हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
यह बड़ा ही मक्कार और धूर्त मनुष्य था । इसने मल्हरराव से सैकड़ों क्षमा याचनाएं कीं और कहा—"आप मेरे पिता हैं, मुझे अपने बुरे कर्मों पर बड़ा पश्चात्ताप हो रहा है । कृपा करके पिता जिस तरह अपने पुत्र की प्राण रक्षा करता है, आप भी मेरी रक्षा कीजिए" इत्यादि । मर- हठों के हित के लिये प्राण न्यौछावर करने वालों को धर्मपुत्र स्वीकार करने के लिये मल्हरराव सदैव उत्सुक रहते थे । फलस्वरूप उन्होंने नजीबखां की ओर से ऐसी बहस की कि जान लेने को प्रस्तुत होते हुए भी रघुनाथराव को उसे छोड़ देना पड़ा । हम शीघ्र ही देखेंगे कि अपनी प्राण-भिक्षा पाने वाले नजीबखां ने किस प्रकार अपना जीवन ही अपने प्राणदाता के विरुद्ध षड्यन्त्र रचने में व्यतीत किया । राजनैतिक दांव-पेचों के कारण मरहठे अब तक कई अंशों में दिल्ली के बादशाह के नाम पर कार्य कर रहे थे । ऐसा करने से उन्हें रुकावट कम तथा लाभ अधिक होता था । उनकी यह स्थिति अंग्रेजों की उसी स्थिति के समान थी जिसे वे मरहठों की अवनत दशा के पूर्व सन् १८१८ ई० में धारण किये हुए थे । जिस राजनैतिक पालिसी से १८५७ ई० तक अंग्रेज केवल बादशाह के एजेण्ट होने का बहाना करते चले आये—यद्यपि वास्तव में वे ही बादशाह थे, उसी नीति ने मरहठों को भी शीघ्रता न करने पर विवश किया । क्योंकि ऐसा करने से न केवल मुसलमान ही बल्कि अँगरेज़, फ्रांसीसी, पठान और हिन्दू-राजे सब उनके शत्रु बन जाते । इसका कारण यह था कि इनमें से सब की दृष्टि मुग़ल-सिंहासन और उसके उत्तराधिकार की तरफ लग रही थी और हर एक यही चाहता था कि मुग़ल-सम्राट् तब तक मृत्यु शय्या पर पड़ा रहे, जब तक राज्य के अन्य दावेदार मिट न जांय और वह आसानी से उसके हाथ पड़ जाये । परन्तु उत्तर भारत तथा स्वयं बालाजी द्वारा दक्खिन में प्राप्त सफलता ने मरहठों को इतना शक्तिशाली बना दिया कि बालाजी और सदाशिव भाऊ से लेकर साधारण पुरुष तक, सबके मन में यह बात
बैठ गई कि अब इस कार्य को सम्पूर्ण कर देना चाहिये। मरहठों की बड़ी परिषदों में इन योजनाओं पर विचार होने लगा। अब उन्हें अपनी शक्ति पर विश्वास हो गया था और वे समझने लग गये थे कि अब भारतवर्ष का मुसलमानी राज्य उन्होंने समाप्त कर दिया है। वे अपने आप को एशिया की एक महान् शक्ति समझते थे और अब पूना भारतवर्ष का ही नहीं. प्रत्युत् समस्त एशिया का राजनैतिक केन्द्र बन गया था। मुग़ल-राज्य चूर २ होकर अब उनके पैरों पर लोटता था अतः मरहठों ने उन उन सारी रुकावटों को, जो उन के दिल्लीश्वर बनने में बाधक थीं, नष्ट करने का दृढ़ निश्चय कर लिया। सदाशिव राओ भाऊ ने अन्य मरहठा-सेनापतियों की अपेक्षा इस महत्वपूर्ण कार्य को विशेष गौरव की दृष्टि से देखा और इसे पूर्ण करने या इसी के लिये लड़ते २ प्राण त्याग देने का दृढ़ संकल्प कर लिया। उन लोगों ने मुसलमान-राज्य को नष्ट भ्रष्ट कर डाला। हिन्दुओं ने विजेताओं पर विजय प्राप्त की और भाऊ की वाक्पटुता से प्रभावित हो, उन लोगों ने इस चतुरता से उद्योग करने की ठान ली कि अगले कुछ ही वर्षों में सारे भारत को स्वतंत्र करा लेंगे और खुल्लम-खुल्ला उसे हिन्दू- शासन में लायेंगे।
इस विचार से तीन बड़े युद्धों की आयोजना की गई। पंजाब और मुल्तान में जाकर नये जीते हुए सूत्रों में शांति-स्थापन तथा निय- मित शासन-प्रणाली चलाने का भार दत्ताजी शिन्दे को सौंपा गया और उसे यह आज्ञा दी गई कि वहां से लौटकर वह काशी और प्रयाग को आवे, जहां रघुनाथराव दूसरी सेना लेकर उससे मिलेगा। वहां से ये दोनों संयुक्त सेनायें बंगाल की ओर रवाना हों और समुद्रपर्यन्त सारे देश को मुसलमानों से स्वतन्त्र करादें तथा १७५७ में प्लासी की लड़ाई के विजेता अँगरेज़ों को भी, जो बङ्गाल के मालिक बनने के इच्छुक हैं, वहां से बिल्कुल हटादें। दत्ताजी, जनको जी और रघुनाथ- राओ को उत्तर भारत को, सिन्ध और मुल्तान से लेकर समुद्र तक
[ ६६ ] स्वाधीन करने की आज्ञा देने के साथ ही बालाजी ने अपने पुत्र विश्वास राश्रो भाऊ को साथ लेकर सारे दक्षिण की विजय का भार स्वयं अपने हाथ में ले लिया । तदनुसार अपनी सेनाओं के साथ दत्ताजी ने उत्तर की ओर प्रस्थान किया । बालाजी और भाऊ ने सबसे पहिले निज़ाम का दक्षिण से अस्तित्व मिटाने का कार्य हाथ में लिया । उन्होंने एक बड़ी सेना और तोपखाने के साथ, निज़ाम पर आक्रमण किया । एक बड़े घमसान के युद्ध के बाद सन् १७५० ई० में उद्गिर के स्थान पर बड़ी सफलता पूर्वक विजय प्राप्त की । मुसलमानी सेना नष्ट कर दी गई । निज़ाम इतना डर गया कि उसने शाही मुहरें भाऊ के हाथों मे दे दी और अत्यन्त नम्रता- पूर्वक किसी भी शर्त पर सुलह करने की प्रार्थना की । उनमें संधि हो गई जिसके अनुसार नागर, बरहानपुर, सलहर, मलहर, अशीरगढ़ और दौलताबाद के क़िलों और साथ ही नान्देड़ फूलम्बरी, अम्बद और बीजापुर के ज़िलों पर उनका अधिकार हो गया । भाऊश्रो भी इस सुलहनामे से संतुष्ट हो गया । निज़ाम की अब कोई शक्ति न रही । उत्तरी भाग को छोड़ सारा दक्षिण, इस साल के बीतने से पहले ही, मुसलिम-शासन से मुक्त हो गया । अन्त में नागर और बीजापुर पर मरहठी ध्वजा फहराने लगी । यहां के राजा लोग छोटे विद्रोही शिवाजी के तोराना लेने और वहां पर "हिन्दू-विप्लववादियों" का झंडा खुल्लमखुल्ला गाड़ने पर घृणायुक्त हंसी हंसा करते थे । इस बड़ी राजनैतिक तथा सैनिक विजय के पश्चात्, उद्गिर विजेताओं की इच्छा हैदरअली पर चढ़ाई करके उसका नाश करने की हुई, क्योंकि उसने मैसूर को घेरा हुआ था और चाहता था कि वहां के हिन्दू-राज्य को उलटकर स्वयं बादशाह बन बैठे। वहां के हिन्दूराजा और उनके मन्त्री ने मरहठों के यहां एक बड़ी करुणापूर्ण प्रार्थना लिख भेजी कि आप लोग आकर इस साहसी मुसलमान की अभिलाषा
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असफल करके हमारी रक्षा करें। सदाशिवराव भाऊ ने, जो ऐसे ही समय की प्रतीक्षा में था और चाहता था कि हैदरअली को परास्त करके सारे दक्खिन को मुक्त कराये, फौरन ही हैदरअली पर चढ़ाई करने के विचार से रवाना होने का निश्चय कर लिया, पर उसी समय पेशवा के यहां उत्तर से बड़ी बुरी खबर आई। भाऊ लिखता है, कि सफलता का प्याला, जिसे मैं मुँह से लगाने ही वाला था, मेरे हाथ से छीन लिया गया। जो मरहठा फौज दत्ताजी की अध्यक्षता में उत्तर की ओर गई थी, वह १७५८ ई० के अन्त में दिल्ली पहुँची जहां से पेशवा की आज्ञानुसार नवीन विजित लाहौर और मुल्तान के सूबों का प्रबन्ध करने के लिये वह आगे बढ़ा। मावा जी शिन्दे और त्रिम्बक बापूजी को अटक तक का प्रबन्ध करने के लिये नियत करने के बाद उसने लाहौर, सरहिन्द तथा अन्य प्रसिद्ध स्थानों में सेनायें रक्खीं। अब पंजाब का काम सम्पूर्ण हो जाने के कारण वह वहां से चला आया और अपने सुपुर्द किये गये दूसरे काम के लिये गंगा पार करके पटना पहुँचा, जहां उसने अंग्रेजों के साथ हिसाब चुकाने के पश्चात् हिन्दू-राज्य को समुद्र-तट तक फैलाना था। सींधिया द्वारा पराजित नजीबखां, जिसने दत्ताजी को बंगाल की लड़ाई में सहायता देने तथा विश्वासपूर्वक सेवा करने की झूठी प्रतिज्ञा की थी, धीरे धीरे अपनी शक्ति और प्रभाव को बढ़ा रहा था। इस पर क्रोधित होकर पेशवा ने दत्ताजी को लिखा, “तुम कहते हो कि अगर हम नजीबखां को 'बख्शी' बना दें तो वह हमें तीस लाख रुपया देगा, किन्तु मैं आज्ञा देता हूँ कि उसका एक पैसा भी न छूना। नजीबखां आधा अब्दाली है, उसका विश्वास न करो और एक नीच जहरीले सांप को न पालो।” पर दत्ताजी ने पेशवा की इस आज्ञा की अवहेलना करके बड़ी भारी भूल की। वह उसकी छटी मक्कारी पर ऐसा
[ १०१ ] विमोहित हो गया कि उसने नजीबखां की, गंगा पार करने के लिये नावों का पुल बनाने की प्रतिज्ञा पर पूर्ण विश्वास कर लिया। बगल पर हमला करने में एक ओर मरहठों को देर होती गई, दूसरी ओर नजीबखां उनके विरुद्ध मुसलमानों का गुट तैयार करने की विशेष सुविधा मिलती गई। इस कार्य में उसे इतनी सफलता प्राप्त हुई कि उसने दिल्ली के बादशाह की हस्ताक्षरयुक्त एक चिट्ठी अब्दाली के पास भेज दी जिसमें उससे एक बार फिर भारत पर आक्रमण करने की प्रार्थना की गई। इस उत्साह भरी प्रार्थना ने धार्मिक-हठी पठानों को धर्म और अल्लाह के नाम पर जगा दिया। क्या अब्दाली हिन्दुस्तान को विध- र्मियों और मूर्ति-पूजकों के पंजे से छुड़ाकर मुसलमानी बादशाहत को बचाकर धर्म का रक्षक नहीं हो जायगा ? उधर अब्दाली भी अपने लड़के की हार से लज्जित हुआ पड़ा था, क्योंकि मरहठों ने हिन्दुस्तान का ताज उसके हाथ से छीन लिया था। उन्हों ने उसे मुल्तान और पंजाब से निकाल ही नहीं दिया था वे तो प्रत्युत काबुल और कंधार पर भी "हिन्दुस्तान के राज्य का भाग होने" का दावा करने लगे थे। और इसका बदला वह कुछ भी न ले सका था। अब वह फिर भारत पर आक्रमण करने, इस राज्य को अधिकृत करने तथा मरहठों की हिन्दू- पद-पादशाही स्थापित करने की महत्त्वाकांक्षा को, जो सामान्यतः सम्पूर्ण हो चुकी थी, नाश करने को उद्यत हो गया। उसने इस गुट का नेता बनने का वचन दे दिया और एक बड़ी सेना के साथ सिन्ध पार करके लाहौर ले लिया। अब्दाली के हमले का समाचार ज्यों ही दिल्ली पहुँचा, नजीबखां ने नकाब उतार दी और खुल्लमखुल्ला अब्दाली का अनुयायी बन गया। अब दत्ताजी को पेशवा की आज्ञा की अवहेलना करने की अपनी भूल मालूम हुई और उसने यह समझ लिया कि नजीब और शुजा ने पूरी तरह धोखा देकर उसे दुश्मनों के बीच घेरकर फंसा दिया है। शुजा एक तरफ था और दूसरा ओर नजीब, रुहेले तथा पठान थे। पीछे से
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अब्दाली बड़ी भारी सेनाओं के साथ बढ़ा आ रहा था। अटक और लाहौर में पड़ी हुई मरहठों की छोटी २ सेनाओं को इस सुविशाल फौज के मुकाबले में परास्त होना पड़ा। मरहठों के अतिरिक्त हिन्दुओं की दूसरी एकमात्र शक्ति, जिसने बड़ी वीरता से उत्तर-भारत में मुसलमानों का सामना किया, उन सिखों की थी जो अभी २ विकसित हो रहे थे। इन बहादुर शूरवीरों ने शक्तिभर उन्हें रोकने तथा उनको नष्ट करने का प्रयत्न किया। पर अभी तक ये लोग सुसंगठित नहीं थे, अतः वे अपने सूबे को भी स्वतन्त्र न कर सके। वह समय अभी आने वाला था। मार्ग में उसका किसी ने विशेषरूप से मुकाबला न किया। इस प्रकार वह अविरुद्ध गति से शीघ्र ही अपनी सेना सहित सरहिन्द पहुँच आया। राज- पूताने तथा अन्य स्थानों के बहुत से राजे और राजकुमार अब्दाली से सहानुभूति रखते थे—उसी अब्दाली के साथ जिसने कि हिन्दुओं के पवित्र स्थान मथुरा का नाश किया था और जो हिन्दुओं का कट्टर वैरी था। केवल एक दत्ताजी की सेना थी जो अब्दाली के "दिल्ली- सम्राट्" बनने के मार्ग में बाधक थी। दत्ताजी ने होल्कर को शीघ्र सहायता के लिये आने को लिखा, पर नजीब के उस धर्मपिता, सेनापति होल्कर ने अपने को छोटे २ सरदारों के साथ लड़ने में व्यस्त रखना ही उचित समझा। इस प्रकार अपार शत्रु-सेना में फंसी हुई मरहठा फौज को अपना जान बचाने का केवल एक मार्ग था कि वह दिल्ली छोड़ कर हट जाय। प्रत्येक अनुभवी और शूरवीर पुरुष ने दत्ताजी पर जोर दिया कि होल्कर के आने तक यहां से हट चलिये। उसके वीर भतीजे जनको जी राव ने भी यही प्रार्थना की, पर दत्ताजी ने किसी की एक न मानी। जब वह अनुभव करने लगा कि मेरे भोलेपन के कारण ही इस सेना की यह दुर्गति हुई तो वह चिन्ता-सागर में डूब गया। उसने हिन्दुओं के कट्टर दुश्मन नजीब की जान बचाई थी और उस पर विश्वास किया था। पर अब उसने दृढ़ निश्चय कर लिया कि अब इस ओर अधिक भीरुता न दिखायेगा। इसलिये जो भी उससे पीछे हटने को कहता, वह
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उसे केवल एक ही उत्तर देता था कि—"जो चाहें हट जांय। मैं किसी को विवश नहीं करता, पर मैं अपनी जगह से नहीं हिल सकता। हट कर मैं नाना साहब और भाऊ को कौन-सा मुंह दिखलाऊंगा ? मैं लड़ाई में अब्दाली का सामना करूंगा और यदि ईश्वर की इच्छा हुई तो या तो उसे मिटा दूंगा, या लड़ते हुए अपने प्राण दे दूंगा।" इसी बीच में, गाज़ीउद्दीन को पता लग गया कि बादशाह पठानों के षड्यन्त्र में शामिल है और इस प्रकार मुझे मार कर मेरा पद छीनना चाहता है। अतएव उसको पृथक् करके मार डाला और दूसरे मनुष्य को गद्दी पर बिठा कर मरहठी सेना से जा मिला ! दत्ताजी ने अपनी प्रतिज्ञानुसार ही कुरुक्षेत्र में अब्दाली का सामना किया। उसकी व्यक्तिगत वीरता के कारण मरहठे सिपाही इतने उत्तेजित हो उठे कि अब्दाली को विवश होकर पीछे हटना पड़ा और उसे विश्वास हो गया कि वह अकेला सींधिया का सामना करने में असमर्थ है। अतएव उसने यमुना पार करने का उद्योग किया, जिसमे सफलता प्राप्त करने के पश्चात् शुक्रताल पर नजीबखां की सेना से जा मिला। शुजा भी अहमदखां, बङ्गश और कुतबशाह के साथ उनसे वहां जा मिला। मुसलमानों का गुट इस बार इतना दृढ़ हो गया जितना इससे पहले कभी नहीं हुआ था। जब यह स्पष्ट दिखाई देने लगा कि इस ज्वार का रोकना अकेले दत्ताजी के लिये असम्भव है। इसलिये उसके सलाहकारों ने एक बार फिर पीछे हटने के लिये कहा। पर उस वीर ने पहले ही की तरह दृढ़ उत्तर दिया "जो चाहें चले जांय, दत्ताजी अवश्य क्षत्रिय-धर्म का पालन करेगा"। इस वीर सेनापति के मुख से निकले हुये ये शब्द निरर्थक न गये, प्रत्युत इनका बड़ा प्रभाव पड़ा और किसी ने उसका साथ न छोड़ा। १० जनवरी सन् १७६० ई० को मरहठी सेना यमुना के घाट के लिये रवाना हुई, ताकि वह अब्दाली को, जो यमुना पार करने के उद्योग में था, पीछे हटाये। लड़ाई प्रारम्भ हुई और क्रमशः बायाजी,
[ १०४ ] मालोजी तथा अन्यान्य मरहठे-सेनापति वीरता के साथ अपार शत्रु सेना का सामना करते हुये शहीद हो गये । दुश्मन मिल गये और एक दूसरे का साथ देने लगे । संयोगवश मरहठों की ध्वजा रुहेला और पठान सेना के बीच में घिर गई, जिसे बचाने के लिये मरहठे आगे बढ़े और घमसान का युद्ध होने लगा । दत्ताजी और जनकोजी झण्डे को खतरे में देखकर आपे से बाहर हो गये । दोनों ही टूट पड़े और लगे शूरवीरता दिखाने । एकाएक बहादुर जनकोजी को गोली लगी और वह घायल होकर घोड़े से गिर पड़ा । दत्ताजी ने इसे देखा, पर किसी रक्षित जगह पर जाकर लड़ने के बजाय सीधे आगे बढ़ा । जो शत्रु सामने आया माग गया, और अपने अनुयायियों के साथ दत्ताजी आगे बढ़ता ही गया, और शत्रु सेना में उलझ गया ! आखिर होनी होकर ही रही । दत्ताजी को भी एक गोली लगी, जिसमें घायल होकर वह पृथ्वी पर गिर पड़ा । नजीबखां के धर्मगुरु और पठान षड्यन्त्र के एक उत्साही कार्य- कर्त्ता कुतुबशाह ने मरहठा-सेनापति को गिरते देखा और वहां जाकर इस प्रकार व्यङ्गपूर्ण शब्दों में पूछा “पटेल, क्या हम लोगों से फिर लड़ोगे ?” मरते हुये जनरल ने निर्भीक उत्तर दिया, “हाँ, अगर बचा तो मैं फिर लड़ूंगा ।” इन शब्दों का उस वीर के मुख से निकलना था कि उस नीच और कायर का क्रोध भड़क उठा । उसने घायल योद्धा को पैर की ठोकर मारी और तलवार खींच कर बड़े गर्व के साथ विजयरूप में उसका सिर काट कर ले गया । इस प्रकार दत्ताजी का अन्त हुआ । संसार-भर में आज तक इस मरहठा वीर की तरह किसी भी सिपाही ने ऐसी सच्चाई, ईमानदारी के साथ अपनी राष्ट्रीय पताका को न बचाया होगा और न ही उसकी रक्षा में ऐसी वीरता-पूर्वक अपना बलिदान दिया होगा । इस वीर की मृत्यु और मरते हुये इस योद्धा के प्रति किये गये कायरतापूर्ण अपमान का समाचार महाराष्ट्र में पहुँचा । प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में प्रतिहिंसा की अग्नि धधक
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उठी और सारे मनुष्यों ने एक स्वर हो बदला लेने की आवाज़ उठायी। बालाजी और भाऊ ने अभी इसी सप्ताह उद्गीर के स्थान पर शानदार विजय प्राप्त की थी और चाहते थे कि हैदरअली को कुचल कर दक्खिन स्वतन्त्र करने का काम सम्पूर्ण कर दें। ठीक उसी समय दत्ताजी की पराजय और उनका मृत्यु-समाचार उनको मिला। उन लोगों ने समयोचित कार्य करने की तैयारी में एक क्षण भी देर नहीं की। यद्यपि उसी सप्ताह उन्होंने दक्षिण में एक बड़ा युद्ध किया था, तो भी एक दिन भी विश्राम न लेकर, अपने सेनापतियों और मन्त्रियों को पटदूर में इकट्ठे होने की आज्ञा दी और इस गम्भीर प्रश्न पर भली-भाँति विचार करके अब्दाली का सामना करने और उसके मालवा पहुँचने से पहले ही उससे लड़ने के लिये एक शक्तिशाली सेना भेजने का निश्चय किया। महाराष्ट्र- नवयुवक सेना में भरती हो गये। शमशेर बहादुर, विट्ठल शिवदेव, मानाजी घैरडे, अन्ताजी मनकेश्वर, मने, निम्बालकर तथा बहुत से अन्यान्य पुराने योद्धा और सेनापतियों ने फिर अपनी-अपनी बागडोर सम्भाली। उद्गीर-विजेता भाऊ सेनापति बनाया गया और बालाजी के ज्येष्ठ पुत्र नवयुवक राजकुमार विश्वासराव भी भाऊ के साथ गये। यह राजकुमार अभी उद्गीर में ख्याति पा चुका था और अपनी जाति का आशा-प्रदीप था। उस समय का विख्यात इब्राहीमखां गारदी, तोप- खाने का अध्यक्ष बनाया गया। दामाजी गायकव ड़ और सन्तोजी बाघ तथा अन्यान्य सेनापति क्रमशः आगे मिलाते गये। कई उत्तर भारतीय राजपूत राजाओं के यहां भी दूत और पत्र भेजे गये कि वे हिन्दुत्व के विरोधी तथा मथुरा गोकुल नष्ट करने वाले विधर्मियों के साथ युद्ध में उनको सहायता करें। विन्ध्याटवी और नर्मदा नदियों को पार करके मरहठा सेना चम्बल तक जा पहुँची। मरहठों की इस विशाल सेना और शक्ति को देखकर समस्त उत्तर भारत भयभीत और स्तम्भित हो गया। शत्रु भाव रखने वाले सब राव, राने, नवाब और खां साहबान हर
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गये; किसी को मरहटों की ओर उंगली उठाने का भी साहस न हुआ । शीघ्र ही जनकोजी शिन्धे भी अपनी सेना के साथ भाऊ से आ मिला। सारी महाराष्ट्र-सेना ने उस नौजवान और सुन्दर शूरवीर राजकुमार का बड़े उत्साह और प्रेम से स्वागत किया और 'बदान' के युद्ध में वीरगति प्राप्त उसके चाचा दत्ताजी की पुण्यस्मृति की प्रतिष्ठा उसी के प्रति प्रदर्शित की। भाऊ ने उस शूरवीर राजकुमार के उपलक्ष में, जिसने केवल १७-१८ वर्ष की अवस्था में ही कई लड़ाइयों में विजय प्राप्त की थी, और अपनी सेना तथा धर्म-रक्षा के लिये कितनी ही भयानक चोटें खाई थीं, एक वृहत् सभा की, और उसको सर्वसाधारण के सामने बहुत से बहुमूल्य उपहार तथा वस्त्रादि भेंट किये। जिस समय वीर विश्वासराव, जो बालाजी की अनुपस्थिति में महाराष्ट्र जाति का अतिप्रिय नेता था, जनकोजी से मिलने के लिये आगे बढ़ा, तब उस विशाल जातीय सभा में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति का हृदय तरंगित हो गया। ये दोनों ही नव- युवक एक से एक सुन्दर, बहादुर और अपनी जाति वालों के आदर्श और अभिलाषा को पूर्ण करने वाले तथा हिन्दू-जाति की उठती हुई आशा की सजीव मूर्ति थे। नजीबखां को धर्मपुत्र बनाने और दत्ताजी की सहायता के लिये आने में असावधानी करके भयंकर भूल करने वाले मल्हारराव होल्कर भी अपने किये का फल भुगत कर यानी दत्ताजी की पराजय के पश्चात् स्वयं अब्दाली से पराजित होकर भाऊ से आ मिले। अब भाऊ की इच्छा यमुना पार करके अब्दाली को नदी-तट पर पहुँचने से पहले ही हराने की हुई। उसने गोविन्द पन्त बुन्देला को आज्ञा दी कि तुम सुअवसर पाते ही अब्दाली की फ़ौज के पिछले भाग पर आक्रमण करो और उसकी रसद पहुँचनी बन्द कर दो। पर नदी में बाढ़ आई हुई थी और इतनी शत्रु सेना उसके दूसरी ओर पड़ा था, इसलिये उसका पार करना अत्यन्त दुष्कर था; इसलिये भाऊ ने दिल्ली जाकर उसे अब्दाली के पंजे से छुड़ाने का निश्चय किया। उत्तर भारत के समस्त राजाओं में केवल
[ १०७ ] जाट ही मरहठों की सहायता के लिये आये । भाऊ ने स्वयं आगे कर बड़ी प्रतिष्ठा के साथ उनका स्वागत किया और दोनों ने पवित्र जल स्पर्श करके अन्त तक शत्रु से युद्ध करने की शपथ खाई। अब सब की आँखें दिल्ली की ओर फिरीं । हिन्दू और दोनों ही ऐतिहासिक राजधानी दिल्ली को अधीन करने का महत्व करने लगे। भाऊ ने सिन्धिया, होल्कर और बलवन्तराव मेहेंदडाले सेनाओं को दिल्ली पर आक्रमण करने के लिये भेजा । पठानों ने, इस पर अधिकार जमाये बैठे थे, बड़े उत्साह के साथ सामना किया- मरहठों के साथ देर तक लड़ने में असमर्थ होने के कारण उन्होंने में शहर को मरहठों के हाथ सुपुर्द कर दिया। शहर विजय मरहठा-सेना ने किले पर आक्रमण किया । मुसलमानों ने किले की के लिये बड़ी वीरता दिखलाई, पर मरहठों के सामने एक न चली उनकी भयंकर शक्तिशाली तोपों ने मुसलमानों के किले पर उनका अधि- कार रखना असम्भव कर दिया । मुसलमानी सेना ने हार मान ली राजधानी और किला हाथ आ जाने का समाचार सुनकर, हिन्दू-आन्दो- लन के पक्षपाती सभी मनुष्यों ने बड़ी खुशी मनाई । मरहठी-सेना ने बड़ी धूमधाम से दिल्ली में प्रवेश किया और ने मरहठी ध्वजा पाण्डवों की राजधानी में गाड़ दी। पृथ्वीराज के हिन्दू या दृग्भक्त सेना के लिये यह पहला ही अवसर था जबकि एक स्वतन्त्र झण्डे के तले इस उत्सव के साथ दिल्ली में प्रविष्ट हुई। आखिरकार पठानों, रुहेलों, मुगलों, तुर्कों, शेखों और सैयदों के प्रयत्न करने पर भी मुसलमानी हलाली झण्डा हिन्दुस्तान की राजधानी पर स्थिर न रह सका और उसके स्थान पर हिन्दू-पद-पादशाही का झण्डा लहराने लगा। शक्तिशाली मुस्लिम फ़ौज के साथ यमुना के दूसरे किनारे पर पड़ा हुआ अब्दाली कुछ भी न कर सका। सदाशिवराव अनुभव करने लगा कि चाहे एक ही दिन के लिये
[ १०८ ] क्यों न हो, हिन्दू-पद-पादशाही का स्वप्न मेरी आँखों के सामने पूर्ण हो ही गया। यदि कोई जाति अपनी वीरता से एक दिन के लिये भी ऐसी परिस्थिति उत्पन्न कर सके, तो वह दिन सचमुच उसकी नसों में जीवन का रक्त प्रवाहित होने का ज्वलन्त प्रमाण है। ऐसा भाग्यशाली दिन, अपनी अल्प आयु में भी, अपनी विकसित शोभा में शताब्दियों की सफलताओं, सत्कर्मों, प्रसन्नताओं और आपत्तियों तथा कठिनाइयों को आँखों के सामने ला देता है। एक उसी दिन ने भली-भाँति साबित कर दिया कि सात सौ वर्ष के मुसलमानों के अन्याय हिन्दुओं की आत्माओं या उनके फिर युवावस्था प्राप्त करने के विचार को कुचल न सके। उन्होंने केवल अपने आपको उनके बराबर ही साबित नहीं किया, प्रत्युत उन पर विजय भी प्राप्त की। भाऊ यदि चाहता तो विश्वासराव को सारे भारतवर्ष का महा- राजाधिराज बना देता और इस प्रकार उसने हिन्दू-पद-पादशाही का आरम्भ कर दिया होता। लेकिन इस बात में शीघ्रता न करके उसने राजनैतिक बुद्धिमत्ता का पर्याप्त परिचय दिया। उसने सोचा कि मरहटों के डर से हिचकने वाले मुसलमान ही नहीं, बल्कि ऐसा करने से उत्तर- भारत के सारे हिन्दू-राजे भी शत्रु बन जायेंगे; तो भी उसने सब लोगों की परीक्षा करने और इस अद्वितीय शुभ अवसर का दुश्मन और दोस्त दोनों पर समयोचित प्रभाव डालने का निश्चय कर लिया। इसलिये इस महान् कार्य के उपलक्ष में उसकी आज्ञा से एक शाही दरबार किया गया जिसमें विश्वासराव ने सभापति का आसन ग्रहण किया। उसमें महाराष्ट्र के प्रत्येक भाग के प्रतिनिधि उपस्थित थे। इतना ही नहीं, बल्कि शूर- वीरता, वैभव, राजनीति, कुशलता और विद्वत्ता सब वहां सुशोभित थीं। दरबार आरम्भ हुआ। अश्वारोही सेना और तोपखाने, सहस्रों घोड़े और हाथी तथा कई हज़ार सिपाही और योद्धा जो हिन्दू-झण्डे को उत्तर में गोदावरी से सिन्ध तक और दक्षिण में समुद्र-तट तक ले गये थे; सहस्र नरसिंगों, तुरहियों, बन्दूकों और फ़ौजी ढोलों के साथ विजय की
[ १०६ ] सलामी देने को टूट पड़े। तथ सेनापति के पीछे सेनापति, सरदार, गवर्नर और वाइसराय नम्रतापूर्वक आगे बढ़े और अपने राजकुमार का हार्दिक अभिनन्दन किया, ठीक उसी प्रकार जैसा कि जाति का सभापतित्व ग्रहण करने वाले बादशाह का करते हैं, उसका विजेता के रूप में आदर किया। उस अद्भुत दृश्य के वालों ने उसका अर्थ समझ लिया। इसमें भाग लेने वाले प्रत्येक ने अनुमान किया कि यह उस बड़े राज्य-तिलक दरबार का पूर्व (रिहर्सल) है, जिसमें, अगर ईश्वर ने चाहा तो, इस नवयुवक • कुमार को सारे भारतवर्ष के महाराजाधिराज-पद से विभू- किया जायगा। १४ पानीपत मुसलमान भी दिल्ली की इस महान् कार्यवाही का अर्थ समझने से वञ्चित न रहे। यह समाचार अग्नि की तरह चारों ओर गया कि मरहठों ने अपने राजकुमार को समस्त भारतवर्ष का महा- राजाधिराज अभिषिक्त किया है। नजीबखां और दूसरे मुसलमान- नेताओं ने इन कार्यों की ओर इशारा करके अपने डर को न्यायोचित सिद्ध किया और मुसलमानों को इस गम्भीर परिस्थिति का बोध कराने का उद्योग किया। उन्होंने जोरदार शब्दों में घोषणा की कि हिन्दू- पद-पादशाही ही नहीं, “ब्राह्मण-पद-पादशाही' भी स्थापित हो गयी है, इसलिए प्रत्येक मुसलमान, जो अपने नबी का सच्चा भक्त है काफिरों की सेना से लड़ने के लिए रणक्षेत्र में उतर आये। परन्तु नजीबखां और अन्यान्य मौलवियों की तरंगभरी, जोश में लाने वाली, इस्लाम के नाम पर की गई वक्तृताओं की अपेक्षा, शुजां और दूसरे मुसलमानों के स्वार्थ-भाव का पलड़ा अधिक भारी रहा।
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रुहेले जैसे कट्टर हठधर्मियों की आंखें भी खुलने लगीं। अब्दाली के होते हुए भी जो सफलता मरहटों ने प्राप्त की थी, उससे प्रभावित हो, लोगों को विश्वास हो गया कि अब्दाली मरहटों को रोकने में असमर्थ है। शुजा ने भाऊ को पत्र लिखा कि अब्दाली से मिल जाने पर वस्तुतः मैंने भूल की थी जिसका स्मरण करके मुझे बड़ा दुख हो रहा है। भाऊ ने भी उसे मिला लेने में ही बुद्धिमत्ता समझी और अपने राजदूत द्वारा यह कहला भेजा कि मरहठे मुगल-राज्य को उलटना नहीं चाहते। अगर शुजा अब्दाली का साथ छोड़ दे तो हम उसी को प्रसन्नतापूर्वक शाहआलम का, जिसे कि वे शाहन्शाह मानते हैं, वज़ीर बना देंगे। रुहेलों ने भी आगा-पीछा सोचने और अब्दाली का साथ छोड़ने की बातचीत प्रारम्भ कर दी। यह देखकर कि किस प्रकार सारी परिस्थिति उसके प्रतिकूल बन रही है, अब्दाली ने भी मरहटों के के साथ सन्धि की बातचीत करने का निश्चय किया और राजदूत शर्तों पर विचार करने के लिए भेज दिया। लेकिन उसकी शर्तों के मुताबिक़ पंजाब छोड़ने के लिये भाऊ तैयार न था, साथ ही वह बहसों के धोखे में पड़कर इस सुअवसर को, जिससे वह बहुत कुछ प्राप्त सकता था, हाथ से न जाने देना चाहता था इसलिये ऊपरी चित्त से सुलह की बातचीत कुछ अंशों में जारी होते हुये भी उसने उत्तर की ओर बढ़कर अब्दाली को कुंजपुर में एक बड़े महत्वपूर्ण स्थान से, हटा देने का विचार किया। एक बड़ी सेना, जिसका सेनापति समदखां था, उस स्थान की रक्षा कर रही थी। क़ुतुबशाह भी वहीं था। ज्यों ही उन्हें मालूम हुआ कि मरहटे आक्रमण करना चाहते हैं, वे खूब तैयारी करने लगे। अब्दाली ने भी समदखां और क़ुतुबशाह को यमुना के दूसरे पार से आज्ञा भेजी, कि जैसे भी हो, क़िले की रक्षा करो, और उन्हें यह विश्वास भी दिलाया कि मैंने सहायता के लिये और सेना भी रवाना कर दी है।
[ १११ ] दिल्ली छोड़ने पर भाऊ को उचित जान पड़ा कि अपना कोष पूर्ण कर लूँ। उसे आशा थी कि गोविन्दपन्त बुन्देला अब्दाली की रसद पहुँचनी बन्द कर देगा और उसके पिछले भाग पर आक्रमण करेगा, तथा शुजा और रुहेलों के सूबों पर चढ़ाई करके उन्हें परेशान करता रहेगा, पर गोविन्दपन्त अपने सभी कामों को पूर्ण करने में असफल रहा। बुन्देले से किसी प्रकार की आर्थिक सहायता न पाने पर भाऊ कोषपूर्ति का और ही उपाय सोचने लगा, क्योंकि कोष ही उसकी लड़ाई का मूल था। उसका ध्यान शाही सिंहासन के ऊपर की चांदी की छत की ओर आकर्षित कराया गया जिसकी कीमत क़रीब १२ लाख रुपये से अधिक थी। उसने उसे तोड़कर टकसाल में भेज देने की आज्ञा दी। उस समय गुलामी और मिथ्याविश्वास ने फिजूल शोर मचाना प्रारम्भ किया। कहा जाता है कि जाट भी यह सोचकर रुष्ट हो गये कि शक्तिशाली मुगलों के शाही तख्त को, जिन्हें कि भगवान् ने हिन्दुस्तान का महाराज बनने के लिए उत्पन्न किया है, इस प्रकार अपमानित करना देव स्वत्व-अपहरण है। यदि ऐसा मान भी लिया तो जाटों को सोचना चाहिये था कि अगर प्रत्येक सफल कार्य जिसमें सफल-अपहरण भी सम्मिलित है, ईश्वर की इच्छानुसार ही है और इसके कारण ही वह पवित्र और ईश्वरीय बन जाता है, शिवाजी द्वारा स्थापित रायगढ़ भी एक सफल कार्य था, उसे ईश्वरीय समझा जाना चाहिए था। रायगढ़ की स्थापना का उद्देश्य धार्मिक अन्याय या अत्याचार करना न था, बल्कि उसका अस्तित्व तो जातीय स्वतन्त्र जीवन बिताने तथा आत्मरक्षा और स्वतन्त्रता की भावना से परिपूर्ण था। लेकिन जब औरङ्गजेब अग्नि और तलवार तथा धर्मान्धता और अशान्ति की सारी सेनाओं के साथ दक्षिण में हिन्दुओं के जातीय जीवन को कुचलने और इस प्रकार नवीन हिन्दू- राज्य को मिटा देने के लिये आया, तो क्या उसने शिवाजी के सिंहासन
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को टुकड़े टुकड़े करने में आनाकानी की थी ? फिर वे क्यों मुगलसिंहा- सन के लिये इतने चिंतित हो रहे थे जो समस्त हिन्दुओं के लिये जिनमें जाट भी सम्मिलित हैं-केवल एक शैतानी शक्ति का चिन्ह था। जो सहस्रों हिन्दू-शहीदों के खून से लिप्त तथा उनके मन्दिरों और घरों को नष्ट करके बनाया गया था और जिसका अस्तित्व ही हिन्दुओं की जातीय और राज- नैतिक मृत्यु थी। औरङ्गजेब ने हिन्दुत्व के शाही तख्त को टुकड़े टुकड़े करने के लिये अपना फौलादी पंजा उठाया था, उस समय न्यायशील देवता तथा हिन्दुस्तान के रक्षक स्वर्गीय दूत ने उसके हाथ से हथौड़ा छीन लिया—और देखो, आज उसी का शाही तख्त इसके नीचे टुकड़े- टुकड़े होकर पड़ा है । सिपाहियों की तनख्वाह चुकाने के बाद, भाऊ कुंजपुर के लिये आगे बढ़ा । शिन्दे, होल्कर और विठल शिवदेव सेनापति थे । पठान बड़ी वीरता से लड़े । क़िला और शहर अपनी मज़बूती के लिए प्रसिद्ध थे, लेकिन अच्छी तोपों तथा सिंधिया और अन्यान्य सेनापतियों द्वारा संचालित महाराष्ट्र-फौज का मुसलमान देर तक सामना न कर सके । मुसलमानी सेना के बीच कुछ शिगाफ़ होते ही दामाजी गायकवाड़ ने 'हर हर' जयघोष के बीच अपनी सेना को आगे बढ़ने की आज्ञा दी और उसकी सेना अन्धा-धुन्ध घोड़े दौड़ाती हुई उसके बीच कूद पड़ी । भीषण युद्ध हुआ जिसमें खून की नदियां बहीं । सहस्रों पठान मारे गये । क़िला ले लिया गया । मुसलमानों के खेमे लूट लिये गये और उनके सैंकड़ों आदमी पकड़ लिये गये । उनका सेनापति समदखां भी मरहटों के हाथों में गिरफ्तार हो गया । वह एक बार पहले भी पिछले युद्ध में रघुनाथराव द्वारा बन्दी किया गया था, पर मरहटों ने रुपया लेकर उसे छोड़ दिया था । छूटने के पश्चात् उसने जान की परवाह न करके मरहटों का विरोध किया और एक फिर उनके हाथ में पड़ गया । युद्ध-समाप्ति पर भाऊ खड़ा २ होल्कर और सिंधिया को कुछ
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आज्ञाएं दे रहा था, और हिन्दू-सेना के बलकी प्रशंसा कर रहा था जिसने उस काम को तीन दिन में पूरा कर लिया था, जिसकी पूर्ति में शत्रुओं को अगर उतने महीने नहीं, तो कम से कम उतने सप्ताह जरूर लगने की आशा थी। ठीक उसी समय हाथी पर सवार दो युद्ध के प्रसिद्ध कैदी लाये गये। उनमें से एक था, पठानों की कुंजपुर फौज का सेनापति समद खां और दूसरा था, नजीब का शिक्षक, पठान षड्यन्त्र- कारियों का नेता तथा मरते हुये वीर दत्ताजी को लात मारने वाला और नीचतापूर्वक 'काफिर' इत्यादि कह कर उसका अपमान करने वाला कुतुबशाह । कुतुबशाह को देखते ही मरहठा-खून खौलने लगा। दत्ताजी का बदला लेने का ख्याल उसकी आँखों के सामने आया। “क्या तुमने ही मरते हुये हमारे दत्ताजी को काफिर कहते हुये लात मारी थी?” कुतुब शाह ने जवाब दिया—“हां, हमारे धर्म में मूर्तिपूजक को मारना और उसके साथ काफिर की तरह घृणा करना पुण्य कार्य माना गया है।” “तब कुत्ते की मौत मरो”—भाऊ ने गर्ज कर कहा। सिपाही उस अपराधी को थोड़ी दूर एक तरफ ले गये और उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। दत्ताजी का बदला पूर्ण रूप से ले लिया गया और समद खां की भी वही गति हुई। नजीबखां का परिवार भी, उसके दामाद और अन्य लोगों के साथ, मरहठों के हाथ पड़ गया। लेकिन उन लोगों के साथ कुतुबशाह जैसी सख्ती नहीं बरती गई। सच तो यह है कि युद्ध करते हुए जो लोग बन्दी किये गये थे, वे यदि मार भी डाले जाते तो भी अब्दाली को किसी प्रकार भी उनके मनुष्यत्व पर टीका करने का कोई अधिकार न था क्योंकि वह और उसके सहायक मुस्लिम-बादशाह ऐसे निष्ठुर
महापापों के स्वयं अपराधी थे । उन्होंने पंजाब, बढ़ान तथा अन्य स्थानों में रण-भूमि में हारे हुये मरहटों की नाकें काट ली थीं और उनके सिरों को काट कर शाही खैमे के सामने ढेर लगा दिये थे और उसी भयंकर चिता को उन्होंने जय-स्तम्भ समझा था । मरहठे भी इन पाशविक कार्यों का अनुकरण कर सकते थे, पर उन्होंने कभी ऐसा नहीं किया । और न ही उन लोगों ने मसजिदों को ढाकर, कुरान को जला कर और पवित्र स्थानों पर लूट मचा कर अपने को प्रसिद्ध किया । अब्दाली, औरंगजेब, नादिर और मुसलमानों ने सिद्धान्ततः ऐसे दुराचार किये थे ! कुंजपुर में हारने के कारण अब्दाली की प्रतिष्ठा और भी कम होने लगी । मरहठे उसकी सेना को, जो दस हज़ार के लगभग थी, बुरी तरह से पराजित करके उसकी आंखों के सामने ही विजयदशमी या विजय का दिन बड़ी धूमधाम से मना रहे थे । चूंकि वह एक योग्य सेनापति था, उसने फौरन सोच लिया कि यदि कोई बड़ा खतरा उठा कर मैं कोई साहसिक कार्य करके न दिखा दूंगा तो मेरा काम बिगड़ जायगा । उसी समय उसने किसी प्रकार भी यमुना पार करके बागपट के स्थान पर पहुँच कर कुंजपुर स्थित मरहठी फ़ौज को उनके आधारभूत दिल्ली से काटने का दृढ़ निश्चय कर लिया । अपने इस कार्य में वह सफल हुआ और एक लाख मनुष्यों की सेना, मरहटों और उनकी देहली लाइन के बीच खड़ी कर दी । इसी समय उसे एक और मौक़ा हाथ आ गया, जो पीछे चल कर उसके लिये अपनी सैनिक शक्तियों से अधिक लाभदायक सिद्ध हुआ । वह यह था कि यद्यपि मरहटों का सम्बन्ध अपनी आधार फ़ौज से कट गया था तो भी अब्दाली का सम्बन्ध शुजा और रुहेलों के देश से नहीं छूटा था । पर इसके कारण उसे इतना लाभ नहीं पहुँचा जितना कि गोविन्दपन्त के भाऊ की, रसद बन्द करने वाली, आज्ञा न पालन कर सकने के कारण पहुँचा । अब्दाली ने मरहटों को सामना करने के लिये भलीभांति सुस- ज्जित पाया । बागपट पर ज्यों ही उसने यमुना पार की, उसी समय
[ ११५ ] भाऊ युद्ध करने के लिये विख्यात कुरुक्षेत्र की ओर बढ़ा और उसने पानीपत में खेमा लगा दिया। मरहठों को पूर्ण विश्वास था कि यदि गोविन्दपन्त और गोपाल गणेश ने अपना कार्य्य अच्छी प्रकार से किया और शत्रुओं की रसद बन्द करके उसके पिछले भाग पर आक्रमण किया तो वे अब्दाली को पीस डालेंगे। पर गोविन्दपन्त उस काम के करने में बुरी तरह असफल रहा। आवश्यक आज्ञा, धमकियां—भाऊ ने सभी का आश्रय लिया, पर गोविन्दपन्त ने इतना भी उद्योग नहीं किया जितना वह कर सकता था। जाटों ने पहले ही मरहठों का साथ छोड़ दिया था और वे एक सुरक्षित दूरस्थ स्थान भरतपुर की राजधानी से युद्ध का तमाशा देख रहे थे। तो भी उनकी यह प्रशंसनीय बात उल्लेखनीय है कि उन्हों ने कभी कभी मरहठों की रसद आदि द्वारा सहा- यता की थी। लेकिन राजपूतों ने तो उतना भी नहीं किया। उनमें कोई भी मरहठों का मुक़ाबिला करने का साहस नहीं रखता था, और बहुतेरे चाहते थे कि वे नष्ट हो जांय। इन हिन्दू-राजाओं की आत्मघातिनी आशा कहां तक सफल हुई, यह भविष्य का इतिहास बतलायेगा। इस लिए यद्यपि दोनों दलशत्रु के यातायात का रास्ता काटकर उसे भूखोँ मारने का विकट प्रयत्न करके उस पर आक्रमण करना चाहते थे, तोभी ज्यों ज्यों दिन बीतते गये, अब्दाली की अपेक्षा मरहठे कहीं अधिक क्षुधापीड़ित होने लगे। आखिरकार २२ नवम्बर को जनकोजी सिंधिया ने अपने पड़ाव से चल कर मुस्लिम-फौज पर आक्रमण कर दिया। सारे मुहाज पर बड़ा भयंकर युद्ध छिड़ गया। नवयुवक महाराष्ट्र-सेनापति तथा उसके पुराने तजुर्बेकार योद्धाओं की अनुपम वीरता के सामने डटे रहने में असमर्थ मुस्लिम-सेना शाम को पीछे भागी और मरहठों ने सरगर्मी के साथ उसे भगाकर उसका पड़ाव तक पीछा किया। यदि अन्धेरा न हो गया होता तो उसी दिन मुसलमानों की पूर्ण पराजय हो जाती।
[ ११६ ] मरहटों ने अपने शूरवीरों का विजय की सलामी के साथ स्वागत किया। अपने सिपाहियों के मस्तिष्क से पराजय के उत्साहहीन करने वाले प्र- असर को निकालने के लिये अब्दाली ने १४ दिन बाद चुनी हुई से- को आज्ञा दी कि वह अंधेरा होते ही रवाना हो जाये और मराठी से- के मध्य भाग पर रात के समय अन्धेरे में आक्रमण करे। लेकिन आगे बढ़ने पर जब इन लोगों ने बलवन्तराव मेहेन्डले को ५० हज़ार फ़ौ- के साथ युद्ध के लिये प्रस्तुत आते देखा, तो इन के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। पठानों ने फ़ौरन अपनी तोपें मरहटों पर चलानी आरम्भ कर दीं। पर चूंकि मरहठे तोपें नहीं लाये थे; इसलिये उनकी अधिक हानि हुई। शीघ्र ही ऐसा आभास होने लगा कि मरहटे डगमगा जायेंगे। लेकिन उनका सेनापति बिजली की तरह घोड़ा आगे दौड़ा लाया और अपनी सेना को ललकारते हुये उसने कहा कि झण्डे को अपमानित न होने देना। उन्हें चारों ओर से बटोर कर व्यूहबद्ध किया और अपनी तलवार को भयङ्कर रूप से ऊँची उठा कर एक दम आक्रमण करने की आज्ञा दी। मरहठे दौड़ कर शत्रुओं पर टूट पड़े, उनकी तोप को शांत कर दिया और मौत के मुंह में आ गये। सबसे आगे उनका वीर सेनापति बलवन्तराव मेहेन्डले था। घमासान का रण छिड़ पड़ा। एक गोली आकर सेनापति को लगी और वह वहीं गिर कर ढेर हो गया। यह देख कर मुसलमान उसका सिर विजय के चिन्ह के रूप में काट कर ले जाने के लिए उस पर टूट पड़े, परन्तु निम्बालकर ने उनकी तलवारों और सेनापति की लाश के बीच में अपने को डाल दिया और गहरी चोट खाने पर भी उसके मृत शरीर को उस समय तक ढाँपे रक्खा, जब कि मरहटों- ने आकर उसे शत्रुओं से छुड़ा न लिया। इस समय तक हज़ारों पठान काम आ चुके थे और मुसलमानों ने और डटा रहना कठिन समझा। इसलिये पहले तो वे लोग भागने से झिझके, फिर बुरी तरह पराजित होकर पीठ दिखा कर हज़ारों साथियों को मरहटों के सामने रणभूमि में छोड़ कर अपने पड़ाव की ओर भाग गये। मरहटों ने एक घड़ी