हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबैठ गई कि अब इस कार्य को सम्पूर्ण कर देना चाहिये। मरहठों की बड़ी परिषदों में इन योजनाओं पर विचार होने लगा। अब उन्हें अपनी शक्ति पर विश्वास हो गया था और वे समझने लग गये थे कि अब भारतवर्ष का मुसलमानी राज्य उन्होंने समाप्त कर दिया है। वे अपने आप को एशिया की एक महान् शक्ति समझते थे और अब पूना भारतवर्ष का ही नहीं. प्रत्युत् समस्त एशिया का राजनैतिक केन्द्र बन गया था। मुग़ल-राज्य चूर २ होकर अब उनके पैरों पर लोटता था अतः मरहठों ने उन उन सारी रुकावटों को, जो उन के दिल्लीश्वर बनने में बाधक थीं, नष्ट करने का दृढ़ निश्चय कर लिया। सदाशिव राओ भाऊ ने अन्य मरहठा-सेनापतियों की अपेक्षा इस महत्वपूर्ण कार्य को विशेष गौरव की दृष्टि से देखा और इसे पूर्ण करने या इसी के लिये लड़ते २ प्राण त्याग देने का दृढ़ संकल्प कर लिया। उन लोगों ने मुसलमान-राज्य को नष्ट भ्रष्ट कर डाला। हिन्दुओं ने विजेताओं पर विजय प्राप्त की और भाऊ की वाक्पटुता से प्रभावित हो, उन लोगों ने इस चतुरता से उद्योग करने की ठान ली कि अगले कुछ ही वर्षों में सारे भारत को स्वतंत्र करा लेंगे और खुल्लम-खुल्ला उसे हिन्दू- शासन में लायेंगे।
इस विचार से तीन बड़े युद्धों की आयोजना की गई। पंजाब और मुल्तान में जाकर नये जीते हुए सूत्रों में शांति-स्थापन तथा निय- मित शासन-प्रणाली चलाने का भार दत्ताजी शिन्दे को सौंपा गया और उसे यह आज्ञा दी गई कि वहां से लौटकर वह काशी और प्रयाग को आवे, जहां रघुनाथराव दूसरी सेना लेकर उससे मिलेगा। वहां से ये दोनों संयुक्त सेनायें बंगाल की ओर रवाना हों और समुद्रपर्यन्त सारे देश को मुसलमानों से स्वतन्त्र करादें तथा १७५७ में प्लासी की लड़ाई के विजेता अँगरेज़ों को भी, जो बङ्गाल के मालिक बनने के इच्छुक हैं, वहां से बिल्कुल हटादें। दत्ताजी, जनको जी और रघुनाथ- राओ को उत्तर भारत को, सिन्ध और मुल्तान से लेकर समुद्र तक