हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ६६ ] स्वाधीन करने की आज्ञा देने के साथ ही बालाजी ने अपने पुत्र विश्वास राश्रो भाऊ को साथ लेकर सारे दक्षिण की विजय का भार स्वयं अपने हाथ में ले लिया । तदनुसार अपनी सेनाओं के साथ दत्ताजी ने उत्तर की ओर प्रस्थान किया । बालाजी और भाऊ ने सबसे पहिले निज़ाम का दक्षिण से अस्तित्व मिटाने का कार्य हाथ में लिया । उन्होंने एक बड़ी सेना और तोपखाने के साथ, निज़ाम पर आक्रमण किया । एक बड़े घमसान के युद्ध के बाद सन् १७५० ई० में उद्गिर के स्थान पर बड़ी सफलता पूर्वक विजय प्राप्त की । मुसलमानी सेना नष्ट कर दी गई । निज़ाम इतना डर गया कि उसने शाही मुहरें भाऊ के हाथों मे दे दी और अत्यन्त नम्रता- पूर्वक किसी भी शर्त पर सुलह करने की प्रार्थना की । उनमें संधि हो गई जिसके अनुसार नागर, बरहानपुर, सलहर, मलहर, अशीरगढ़ और दौलताबाद के क़िलों और साथ ही नान्देड़ फूलम्बरी, अम्बद और बीजापुर के ज़िलों पर उनका अधिकार हो गया । भाऊश्रो भी इस सुलहनामे से संतुष्ट हो गया । निज़ाम की अब कोई शक्ति न रही । उत्तरी भाग को छोड़ सारा दक्षिण, इस साल के बीतने से पहले ही, मुसलिम-शासन से मुक्त हो गया । अन्त में नागर और बीजापुर पर मरहठी ध्वजा फहराने लगी । यहां के राजा लोग छोटे विद्रोही शिवाजी के तोराना लेने और वहां पर "हिन्दू-विप्लववादियों" का झंडा खुल्लमखुल्ला गाड़ने पर घृणायुक्त हंसी हंसा करते थे । इस बड़ी राजनैतिक तथा सैनिक विजय के पश्चात्, उद्गिर विजेताओं की इच्छा हैदरअली पर चढ़ाई करके उसका नाश करने की हुई, क्योंकि उसने मैसूर को घेरा हुआ था और चाहता था कि वहां के हिन्दू-राज्य को उलटकर स्वयं बादशाह बन बैठे। वहां के हिन्दूराजा और उनके मन्त्री ने मरहठों के यहां एक बड़ी करुणापूर्ण प्रार्थना लिख भेजी कि आप लोग आकर इस साहसी मुसलमान की अभिलाषा