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इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा

स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)

Devanagarihipublished250 पृष्ठ

आहार

करना चाहिए, कुछ दिनों के अभ्यास के पश्चात् गति और मात्रा को अपनी शक्ति और सामर्थ्यानुसार बढ़ाते रहना चाहिए। प्राणायाम का समय प्रातः काल का उचित है। यह अपने गृह पर एकाग्रता और स्वच्छ कमरे में बैठ कर करना चाहिए, ग्रीष्म ऋतु में द्वार खिड़की आदि को खोल देना चाहिए और शरद ऋतु में बन्द कर सकते हैं। प्राणायाम के अभ्यासी को घी और दूध की मात्रा बढ़ा देनी चाहिए।

★★★

आहार

भोजन हर प्राणी को जीवित रहने के लिए अत्यन्त आवश्यक है। भोजन से शरीर में रस, रक्त, मांस, मेष, अस्थि मज्जा और वीर्य पदार्थ बनकर मन, वाणी और तेज को प्राप्त होते हैं। भोजन से बल पुरुषार्थ और बुद्धि भी बनती है। जिस प्रकार का और जिस भावना के वातावरण के साथ मनुष्य भोजन करेगा। उसका मन, भावना और बुद्धि वैसी ही बन जायेगी। यदि भोजन करते समय मन को अन्दर काम भाव आये और आपने काम भावनाओं से युक्त चित्रों से सुसज्जित कमरे में बैठ कर भोजन किया है, तो आपकी काम भावना भोजन के पश्चात् पहले की अपेक्षा चौगुनी हो जायेगी। उसी प्रकार बुद्धि की तीव्रता, बल और तेज की प्राप्ति के लिए, जैसी आपकी इच्छा हो, वैसी ही भावना और वैसे ही चित्रों से सुसज्जित कमरे में बैठकर भोजन करें। आपको जैसा अपना मन, बुद्धि आदि बनानी हो, भोजन से और भोजन समय की भावनाओं से वैसा ही मन बन जाता है। भोजन समय की भावनाओं द्वारा मनुष्य अपने मन, बुद्धि को जिधर ले जाना चाहे ले जा सकते हैं।

अनमशितं त्रेधा विधीयते तस्य वः छान्दोग्य स्यविस्तो धातुस्तत् पुरीष भवति, यो उपनिषद् मध्यम स्तन्मा थं सं योऽणिष्ठस्तन्मनः॥ ६/५/१

इच्छानुसार सन्तान ५७ वीरेन्द्र गुप्ताः

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अर्थ- जब 'अन्न' खाना खाया जाता है, तो वह तीन प्रकार का बन जाता है उसका सबसे स्थूल भाग मल बन जाता है, जो मध्यम भाग है वह मांस और जो सबसे सूक्ष्म भाग है वह मन बन जाता है।

आपः पीता स्नेधा विधीयन्ते तासां यः स्थविष्ठो धातु स्तन्मूर्त्रं भवति यो मध्यम • स्तल्लोहितं योऽणिष्ठः स प्राणः॥

छान्दोग्य ३- ६/५/२

अर्थ- जब जल पिया जाता है, तो वह तीन प्रकार का बन जाता है, उसका जो सबसे स्थूल भाग है वह मूर्त्र बन जाता है, जो मध्यम भाग है वह रुधिर और सबसे सूक्ष्म भाग है वह प्राण बन जाता है।

तेजोऽशितं त्रेधा विधीयते तस्य यः स्थविष्ठो धातु स्तदस्थि भवति, यी मध्यमः समज्जा योऽणिष्ठः सा वाक्॥

छान्दोग्य ३- ६/५/३

अर्थ- जब तेज (अर्थात् जो तेल घी आदि में है वा जो अन्न में मिला हो) खाया जाता है, तो वह तीन प्रकार का बन जाता है, जो स्थूल भाग है वह हृद्धी बन जाता है, जो मध्यम भाग है वह मज्जा और सबसे सूक्ष्म भाग है वह वाणी बन जाता है।

प्रत्येक वस्तु अन्न जल और तेज, तीनों की बनी हुई है, इस लिए जो कोई वस्तु खाता है, उसमें इन तीनों का भाग पाया जाता है, चाहे उनका न्यूनाधिक भाग कुछ ही हो।

उपरोक्त प्रणाली से आप अनुमान लगालें कि अन्न, जल और घी आदि भोजन से क्या-क्या बनता है। इसलिए संस्कारित शुद्ध और ताजा भोजन खाना चाहिए, बासी भोजन आलस्य उत्पन्न और बुद्धि को मन्द कर देता है।

इच्छासम्पन्न संततः तीर्थेन्द्र गुप्तः CC-0 Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पुजितं हृशन नित्यं बलमूर्ज च यच्छति। अपुजितं तु तद भुक्तमुभयं नाशयेदितम्।।

मनु २/५५

अर्थ- संस्कृत अन्न वीर्य को देता है और असंस्कृत अन्न बल, सामर्थ्य इन दोनों का नाश करता है। (इसलिए शुद्ध पवित्र भोजन बलिवैश्य यज्ञ करके खाना चाहिए)

भोजन का स्थान एकात्म, स्वच्छ, पवित्र और सुन्दर होना चाहिए। क्रोध तथा शोक के समय में खाया हुआ भोजन शरीर में रस के स्थान पर विष बनाता है। इसलिये क्रोध और शोक के समय भोजन न करना चाहिए। भोजन के पात्र सुन्दर, आकर्षक और स्वच्छ हों।

भोजन के समय माता, पिता, वैद्य, मित्र, परिवार जन और पाककर्ता के अतिरिक्त अन्य किसी को समीप न रहने दो तथा मोर, चकोर, वानर, मुर्गा की दृष्टि के अतिरिक्त अन्य का दृष्टिपात योग्य नहीं।

