रीय पताका को न बचाया होगा और न ही उसकी रक्षा में ऐसी वीरता-पूर्वक अपना बलिदान दिया होगा । इस वीर की मृत्यु और मरते हुये इस योद्धा के प्रति किये गये कायरतापूर्ण अपमान का समाचार महाराष्ट्र में पहुँचा । प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में प्रतिहिंसा की अग्नि धधक

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उठी और सारे मनुष्यों ने एक स्वर हो बदला लेने की आवाज़ उठायी। बालाजी और भाऊ ने अभी इसी सप्ताह उद्गीर के स्थान पर शानदार विजय प्राप्त की थी और चाहते थे कि हैदरअली को कुचल कर दक्खिन स्वतन्त्र करने का काम सम्पूर्ण कर दें। ठीक उसी समय दत्ताजी की पराजय और उनका मृत्यु-समाचार उनको मिला। उन लोगों ने समयोचित कार्य करने की तैयारी में एक क्षण भी देर नहीं की। यद्यपि उसी सप्ताह उन्होंने दक्षिण में एक बड़ा युद्ध किया था, तो भी एक दिन भी विश्राम न लेकर, अपने सेनापतियों और मन्त्रियों को पटदूर में इकट्ठे होने की आज्ञा दी और इस गम्भीर प्रश्न पर भली-भाँति विचार करके अब्दाली का सामना करने और उसके मालवा पहुँचने से पहले ही उससे लड़ने के लिये एक शक्तिशाली सेना भेजने का निश्चय किया। महाराष्ट्र- नवयुवक सेना में भरती हो गये। शमशेर बहादुर, विट्ठल शिवदेव, मानाजी घैरडे, अन्ताजी मनकेश्वर, मने, निम्बालकर तथा बहुत से अन्यान्य पुराने योद्धा और सेनापतियों ने फिर अपनी-अपनी बागडोर सम्भाली। उद्गीर-विजेता भाऊ सेनापति बनाया गया और बालाजी के ज्येष्ठ पुत्र नवयुवक राजकुमार विश्वासराव भी भाऊ के साथ गये। यह राजकुमार अभी उद्गीर में ख्याति पा चुका था और अपनी जाति का आशा-प्रदीप था। उस समय का विख्यात इब्राहीमखां गारदी, तोप- खाने का अध्यक्ष बनाया गया। दामाजी गायकव ड़ और सन्तोजी बाघ तथा अन्यान्य सेनापति क्रमशः आगे मिलाते गये। कई उत्तर भारतीय राजपूत राजाओं के यहां भी दूत और पत्र भेजे गये कि वे हिन्दुत्व के विरोधी तथा मथुरा गोकुल नष्ट करने वाले विधर्मियों के साथ युद्ध में उनको सहायता करें। विन्ध्याटवी और नर्मदा नदियों को पार करके मरहठा सेना चम्बल तक जा पहुँची। मरहठों की इस विशाल सेना और शक्ति को देखकर समस्त उत्तर भारत भयभीत और स्तम्भित हो गया। शत्रु भाव रखने वाले सब राव, राने, नवाब और खां साहबान हर

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गये; किसी को मरहटों की ओर उंगली उठाने का भी साहस न हुआ । शीघ्र ही जनकोजी शिन्धे भी अपनी सेना के साथ भाऊ से आ मिला। सारी महाराष्ट्र-सेना ने उस नौजवान और सुन्दर शूरवीर राजकुमार का बड़े उत्साह और प्रेम से स्वागत किया और 'बदान' के युद्ध में वीरगति प्राप्त उसके चाचा दत्ताजी की पुण्यस्मृति की प्रतिष्ठा उसी के प्रति प्रदर्शित की। भाऊ ने उस शूरवीर राजकुमार के उपलक्ष में, जिसने केवल १७-१८ वर्ष की अवस्था में ही कई लड़ाइयों में विजय प्राप्त की थी, और अपनी सेना तथा धर्म-रक्षा के लिये कितनी ही भयानक चोटें खाई थीं, एक वृहत् सभा की, और उसको सर्वसाधारण के सामने बहुत से बहुमूल्य उपहार तथा वस्त्रादि भेंट किये। जिस समय वीर विश्वासराव, जो बालाजी की अनुपस्थिति में महाराष्ट्र जाति का अतिप्रिय नेता था, जनकोजी से मिलने के लिये आगे बढ़ा, तब उस विशाल जातीय सभा में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति का हृदय तरंगित हो गया। ये दोनों ही नव- युवक एक से एक सुन्दर, बहादुर और अपनी जाति वालों के आदर्श और अभिलाषा को पूर्ण करने वाले तथा हिन्दू-जाति की उठती हुई आशा की सजीव मूर्ति थे। नजीबखां को धर्मपुत्र बनाने और दत्ताजी की सहायता के लिये आने में असावधानी करके भयंकर भूल करने वाले मल्हारराव होल्कर भी अपने किये का फल भुगत कर यानी दत्ताजी की पराजय के पश्चात् स्वयं अब्दाली से पराजित होकर भाऊ से आ मिले। अब भाऊ की इच्छा यमुना पार करके अब्दाली को नदी-तट पर पहुँचने से पहले ही हराने की हुई। उसने गोविन्द पन्त बुन्देला को आज्ञा दी कि तुम सुअवसर पाते ही अब्दाली की फ़ौज के पिछले भाग पर आक्रमण करो और उसकी रसद पहुँचनी बन्द कर दो। पर नदी में बाढ़ आई हुई थी और इतनी शत्रु सेना उसके दूसरी ओर पड़ा था, इसलिये उसका पार करना अत्यन्त दुष्कर था; इसलिये भाऊ ने दिल्ली जाकर उसे अब्दाली के पंजे से छुड़ाने का निश्चय किया। उत्तर भारत के समस्त राजाओं में केवल

[ १०७ ] जाट ही मरहठों की सहायता के लिये आये । भाऊ ने स्वयं आगे कर बड़ी प्रतिष्ठा के साथ उनका स्वागत किया और दोनों ने पवित्र जल स्पर्श करके अन्त तक शत्रु से युद्ध करने की शपथ खाई। अब सब की आँखें दिल्ली की ओर फिरीं । हिन्दू और दोनों ही ऐतिहासिक राजधानी दिल्ली को अधीन करने का महत्व करने लगे। भाऊ ने सिन्धिया, होल्कर और बलवन्तराव मेहेंदडाले सेनाओं को दिल्ली पर आक्रमण करने के लिये भेजा । पठानों ने, इस पर अधिकार जमाये बैठे थे, बड़े उत्साह के साथ सामना किया- मरहठों के साथ देर तक लड़ने में असमर्थ होने के कारण उन्होंने में शहर को मरहठों के हाथ सुपुर्द कर दिया। शहर विजय मरहठा-सेना ने किले पर आक्रमण किया । मुसलमानों ने किले की के लिये बड़ी वीरता दिखलाई, पर मरहठों के सामने एक न चली उनकी भयंकर शक्तिशाली तोपों ने मुसलमानों के किले पर उनका अधि- कार रखना असम्भव कर दिया । मुसलमानी सेना ने हार मान ली राजधानी और किला हाथ आ जाने का समाचार सुनकर, हिन्दू-आन्दो- लन के पक्षपाती सभी मनुष्यों ने बड़ी खुशी मनाई । मरहठी-सेना ने बड़ी धूमधाम से दिल्ली में प्रवेश किया और ने मरहठी ध्वजा पाण्डवों की राजधानी में गाड़ दी। पृथ्वीराज के हिन्दू या दृग्भक्त सेना के लिये यह पहला ही अवसर था जबकि एक स्वतन्त्र झण्डे के तले इस उत्सव के साथ दिल्ली में प्रविष्ट हुई। आखिरकार पठानों, रुहेलों, मुगलों, तुर्कों, शेखों और सैयदों के प्रयत्न करने पर भी मुसलमानी हलाली झण्डा हिन्दुस्तान की राजधानी पर स्थिर न रह सका और उसके स्थान पर हिन्दू-पद-पादशाही का झण्डा लहराने लगा। शक्तिशाली मुस्लिम फ़ौज के साथ यमुना के दूसरे किनारे पर पड़ा हुआ अब्दाली कुछ भी न कर सका। सदाशिवराव अनुभव करने लगा कि चाहे एक ही दिन के लिये