इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा
स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)
पृष्ठ 66, कुल 250 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंध्या समय
कुर्वैलिन दन्तलोपधारिणं
बाहवशिणं निष्कुरभाषिणं च।
सूर्यादये चास्तिमिते शयान
विमुञ्चति श्रीयदि चक्रपाणिः॥
चाणक्य नीति १५/४
अर्थ- मलीन वस्त्र वाले को, दांतों के मल को दूर न करने वाले को, बहुत भोजन करने वाले को कटुभाषी को और सूर्य के उदय और अस्त के समय में सोने वाले को लक्ष्मी छोड़ देती है। चाहे वह विष्णु भी हों।
संध्या समय १. भोजन २. मैथुन ३. अध्ययन और ४. निद्रा यह चार कार्य मत करो, क्योंकि संध्या के भोजन से रोग मैथुन से भयंकर सन्तान होती है।
जब दिति स्त्री धर्म से शुद्ध हुई तब उसने संध्या समय भोग करने की इच्छा करके कश्यप जी अपने पति के पास जाकर कहा, कि इस समय मुझे कामदेव दुःख दे रहा है व मेरे सौत के बेटे राजसिंहासन का सुख भोगते हैं। यह दुःख मुझसे सहा नहीं जाता, सो मेरी चिन्ता दूर कीजिए। यह वचन सुनकर मरीचि के बेटा कश्यप मुनि बोले हे दिति! इस समय तेरे साथ भोग व विलास, जो बहुत बुरा काम है नहीं कर सकता, संध्या से चार घड़ी रात बीते तक व चार घड़ी रात रहे से प्रातः काल तक सवाय लेने नाम व करने ध्यान परमेश्वर के दूसरा काम न करना चाहिए। इसलिए तू चार घड़ी और धैर्य रख जिसमें परमेश्वर के भजन व स्मरण का समय बीत जावे। उस समय दिति कामदेव के मद में ऐसी मतवाली हो रही थी कि अपने पति के समझाने पर भी उसने सन्तोष नहीं करके लाज व शर्म को छोड़ दिया व
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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