भोजन करने के प्रथम अदरक और लवण की बनी चटनी खा लेनी चाहिए, इससे रुचि बढ़ती है और ग्रन्थियां खूब रस देने लगती हैं। यह रस पाचन में विशेष स्थान रखता है। तत्पश्चात् मधुर चिकना हलन्गरी घी, चावल, मीठा, फल, दही, रोटी उत्तम शाक के साथ धीरे-धीरे खाना चाहिए और अन्त में रुचिपूर्वक मिश्री युक्त दूध पियें। भोजन के आदि में जल पीने से मन्दाग्नि तथा भोजन के अन्त में जल पीने से विष सद्गुण और कफ को बढ़ाने वाला होता है। इसलिए भोजन के मध्य में थोड़ा सा जल धीरे-धीरे पीना चाहिए। जो अमृत के तुल्य है। भोजन के उपरान्त एक घण्टे के पश्चात् जल पीने से बल बढ़ता है।

अजीर्णं भैषजं वारि जीर्णं वारि बलप्रदम्।

भोजने चामृत वारि भोजनान्ते विषप्रदम्।।

चाणक्य नीति ८/७

इच्छानुसार सन्तान

५९

वीरेन्द्र गुप्तः

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अर्थ- जल अजीर्ण (कब्जा) में औषधि है, पच जाने पर बल देने वाला है भोजन के मध्य में जल अमृत के समान है, और वही भोजन के अन्त में विष का फल देता है।

भोजन करते समय इस बात का ध्यान रखना उचित है कि आधा पेट भोजन से भर लें और चतुर्थ भाग जल से तथा शेष चतुर्थ भाग वायु के लिए रिक्त रहने दें। इस प्रकार की मात्रा से भोजन कभी अजीर्ण नहीं करता और सदैव सुख देता है। अधिक प्यास लगी होने पर भोजन नहीं करना चाहिए। भोजन करने से गुल्म रोग हो जाता है, इसलिए जल पीकर एक घण्टे पश्चात् भोजन करें। भूख लगने पर जल नहीं पीना चाहिए। जल पी लेने से जलोदर हो जाता है। भोजन सदैव सादा हल्का शीघ्र ही पच जाने वाला खाना चाहिए। अधिक मसालेदार भोजन से हानि होती है। भोजन को भली प्रकार चबा-चबाकर खाना चाहिए। एक-एक ग्राम को ३२ बार चबाना चाहिए जिससे उसमें लार गिल्हियों का रस पूरी मात्रा में मिलकर पाचन क्रिया को ठीक रखे। प्रभु ने दंत भोजन पीसने को दिये हैं और आँतें पचाने के लिए। जो मनुष्य दंतों का काम आँतों से लेते हैं वह सदैव रोगी रहते हैं। उनकी आँतें शक्ति हीन होकर अपना भी कार्य करने में असमर्थ हो जाती हैं। भोजन सदैव निश्चित समय पर ही करना उचित है। कहावत है कि हजार काम छोड़ कर नहाना और सौ काम छोड़कर खाना। भोजन हाथ पैर और मुख थोकर करना चाहिए इससे आयु और बल बढ़ता है।

शतं विहाय भोकव्यं, सहस्रं स्नान माचरेत्। लक्षं विहाय दातव्यं, कोटिं त्यक्त्वा हरि भजेत्॥

महाभारत

अर्थ- सौ काम छोड़कर भोजन करना, हजार काम छोड़कर स्नान करना चाहिये, लाख काम छोड़कर दान और करोड़ों कामों को त्यागकर प्रभु चिन्तन अर्थात् सन्ध्यापासनादि करना चाहिये।

इच्छानुसार सन्तान

६०

वीरेन्द्र गुप्तः

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आर्त्तादास्तु भुंजीत नाद्रपदास्तु सविशोत्। आद्रपदिस्तु भुजानो दीर्घमायुखात्नयात्।।

मनु ४/७६

अर्थ- गीले पैर भोजन करे, किन्तु गीले पैर सोवे नहीं। क्योंकि गीले पैर भोजन करने वाला दीर्घायु पाता है। न स्नानमाचरेद्भुक्त्वा नातुरो न महानिधि। न वासोभिः सुहजस्त्रं नाडविज्ञाते जलाशये।।

मनु ४/१२९

अर्थ- भोजन करके, रोग में, मध्य रात्रि में, कपड़ों के साथ और जहाँ पानी गहरा हो और विदित न हो ऐसे जलाशय तथा समय में स्नान न करे।

भोजन के पश्चात् हाथ मुख धोकर दोनों हाथों को मसल कर नेत्र और मुख पर फेरने से तेज और ज्योति बढ़ती है। मस्तिष्क और सर पर हाथ फेरने से बुद्धि बढ़ती है। भोजन करके १०० कदम टहलो कार्यवश बैठे रहने से शरीर भारी होता है, सीधे खाट पर लेटे रहने से अन्न नहीं पचता और दौड़ने वाले के साथ तो मानो मृत्यु ही दौड़ती है। रात्रि को सोते समय दूध अवश्य ही पीना चाहिए। क्योंकि दूध पीने से जो दिन में विदाही लवण, कटु, तिक आदि पदार्थ खाये जाते हैं, उनका विदाह शान्त होकर मीठा हितकारी पाक होता है।

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इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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संध्या समय

संध्या समय

कुर्वैलिन दन्तलोपधारिणं

बाहवशिणं निष्कुरभाषिणं च।

सूर्यादये चास्तिमिते शयान

विमुञ्चति श्रीयदि चक्रपाणिः॥

चाणक्य नीति १५/४

अर्थ- मलीन वस्त्र वाले को, दांतों के मल को दूर न करने वाले को, बहुत भोजन करने वाले को कटुभाषी को और सूर्य के उदय और अस्त के समय में सोने वाले को लक्ष्मी छोड़ देती है। चाहे वह विष्णु भी हों।

संध्या समय १. भोजन २. मैथुन ३. अध्ययन और ४. निद्रा यह चार कार्य मत करो, क्योंकि संध्या के भोजन से रोग मैथुन से भयंकर सन्तान होती है।

जब दिति स्त्री धर्म से शुद्ध हुई तब उसने संध्या समय भोग करने की इच्छा करके कश्यप जी अपने पति के पास जाकर कहा, कि इस समय मुझे कामदेव दुःख दे रहा है व मेरे सौत के बेटे राजसिंहासन का सुख भोगते हैं। यह दुःख मुझसे सहा नहीं जाता, सो मेरी चिन्ता दूर कीजिए। यह वचन सुनकर मरीचि के बेटा कश्यप मुनि बोले हे दिति! इस समय तेरे साथ भोग व विलास, जो बहुत बुरा काम है नहीं कर सकता, संध्या से चार घड़ी रात बीते तक व चार घड़ी रात रहे से प्रातः काल तक सवाय लेने नाम व करने ध्यान परमेश्वर के दूसरा काम न करना चाहिए। इसलिए तू चार घड़ी और धैर्य रख जिसमें परमेश्वर के भजन व स्मरण का समय बीत जावे। उस समय दिति कामदेव के मद में ऐसी मतवाली हो रही थी कि अपने पति के समझाने पर भी उसने सन्तोष नहीं करके लाज व शर्म को छोड़ दिया व

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वीरेन्द्र गुप्तः

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कश्यप जी के शरीर का कपड़ा पकड़ कर भोग करने के वास्ते हठ किया तब कश्यप जी ने हार मानकर उसके साथ भोग करके कहा- हे दिति! इस समय तुने जो यह अधर्म किया। इस पाप करने से तेरे दो पुत्र, ब्राह्मण व ऋषि आदि सब जीवों को दुःख देने वाले ऐसे बलवान् उत्पन्न होंगे कि कोई देवता या दैत्य या मनुष्य उनसे लड़ाई में सामना करने से जीत न सकेगा। दिति ने यह बात सुनते ही बहुत उदास होकर अपने पति से हाथ जोड़कर विनय की, महाराज मेरी इच्छा यह थी कि मेरे बेटे देवताओं को जीतकर अमरावती पुरी का राज्य करके सुख भोगें मुझको यह कामना नहीं थी कि मेरे बालक अधर्मी होकर ब्राह्मण आदि जीवों को दुःख देंगे, ऐसे पापी बेटे लेकर मैं क्या करूँगी। दिति का यह बचन सुनकर व उसे बहुत उदास देखकर कश्यप मुनि बोले, हे दिति! अब क्या किया जाय इस समय भोग करने का प्रभाव यही है इसी वास्ते में मना करता था परन्तु कुकर्म करने के पीछे शांच करता है। दिति के दोनों पुत्रों का नाम है- १. हिरण्याक्ष २. हिरण्यकशिपु। वास्तव में दोनों ही भयंकर सन्तानों के रूप थे।

सुखसागर तीसरा स्कन्ध,

१४ अध्याय

अध्यायन से आयु क्षय और निद्रा से दरिद्रता होती है किन्तु संध्या समय ईश्वराधना यह सर्वोत्तम कार्य सबको करना योग्य है।

नाशनीयात्संधिवेलायां न गच्छेन्नापिसिंविशैत्।

न चैव प्रलिखेदभूमिं नात्पनोपहरेत्स्वजम्॥

मनु ४/५

अर्थ- संध्याकाल में भोजन, शयन, यात्रा न करे और न भूमि पर लकीर खींचे और पहनी हुई माला को न निकाले।

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इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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निद्रा

निद्रा

जिस प्रकार शरीर संचालन के लिए हमें भोजन की आवश्यकता रहती है, उसी प्रकार जब हमारे शरीर के अंग प्रत्यंग कार्य करते-करते थक जाते हैं और वे विश्राम करना चाहते हैं तब वही विश्राम हमारी निद्रा लेने से हमारे शरीर यन्त्र थकान को दूर करके पुनः नये बन जाते हैं, यदि निद्रा न हो तो थोड़े ही समय में शरीर नष्ट हो जाय। जिस प्रकार रेल का इंजिन २४ घण्टे बराबर चलने से तप्त हो जाता है, यदि वह इंजिन उस समय नहीं बदला जाय तो वह गर्मी से फट कर नष्ट हो जाय। यही स्थिति इस शरीर को है यदि निद्रा न ली जाय तो शरीर में कोई न कोई उपद्रव खड़ा होकर स्वास्थ्य को नष्ट कर डालेगा। पूर्ण निद्रा लेने से सुख, बल और जीवन की वृद्धि होती है। कम तथा अधिक निद्रा से रोग, कृशता, निर्बलता आदि होकर शरीर का नाश होने लगता है इसलिए सम्यक और योग्य समय में निद्रा का सेवन करना आवश्यक है। उत्तम निद्रा के लिए यथेष्ट चारपाई, सुन्दर बिछौना, तकिया और ऋतु अनुसार ओढ़ने का वस्त्र एवं उत्तम कमरा होना चाहिए। सोने का कमरा शान्त और हवादार हो, जहाँ चारों ओर की वायु प्रवेश हो सके, क्योंकि शुद्ध वायु मनुष्य जीवन तथा शरीर को स्वस्थ रखने के लिए अत्यन्त आवश्यक है। कमरे में रात्रि को बहुत हल्का प्रकाश रहना उत्तम है।

प्राच्योदिशि शिरस्सप्तं याम्याया मथवानुप।

सदैवस्वपतः पुंसो विपरीतं तु रोगदम्।

बिष्णु पुराण ३/११/१११

अर्थ- सदा सोते समय पूर्व या दक्षिण दिशा को सिर करके सोना चाहिए, इसके विपरीत सोने से रोग पैदा होते हैं।

स्वगृहे प्राक् शिराशोते श्वसुर्यं दक्षिणा शिरा।

प्रत्यक् शिरा प्रावासे तु न कदाचिदुदक शिरा॥ गायः

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वीरेन्द्र गुप्तः

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अर्थ- पूर्व दिशा की ओर सिर करके सोने से धन की प्राप्ति होती है, दक्षिण दिशा की ओर सिर करके सोने से आयु बढ़ती है, पश्चिम दिशा की ओर सिर करके सोने से चिन्ता रहती है और उत्तर दिशा को सिर करके सोने से मृत्यु होती है। पश्चिमी विद्वान् भी मानने लगे हैं कि उत्तर को सिर करके सोने से नेत्रों की ज्योति नष्ट हो जाती है, वह कहते हैं कि हमारे शरीर में एक रेखा खड़ी रहती है, परन्तु उत्तर की ओर सिर करके सोने से ध्रुव की शक्ति से यह रेखा बेड़ी होकर लहराने लगती है, इससे मस्तिष्क रोग, नेत्र रोग हो जाते हैं। सदा उत्तर को सिर करके सोने वाला या तो पागल हो जायगा या अन्धा हो जायगा। जब रोगी मरणोपसन्न हो और दम घुट रहा हो तो उसका सिर उत्तर दिशा की ओर करने की प्रथा हमारे भारत वर्ष में प्रचलित है, इससे प्राण सुगमता से निकल जाता है, इससे सिद्ध होता है कि उत्तर दिशा में प्राणकर्षक कोई वस्तु अवश्य है।

पूर्वरात्रे व्यतीतेतु सङ्ख्येद्वैतमिदिरम्।

पादौपक्षालयेत्पूर्वं पश्चाच्छव्यां समाविशेत्॥

यमः

अर्थ- यमाचार्य का मत है कि एक प्रहर रात्रि व्यतीत हो जाने पर सोने के लिए अन्तःपुर में प्रवेश करे और चारपाई पर बैठकर पीवों को भली प्रकार धोकर तौलिया से साफ करके ईश्वर का स्मरण करते हुए सो जावे। ऐसा करने से निद्रा खूब आती है और स्वप्नदोषादि नहीं होते।

चारपाई पर पहले बार्यी करवट लेटक ८ शर्वास लो फिर दार्यी करवट से १६ और फिर सीधे चित होक ३२ शर्वास लेकर चाहें जिस करवट सो जाओ। पीठ के बल चित और बाई करवट सोने से पाचन शक्ति ठीक रहती है और आयु बढ़ती है।

वाम दिशायामनलो नामेरुव्यव्ति जन्तूनाम्।

तव्यात्तु वाम पार्श्वं शयति भुक् प्रपाकर्थम्।।

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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अर्थ- बाई करवट सोने से भोजन शीघ्र पचता है, क्योंकि नाभि से ऊर्ध्व बायाँ ओर आँन रहती है। पिताशय यकृत के ऊपर दाहिनी ओर होता है और वह नीचे की ओर पित्त छोड़ता है, बाई करवट सोने से पित्त ठीक गिरता रहता है और दाहिनी करवट सोने से बन्द रहता है। इसी प्रकार बृहदान्न जो दाहिनी ओर से प्रारम्भ होकर नीचे मल ले जाती है। बाई करवट लेटने से बराबर अन्न सार बृहदान्न से होकर निकलता रहता है और दाहिनी करवट लेटने से निकलने में कठिनाई होती है।

सोते समय चारपाई के पांस लाठी, खड़ाऊ और जल का लोटा अवश्य होना चाहिए। सोते समय मुख से पान, अपनी चारपाई पर से स्त्री और पुष्प माला हटा देनी चाहिए। पानादि को मुख में रख कर सोने से दाँतों में रोग होकर कौड़ा लग जाता है और मुख से दुर्गन्ध आने लगती है। जब पुष्प कुछ कुम्हला जाते हैं। तो उन पर छोटे छोटे जन्तु आकर बैठ जाते हैं। यदि सोते समय अपने समीप से पुष्प माला न अलग की तो यह जन्तु स्वर्वास द्वारा शरीर में प्रविष्ट होकर रोग उत्पन्न कर देते हैं।

रात्रि को स्त्री के साथ सोने से स्त्री पुरुष, रजः और वीर्य के रोगों से परिक्रान्त हो अपना जीवन नष्ट करते हैं, क्योंकि 'पिताधिक्यं यतः स्त्रियाः' स्त्री जाति में पिताधिक होता है। जब वह एक साथ लेटते हैं तो जो वीर्य नवनीत की भीति समस्त शरीर में व्याप्त होता है वह स्त्री की स्पर्श, जनित ऊष्मा से द्रवित हो प्रति समय पतित होता रहता है जो मूत्र करने में जरा सी उतेजना होने पर निकल जाता है और इस कारण निर्बलता प्रति दिन बढ़ती जाती है। जिससे वीर्य के द्रवीभूत होने से सन्तान जनक शुक्र का गुण विनष्ट हो जाता है।

एक साथ सोने से प्रतिदिन मैथुन करना पड़ता है, क्योंकि स्त्रियों में ऋणात्मक, पुरुषों में धनात्मक विद्युत शक्ति होती है, जो एक दूसरे को अपनी ओर खींचती है इससे मन विवश होकर

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वीरेन्द्र गुप्तः

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वीर्य

काम की इच्छा करता है और उपस्थेन्द्रियों में उत्तेजना होने लगती है। जिससे मैथुन करना ही पड़ता है।

इस कारण एक साथ सोने वाले प्रायः सन्तान हीन और निर्बल तथा नित्य नये रोगों से ग्रसित देखने में आये हैं।


वीर्य

वीर्य बड़ी अनुपम और अलभ्य वस्तु है। वीर्य शरीर का राजा है। राजा के सुदृढ़ रहने से समस्त राज्य और सेना सुदृढ़ रहती है। इसी प्रकार वीर्य के परिपक्व होने पर शरीर निरोगी और कंचनमय हो जाता है। अतएव हमको अपने राजा (वीर्य) की यत्न पूर्वक रक्षा करना अपना कर्तव्य समझना चाहिए। वीर्य की रक्षा करने को ब्रह्मचर्य कहते हैं। ब्रह्मचर्य आश्रम कम से कम युवकों के लिए २५ वर्ष और युवतियों के लिए १६ वर्ष का नियुक्त है। इसी समय में ब्रह्मचारी तथा ब्रह्मचारिणी को उचित है कि वह विद्याध्ययन का व्रत लेकर उसे यत्नपूर्वक पूरा करे। ब्रह्मचर्य ही एक ऐसा आश्रम है जिसके ठीक-ठीक पूर्ण होने से तीनों आश्रमों का पूर्ण सुख प्राप्त होता है। ब्रह्मचर्य की महिमा का वर्णन करने में हमारी निर्जीव लेखनी असमर्थ है।

ब्रह्मचर्य का बल पराक्रम कैसा अनुपम है इसका अनुमान अपने ग्रन्थों से भली प्रकार लग सकता है। ब्रह्मचर्य ही शरीर को दृढ़ और बलवान बनाता है। यही मनुष्य को देवता तथा मुनि बना देता है। इसी से मनुष्य के समस्त कार्य सिद्ध होते हैं।

सिद्धे विन्दो महा यत्ने।

किं न सिध्यति भूतले॥

अर्थ- जिसने वीर्य विन्दु को बड़े यत्न से सिद्ध कर लिया हो (अर्थात् ब्रह्मचर्य आश्रम विधि पूर्वक पूर्ण कर लिया हो) उसके

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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अर्थ- बाई करवट सोने से भोजन शीघ्र पचता है, क्योंकि नाभि से ऊर्ध्व बायीं ओर अग्नि रहती है। पिताशय यकृत के ऊपर दाहिनी ओर होता है और वह नीचे की ओर पित्त छोड़ता है, बाई करवट सोने से पित्त ठीक गिरता रहता है और दाहिनी करवट सोने से बन्द रहता है। इसी प्रकार बृहदान्न जो दाहिनी ओर से प्रारम्भ होकर नीचे मल ले जाती है। बाई करवट लेटने से बराबर अन्न सार बृहदान्न से होकर निकलता रहता है और दाहिनी करवट लेटने से निकलने में कठिनाई होती है।

सोते समय चारपाई के पांस लाठी, खड़ाऊ और जल का लोटा अवश्य होना चाहिए। सोते समय मुख से पान, अपनी चारपाई पर से स्त्री और पुष्प माला हटा देनी चाहिए। पानादि को मुख में रख कर सोने से दीर्घों में रोग होकर कौड़ा लग जाता है और मुख से दुर्गन्ध आने लगती है। जब पुष्प कुछ कुम्हला जाते हैं। तो उन पर छोटे छोटे जन्तु आकर बैठ जाते हैं। यदि सोते समय अपने समीप से पुष्प माला न अलग की तो यह जन्तु र्वींस द्वारा शरीर में प्रविष्ट होकर रोग उत्पन्न कर देते हैं।

रात्रि को स्त्री के साथ सोने से स्त्री पुरुष, रजः और वीर्य के रोगों से परिक्रान्त हो अपना जीवन नष्ट करते हैं, क्योंकि 'पिताधिक्यं यतः स्त्रियाः' स्त्री जाति में पिताधिक होता है। जब वह एक साथ लेटते हैं तो जो वीर्य नवनीत की भीति समस्त शरीर में व्याप्त होता है वह स्त्री की स्पर्श, जनित ऊष्मा से द्रवित हो प्रति समय पतित होता रहता है जो मूत्र करने में जरा सी उतेजना होने पर निकल जाता है और इस कारण निर्बलता प्रति दिन बढ़ती जाती है। जिससे वीर्य को द्रवीभूत होने से सन्तान जनक शुक्र का गुण विनष्ट हो जाता है।

एक साथ सोने से प्रतिदिन मैथुन करना पड़ता है, क्योंकि स्त्रियों में ऋणात्मक, पुरुषों में धनात्मक विद्युत शक्ति होती है, जो एक दूसरे को अपनी ओर खींचती है इससे मन विवश होकर

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वीरेन्द्र गुप्तः

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काम की इच्छा करता है और उपरस्थितियों में उत्तेजना होने लगती है। जिससे मैथुन करना ही पड़ता है।

इस कारण एक साथ सोने वाले प्रायः सन्तान हीन और निर्बल तथा नित्य नये रोगों से ग्रसित देखने में आये हैं।

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वीर्य

वीर्य बड़ी अनुपम और अलभ्य वस्तु है। वीर्य शरीर का राजा है। राजा के सुदृढ़ रहने से समस्त राज्य और सेना सुदृढ़ रहती है। इसी प्रकार वीर्य के परिपक्व होने पर शरीर निरोगी और कंचनमय हो जाता है। अतएव हमको अपने राजा (वीर्य) की यत्नपूर्वक रक्षा करना अपना कर्तव्य समझना चाहिए। वीर्य की रक्षा करने को ब्रह्मचर्य कहते हैं। ब्रह्मचर्य आश्रम कम से कम युवकों के लिए २५ वर्ष और युवतियों के लिए १६ वर्ष का नियुक्त है। इसी समय में ब्रह्मचारी तथा ब्रह्मचारिणी को उचित है कि वह विद्याध्ययन का व्रत लेकर उसे यत्नपूर्वक पूरा करे। ब्रह्मचर्य ही एक ऐसा आश्रम है जिसके ठीक-ठीक पूर्ण होने से तीनों आश्रमों का पूर्ण सुख प्राप्त होता है। ब्रह्मचर्य की महिमा का वर्णन करने में हमारी निर्जीव लेखनी असमर्थ है।

ब्रह्मचर्य का बल पराक्रम कैसा अनुपम है इसका अनुमान अपने ग्रन्थों से भली प्रकार लग सकता है। ब्रह्मचर्य ही शरीर को दृढ़ और बलवान बनाता है। यही मनुष्य को देवता तथा मुनि बना देता है। इसी से मनुष्य के समस्त कार्य सिद्ध होते हैं।

सिद्धे विन्दो महा यत्ने।

किं न सिध्यति भूतले॥

अर्थ- जिसने वीर्य बिन्दु को बड़े यत्न से सिद्ध कर लिया हो (अर्थात् ब्रह्मचर्य आश्रम विधि पूर्वक पूर्ण कर लिया हो) उसके

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वीरेन्द्र गुप्तः

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लिपि पृथ्वी पर कोई ऐसा कार्य नहीं जिसे सिद्ध न कर सकें।

यही अकाल मृत्यु को विजय करता है। ब्रह्मचर्य पालन ही आयु बढ़ाने का सबसे सरल उपाय है। यही मनुष्य को अमर बना देता है इसी को बल प्रताप से असम्भव बातें भी सम्भव दीख पड़ने लगती हैं। भीष्म पितामह ने अपनी दृढ़ प्रतिज्ञा को अखण्ड ब्रह्मचर्य के बल से पूर्ण किया जो संसार में सूर्य के समान प्रकाशमान हैं। अंजनी सुत अखण्ड ब्रह्मचारी हनुमान ने अकेले ही सारी लंका को योद्धाओं के छवकें छुड़ा दिये और अन्त में सारी लंका को अग्नि के अर्पण करके माता जानकी की सुध ले वापिस लौटकर श्रीरामचन्द्र जी को समाचार दिया। आप इन घटनाओं को त्रेता और द्वापर की कहकर छोड़ देंगे, तो आप कलयुग की उन्नीसवीं शताब्दी के सुधारक ऋषि दयानन्द सरस्वती को ही ले लीजिये यह उनके अखण्ड ब्रह्मचर्य के बल तथा तेज का ही कारण है कि आज भारतवर्ष की काया ही पलटी दीखती है। सन् १८५७ की राज्य क्रान्ति के पश्चात् स्वतन्त्रता का शब्द लुप्त हो गया था उस समय स्वतन्त्रता शब्द को मुख से निकालना मानों मृत्यु को आमंत्रित करना था परन्तु ऐसे भयंकर समय में जबकि भारत पर पश्चिमी शासकों का पूरा दमन चक्र चल रहा था और भारतीय जनता को खटमल और चींटी के समान मसला जा रहा था, जिसके फलस्वरूप भारतवासी अपने शब्दकोष से स्वतंत्रता शब्द को निकाल चुके थे, क्योंकि स्वतंत्रता के शब्द को उच्चारित करने वाले को गोली लगा दी जाती थी। ऐसे भयंकर समय में और यह जानते हुए भी, इस समय भारत में मेरे विचारों जैसा अन्य कोई भी व्यक्ति नहीं है। तिस पर भी एक अपने अखण्ड ब्रह्मचर्य बल के प्रताप और ईश्वर की अपने ऊपर छाया के ही सहारे निर्भय निःसंकोच और स्वाभिमान के साथ कलकत्ते के भरे दरबार में वायसराय के सामने ऋषि दयानन्द सरस्वती ने गरज कर कहा कि अपने राज्य में चाहे सूखे चने ही क्यों न

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विरेंद्र गुप्तः

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खाने को मिलें, पर वह विदेशी शासन की भुंखलाओं के बीच रहते हुए घी, दूध, और हलुआ-पूरी के सामने श्रेष्ठ है। लार्ड नार्थब्रुक ऐसे शब्द सुनकर चकित हो गया, जबकि भारत की जनता अपने घर में बैठकर भी स्वतंत्रता के शब्द का उच्चारण तो दूर रहा स्मरण भी नहीं कर सकती थी, उस समय देश का यह सन्यासी निर्भय होकर स्वतंत्रता के सच्चे सुख का अनुभव करे। परन्तु उस लार्ड का साहस न हुआ कि वह ऋषि दयानन्द सरस्वती को बन्दी बना सके। क्यों? क्योंकि ऋषि दयानन्द की निर्भयता, सच्ची देश भक्ति और चेहरे के तेज से वह भयभीत हो गया। लोकमान्य तिलक आदि देश भक्तों ने ऋषि दयानन्द सरस्वती द्वारा उच्चारित स्वतंत्रता शब्द को अपने रक्त से सींचा और जिसके फलस्वरूप हम आज स्वतंत्र हैं। यही नहीं ऋषि दयानन्द सरस्वती की विद्वत्ता की दुंदुभी भी सारे विश्व-मण्डल में बज गई और अब बज भी रही है, उनका लिखित सत्यार्थप्रकाश संसार की २८ भाषाओं में प्रकाशित हो चुका है और संसार की शेष सभी भाषाओं में सत्यार्थप्रकाश का अनुवाद हो रहा है। फ्रांस ने सत्यार्थप्रकाश को तीसरे नम्बर पर मान्यता दी है। अतएव मुझे इतना ही कहना है कि पूर्ण ब्रह्मचर्य द्वारा ही भारतवर्ष के सारे दुःख और क्लेश दूर हो सकते हैं। संसार के आगे सिर उठाने और गौरव बढ़ाने का साहस तभी हो सकता है कि जब संमस्त भारतवासी ब्रह्मचर्य के पालन करने में पूर्ण ध्यान देंगे। ब्रह्मचर्य का अर्थ अविवाहित होना नहीं है, परन्तु हर प्रकार से कम से कम युवकों को २५ वर्ष और युवतियों को १६ वर्ष तक वीर्य को खण्डित नहीं होने देना और पूर्णरूप से वीर्य की रक्षा करने को ही ब्रह्मचर्य कहते हैं।

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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एषां वै भूतानां पृथिवी रसः | ---|--- पृथिव्या | आपोऽपामोषधय औषधीनां | पुष्पाणि पुष्पाणां | फलानि फलानां | पुरुषः पुरुषस्य | रेतः ॥

ब्रह्मदर्पणकोपनिषद् ६/४/१

अर्थ- इन भूतों का रस (पंच भौतिक) पृथ्वी है, पृथ्वी का रस जल है, जल का रस औषधियाँ हैं, औषधियों का रस पुष्प है, पुष्पों का रस फल है, फलों का रस (आधार) मनुष्य शरीर है तथा मनुष्य शरीर का रस (सार) शुक्र (वीर्य) है।

रसा इत्कं ततो मांसम्, मासात्, मेदः प्रजायते। मेद सोऽस्थि ततो मज्जा, मज्जाः शुक्रस्य सम्भवः ॥

भावप्रकाश पु- प्र- ६३

अर्थ- (जो मनुष्य अन्नादि खाता है) शरीर में प्रथम उसका रस बनता है, रस से रक्त, रक्त से मांस, मांस से मेद, मेद से हड्डी, हड्डी से मज्जा (मीग जो हड्डी के अन्दर होती है) और मज्जा से शुक्र (वीर्य) बनता है।

उपरोक्त प्रमाणों से सिद्ध होता है कि वीर्य भोजनादि से किस प्रकार बनता है। एक दिन का खाया हुआ अन्न ४० वें दिन रस रक्त आदि बनता हुआ वीर्य रूप में आता है। एक बार वीर्य के पात में १ तोला वीर्य का क्षय होता है जो १ सेर रक्त का सार होता है। १ सेर रक्त ४० सेर अर्थात् १ मन अन्न जल के भोजन से बनता है। एक मन अन्न ४० दिन में एक मनुष्य खाता है इसका अभिप्राय यह है कि एक बार के वीर्य क्षय होने में ४० दिन के भोजन का सार रस शरीर से निकल जाता है।

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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कामी पुरुषों का यह कहना है कि जब एक बार के भोग में ४० दिन के भोजन से बना यह वीर्य निकल जाता है, तो जब हम नित्य भोग करते हैं तो यह वीर्य कहीं से आता है। वह वीर्य संचित कोष से आता है जो बचपन से २५ वर्ष तक संचित होता रहता है। परन्तु ऐसे पुरुषों का वही हाल होता है, जैसा आयु कम और व्यय अधिक करने वाले का दिवाला निकल जाता है। उसी प्रकार शरीर नष्ट हो जाता है।

कच्ची कलियाँ तोड़ने से पुष्पों की महक मारी जाती है कच्चे फल तोड़ लेने से फलों का स्वादिष्टपन का आनन्द नहीं मिलता, कच्चा भोजन खाने से रोग उत्पन्न होते हैं। इसी प्रकार अपरिपक्व वीर्यपात से नपुन्मकत्त्व आदि महा भीषण रोग उत्पन्न हो जाते हैं जो मनुष्य को काल के गाल में शीघ्रतया पहुँचाने के लिए सहज साधन का कार्य करते हैं। ऐसी उत्तम वस्तु (वीर्य) को सुरक्षित रखने से जीवन प्राप्त होता है और पतन से मृत्यु।

मरणम् विन्दुपातेन जीवनम् विन्दु धारणम्।

तस्मात् अति प्रयत्नेन कुतृते विन्दु धारणम्॥

अर्थ— वीर्य का पतन मरण है, वीर्य धारण से जीवन, इस लिए अति प्रयत्न से वीर्य बिन्दु को धारण करें और रक्षा करें, उसका व्यर्थ क्षय न होने दें।

इसके अकालपात से मनुष्य केवल ठटरी रह जाता है। ऐसा पुरुष गृहस्थाश्रम का पूर्ण सुख अनुभव नहीं कर सकता। बाल्यवस्था (विद्यार्थी जीवन में) काम वासनाओं में प्रवृत्त हो जाने से युवाकाल में मुख लालिया रहित सौन्दर्य और तेज रहित तथा अशोभनीय लगता है। प्रथम तो ऐसे स्त्री पुरुषों के सन्तान ही नहीं होती, यदि होती भी है तो निर्बल, निस्तेज, मलीन, कुरूप, विद्याहीन, बलहीन, रोगी और निकृष्ट होती है। क्या जिस भारतवर्ष देश के अन्दर तैंतीस करोड़ देवता थे अर्थात् यहाँ का एक-एक नागरिक देवता के नाम से पुकारा जाता था। सारे संसार को विद्या सम्यत्ता

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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ब्रह्मचर्य साधन

साम्यता का देने वाला कहा जाता था। वह भारतवर्ष ब्रह्मचर्य से हीन होकर कैसी निकुष्ट दशा को प्राप्त हुआ है। जहाँ हमारा नेतृत्व करने वालों की कमी नहीं थी, उस देश में अब नेतृत्व करने वालों की कमी ही नहीं वरन् अभाव है क्या आप बता सकते हैं कि हमारे बीच से जो नेता, सुधारक पथप्रदर्शक चला गया उसके स्थान पर दूसरा आया? नहीं। जैसे ऋषि दयानन्द सरस्वती का स्थान रिक्त हुआ उसकी पूर्ति नहीं हुई। इसी प्रकार स्वामी श्रद्धानन्द जी, पं.लेखराम, पंजाब केसरी लाला लाजपतराय महात्मा गांधी, सरदार पटेल, श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पं. जवाहर लाल नेहरू, इन सब के जाने के पश्चात् इनके स्थानों की पूर्ति नहीं हुई नाही भविष्य में दीखता है कि पूर्ति हो।

ब्रह्मचर्य के नियमोल्लंघन ने आज भारतवर्ष का नाश कर डाला है आज भी यह समझा जाय कि जिस वीर्य के पतन से हमारे क्षति हुई। इसके रक्षण से जो लाभ होगा उससे हमारी सन्तान भयानक दुःखों और क्लेशों से मुक्त होगी और उनका पुरुषत्व पुनः संसार के इतिहास में आकाश के दिवाकर सद्गुण दैदीप्यमान होने लगेगा।

अतएव आपको चाहिए कि अपनी सन्तानों को और स्वयं भी ब्रह्मचर्य के नियमों का पालन करते कराते हुए विद्या पढ़ें पढ़ाएँ और बच्चों को वीर पुरुषों के चित्र तथा कहानियाँ सुनाकर उनके हृदय-पट पर सच्चरित्रता चित्र को अंकित कर दें ताकि उन बच्चों को यश, कीर्ति, बुद्धि और तेज से यथा समय लाभ पहुंच सके।

तरुणावस्था भी कैसी मनमोहक अवस्था है। शैशवावस्था को पार कर तरुणावस्था में पदार्पण करते ही यौवन कुसुम खिलने लगता है, मुखमण्डल पर गुलाबी रंगत लहराने लगती है। इसी अवस्था में शरीर के गठन का सौन्दर्य प्रत्येक दृष्टिगोची को अपनी ओर आकर्षित करता है। यही काल मदन की तरंगों में लहराया करता है। द्वादश वर्षारम्भ में ही तरुणावस्था के चिन्ह प्रदर्शित होने

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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लगते हैं। युवक पच्चीसवें वर्ष में पूर्ण यौवन को प्राप्त होते हैं और युवतियाँ सोहलवें वर्ष में पूर्ण यौवन को प्राप्त होती हैं। क्योंकि शरीर में समस्त धातुओं, वीर्य आदि की उत्पत्ति होती है। ज्यों-ज्यों वीर्य परिपक्व होता जाता है त्यों-त्यों शरीर सर्वांग सुन्दर और सुदृढ़ होता जाता है, मुख पर लालिमा प्रकट होने लगती है, यहाँ तक कि पूर्ण युवाकाल पर पहुँच कर तेज, बल और सौन्दर्य बस देखने योग्य होता है।

ऋषि दयानन्द सरस्वती ने अपने सत्यार्थ प्रकाश के तीसरे समुल्लास में ब्रह्मचर्य के तीन प्रकार बताये हैं।

१. निकुष्टतम- २५ वर्ष का युवक और १६ वर्ष की युवती।

२. मध्यम- ३६ या ४० वर्ष का युवक और १८ या बीस वर्ष की युवती।

३. श्रेष्ठतम- ४८ वर्ष का युवक और २४ वर्ष की युवती।

स्मरण रहे कि यह विशेषता अविवाहित होने से नहीं मिलती, वरन् वीर्य रक्षा करने से (अक्षत् वीर्य और अक्षत् योनि) होने से ही मिलती है।

यह समय बड़ा ही विकट और चंचल है। इसी में युवक और युवतियों को अपने ब्रह्मचर्य व्रत की परीक्षा देनी पड़ती है मदन की तरंगों को हटाना बड़ा कठिन कार्य है। यदि इस कठिन परीक्षा में उत्तीर्ण हो गये और वीर्य के उबलते हुए वेग को पूर्ण रक्षा यथावत् कर सके तो फिर मनुष्य नहीं वरन् देवता है। ऐसे युवक और युवतियाँ हर कहीं आदरणीय और पूज्य होते हैं।

परन्तु शोक है कि भारतवर्ष के ऐसे भाग्य कहीं! दुःखाचारी जनों की गोष्ठियाँ दुष्ट प्रभावों और निशिदिन बढ़ने वाले कूटवों ने हमारे देश का सर्वनाश कर दिया। जैसे युवाकाल से पूर्व ही विवाह का हो जाना, खोटी संगत में पड़ कर हस्त मैथुन तथा गुदा मैथुनादि करना कराना। इन्हीं कूटवों के कारण आज भारत रसातल को जा रहा है। हे भारत के युवकों! युवतियों, आप ही के

इच्छानुसार सन्तान

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वारेन्द्र गुप्तः

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स्वप्न दोष नाशक चमत्कारी बूटियाँ

कन्यों पर भारत का भविष्य है। युवाकाल में खोटी संगत में न पड़कर इन कुट्टेओं से बचकर अपने शरीर को पुष्ट बनाकर विद्या प्राप्त करो। जिससे भारत का भविष्य उज्ज्वल होकर समस्त विश्व को सभ्यता और साम्यता का पाठ दे सके।

हमारा इतिहास बताता है कि द्वारपर में वीर अर्जुन ने अमरीका के राजा की कन्या उलूपी से विवाह किया था। धर्मराज युधिष्ठिर की राजसूय यज्ञ में समस्त विश्व के राजाओं ने अपना-अपना कर देकर महाराजा युधिष्ठिर को चक्रवर्ती राजा माना था। हे भारतवासियों! हांशा मत हो ब्रह्मचर्य का पालन करो और फिर से अपने पूर्वजों के समान चक्रवर्ती राजा बनो।


ब्रह्मचर्य साधन

प्रातः सूर्योदय से कुछ समय पूर्व शौच, संध्यापासनादि से निवृत्त होकर सिद्धासन पर बैठे। आसन लगाते समय ध्यान रहे कि पहले बायें पैर को एड़ी गुदा और अण्डकोषों के मध्य सीमन पर लगायें, पश्चात् दाहिने पैर की एड़ी लिंग के मूल पर रखनी चाहिए, दोनों पैरों के गट्टे आपस में ऊपर नीचे मिले रहें। कुछ ही दिनों में आसन पर बैठने का सही अभ्यास हो जायगा। आसन पर सीधे बैठकर देखें कौन-सा स्वर चल रहा है, जिस नथने से श्वास आ जा रही हो उससे दूसरे नथने को अंगुली या अंगुठे से दबाकर बन्द करें, फिर चलते हुए नथने से धीरे-धीरे श्वास अन्दर खींचें, उसी समय गुदा को ऊपर खींचकर संकोचन करते हुए मूल बन्ध लगायें। पूर्ण श्वास भर जाने पर नथने से हाथ हटाकर श्वास को भीतर ही रोकें रहें, ध्यान रहे गुदा, द्वार बराबर ऊपर को खिंचा रहे, ढीला न होने पावे। श्वास रोक कर पेट के निचले भाग को गति दें अर्थात् पेट को अन्दर सिकोड़ें और बाहर को फेकें, निरन्तर पेट को गति देते रहें, मानों लिंग द्वारा कोई चीज

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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