इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा
स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)
पृष्ठ 61, कुल 250 में से
संदर्भ में पढ़ेंकरना चाहिए, कुछ दिनों के अभ्यास के पश्चात् गति और मात्रा को अपनी शक्ति और सामर्थ्यानुसार बढ़ाते रहना चाहिए। प्राणायाम का समय प्रातः काल का उचित है। यह अपने गृह पर एकाग्रता और स्वच्छ कमरे में बैठ कर करना चाहिए, ग्रीष्म ऋतु में द्वार खिड़की आदि को खोल देना चाहिए और शरद ऋतु में बन्द कर सकते हैं। प्राणायाम के अभ्यासी को घी और दूध की मात्रा बढ़ा देनी चाहिए।
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आहार
भोजन हर प्राणी को जीवित रहने के लिए अत्यन्त आवश्यक है। भोजन से शरीर में रस, रक्त, मांस, मेष, अस्थि मज्जा और वीर्य पदार्थ बनकर मन, वाणी और तेज को प्राप्त होते हैं। भोजन से बल पुरुषार्थ और बुद्धि भी बनती है। जिस प्रकार का और जिस भावना के वातावरण के साथ मनुष्य भोजन करेगा। उसका मन, भावना और बुद्धि वैसी ही बन जायेगी। यदि भोजन करते समय मन को अन्दर काम भाव आये और आपने काम भावनाओं से युक्त चित्रों से सुसज्जित कमरे में बैठ कर भोजन किया है, तो आपकी काम भावना भोजन के पश्चात् पहले की अपेक्षा चौगुनी हो जायेगी। उसी प्रकार बुद्धि की तीव्रता, बल और तेज की प्राप्ति के लिए, जैसी आपकी इच्छा हो, वैसी ही भावना और वैसे ही चित्रों से सुसज्जित कमरे में बैठकर भोजन करें। आपको जैसा अपना मन, बुद्धि आदि बनानी हो, भोजन से और भोजन समय की भावनाओं से वैसा ही मन बन जाता है। भोजन समय की भावनाओं द्वारा मनुष्य अपने मन, बुद्धि को जिधर ले जाना चाहे ले जा सकते हैं।
अनमशितं त्रेधा विधीयते तस्य वः छान्दोग्य स्यविस्तो धातुस्तत् पुरीष भवति, यो उपनिषद् मध्यम स्तन्मा थं सं योऽणिष्ठस्तन्मनः॥ ६/५/१
इच्छानुसार सन्तान ५७ वीरेन्द्र गुप्ताः
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri