भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

पृष्ठ 89, कुल 254 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 89

[ ८६ ]

लिया कि सह्याद्रि पर्वत को जा पकड़ा और उसमें से ऐसे शोले निकले जिसने लाखों मनुष्यों, मन्दिरों की चोटियों, कलशों, पहाड़ों और तराइयों तथा जल और स्थल सब को जा घेरा। इस प्रकार वह होमाहुति की एक प्रचण्ड अग्नि बन गई। पहले आलमगीर ने मरहठों को पहाड़ी चूहों के रूप में देखा था, पर इन चूहों ने इतनी उन्नति की कि उनके पैने पंजों ने कितने ही मुसल- मान-शेरों का पेट फाड़ दिया और उनका रक्त दूसरे आलमगीर की राजधानी में मरहठों के पैरों में बहने लगा। पहला आलमगीर शिवाजी को एक साधारण राजा भी स्वीकार न करता था; पर उसका दूसरा उत्तरा- धिकारी, आलमगीर द्वितीय, जो उसी का वंशज था, अपने आपको तभी बादशाह कहला सका जब कि शिवाजी की सन्तान ने कुछ कृपा करके उसे बादशाह बना रहने दिया। हिन्दुस्तान की मुसलिम-दुनिया भयभीत हो गई। वह हिन्दू-राज्य की शक्ति तथा प्रताप देखकर अपार क्रोध में जलती-भुनती खाक होने लगी। रुहेले और पठान फ़र्रुखाबाद और दूसरी जगहों में पराजित हुये, वज़ीर तथा नवाब अपनी जगहों से हटाये गये, मौलवी और मौलाना काफ़िरों की उन्नति-शील दशा देख कर "हलाली ध्वजा" के घटते प्रताप का स्मरण कर अधीर होने लगे; यहाँ तक कि स्वयं बादशाह भी अपने राज्य को भालों की नोकों पर स्थापित देखकर घबड़ा गया। अतः राज्यहीन तथा विवश होने पर भी मुसलमानों ने मरहठों के नाश करने और बदला लेने की कसम खायी और गुप्त रूप से षड्यन्त्र रचने लगे। यह कहते आश्चर्य होता है—यद्यपि यह आश्चर्य की विशेष बात नहीं भी है—कि मरहठों के उत्तर भारत के इस उत्कर्ष से कुछ हिन्दू-राजे भी असन्तुष्ट हो गये और जयपुर के माधवसिंह, जोधपुर के विजयसिंह, जाटों तथा अन्यान्य छोटे-छोटे सरदारों ने अपने स्वाभाविक बैरियों के साथ मिलने में विलम्ब नहीं किया। उन्होंने मुसलमानों को इस हिन्दू-शक्ति को नष्ट करने के लिये एक षड्यन्त्र रचने के लिये उभारा, जो अकेले ही हिन्दू-