इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा
स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)
पृष्ठ 67, कुल 250 में से
संदर्भ में पढ़ेंकश्यप जी के शरीर का कपड़ा पकड़ कर भोग करने के वास्ते हठ किया तब कश्यप जी ने हार मानकर उसके साथ भोग करके कहा- हे दिति! इस समय तुने जो यह अधर्म किया। इस पाप करने से तेरे दो पुत्र, ब्राह्मण व ऋषि आदि सब जीवों को दुःख देने वाले ऐसे बलवान् उत्पन्न होंगे कि कोई देवता या दैत्य या मनुष्य उनसे लड़ाई में सामना करने से जीत न सकेगा। दिति ने यह बात सुनते ही बहुत उदास होकर अपने पति से हाथ जोड़कर विनय की, महाराज मेरी इच्छा यह थी कि मेरे बेटे देवताओं को जीतकर अमरावती पुरी का राज्य करके सुख भोगें मुझको यह कामना नहीं थी कि मेरे बालक अधर्मी होकर ब्राह्मण आदि जीवों को दुःख देंगे, ऐसे पापी बेटे लेकर मैं क्या करूँगी। दिति का यह बचन सुनकर व उसे बहुत उदास देखकर कश्यप मुनि बोले, हे दिति! अब क्या किया जाय इस समय भोग करने का प्रभाव यही है इसी वास्ते में मना करता था परन्तु कुकर्म करने के पीछे शांच करता है। दिति के दोनों पुत्रों का नाम है- १. हिरण्याक्ष २. हिरण्यकशिपु। वास्तव में दोनों ही भयंकर सन्तानों के रूप थे।
सुखसागर तीसरा स्कन्ध,
१४ अध्याय
अध्यायन से आयु क्षय और निद्रा से दरिद्रता होती है किन्तु संध्या समय ईश्वराधना यह सर्वोत्तम कार्य सबको करना योग्य है।
नाशनीयात्संधिवेलायां न गच्छेन्नापिसिंविशैत्।
न चैव प्रलिखेदभूमिं नात्पनोपहरेत्स्वजम्॥
मनु ४/५
अर्थ- संध्याकाल में भोजन, शयन, यात्रा न करे और न भूमि पर लकीर खींचे और पहनी हुई माला को न निकाले।
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इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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