भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

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पृष्ठ 97

यह बड़ा ही मक्कार और धूर्त मनुष्य था । इसने मल्हरराव से सैकड़ों क्षमा याचनाएं कीं और कहा—"आप मेरे पिता हैं, मुझे अपने बुरे कर्मों पर बड़ा पश्चात्ताप हो रहा है । कृपा करके पिता जिस तरह अपने पुत्र की प्राण रक्षा करता है, आप भी मेरी रक्षा कीजिए" इत्यादि । मर- हठों के हित के लिये प्राण न्यौछावर करने वालों को धर्मपुत्र स्वीकार करने के लिये मल्हरराव सदैव उत्सुक रहते थे । फलस्वरूप उन्होंने नजीबखां की ओर से ऐसी बहस की कि जान लेने को प्रस्तुत होते हुए भी रघुनाथराव को उसे छोड़ देना पड़ा । हम शीघ्र ही देखेंगे कि अपनी प्राण-भिक्षा पाने वाले नजीबखां ने किस प्रकार अपना जीवन ही अपने प्राणदाता के विरुद्ध षड्यन्त्र रचने में व्यतीत किया । राजनैतिक दांव-पेचों के कारण मरहठे अब तक कई अंशों में दिल्ली के बादशाह के नाम पर कार्य कर रहे थे । ऐसा करने से उन्हें रुकावट कम तथा लाभ अधिक होता था । उनकी यह स्थिति अंग्रेजों की उसी स्थिति के समान थी जिसे वे मरहठों की अवनत दशा के पूर्व सन् १८१८ ई० में धारण किये हुए थे । जिस राजनैतिक पालिसी से १८५७ ई० तक अंग्रेज केवल बादशाह के एजेण्ट होने का बहाना करते चले आये—यद्यपि वास्तव में वे ही बादशाह थे, उसी नीति ने मरहठों को भी शीघ्रता न करने पर विवश किया । क्योंकि ऐसा करने से न केवल मुसलमान ही बल्कि अँगरेज़, फ्रांसीसी, पठान और हिन्दू-राजे सब उनके शत्रु बन जाते । इसका कारण यह था कि इनमें से सब की दृष्टि मुग़ल-सिंहासन और उसके उत्तराधिकार की तरफ लग रही थी और हर एक यही चाहता था कि मुग़ल-सम्राट् तब तक मृत्यु शय्या पर पड़ा रहे, जब तक राज्य के अन्य दावेदार मिट न जांय और वह आसानी से उसके हाथ पड़ जाये । परन्तु उत्तर भारत तथा स्वयं बालाजी द्वारा दक्खिन में प्राप्त सफलता ने मरहठों को इतना शक्तिशाली बना दिया कि बालाजी और सदाशिव भाऊ से लेकर साधारण पुरुष तक, सबके मन में यह बात