इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा
स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)
पृष्ठ 101, कुल 250 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ यस्य जायामार्तव विन्दत त्र्यहंकष्टसेन पिवेदहतवासा नैनां वृषलो न वृषल्प्यपहन्यात् त्रिरावान्त आप्लुत्य ब्रीहीन वद्यातयेत्।।
बृहदारण्यकोपनिषद् ६/४/१३
अर्थ- जिनकी स्त्री ऋतुमति हो वह स्त्री तीन दिन तक कांस्य के पात्र में पानी, भोजन न पाय और उसको कोई मलीन वस्त्र, मलीन स्त्री व मलीन पुरुष स्पर्श न करे, फिर चौथे दिन स्नान करने के अनन्तर वह सुन्दर वस्त्र पहिन धानों को कूटे। ऋतुमति स्त्री को यदि कोई मैले वस्त्र पहिनने को या मलीन स्त्री या पुरुष से स्पर्श करेगी तो सम्भव है कि उसके शरीर में दूषिन्धित कीटाणु प्रविष्ट होकर उसी को हानि पहुँचावे, इसलिए उस समय किसी मलीन द्रव्य अथवा वस्त्रादिकों को उपयोग में न लावे।
ऋतुकाल वर्जित कर्म
ऋतुमति स्त्री को तीन दिन पर्यन्त न करने वाले कर्म तथा उनको करने से उस मास में गर्भ स्थित हो जाने पर बच्चे को हानियाँ।
दिन में सोने से = सन्तान अधिक सोने वाली।
नेत्रों में अंजत काजल आदि लगाने से = अन्धों
रोने से = विकृत नेत्र तथा विकार युक्त।
स्नान और अनुलेपन करने से = निर्बल, दुबली तथा दुर्बली।
तेल मर्दन से = कुष्ठी (कुष्ठ रोग वाली)
नाखून काटने से = नाखून रहित।
दौड़ने से = चंचल
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri