भारतकोश
इच्छानुसार संतान

इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा

स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)

Devanagarihipublished250 पृष्ठ

पृष्ठ 68, कुल 250 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 68

निद्रा

जिस प्रकार शरीर संचालन के लिए हमें भोजन की आवश्यकता रहती है, उसी प्रकार जब हमारे शरीर के अंग प्रत्यंग कार्य करते-करते थक जाते हैं और वे विश्राम करना चाहते हैं तब वही विश्राम हमारी निद्रा लेने से हमारे शरीर यन्त्र थकान को दूर करके पुनः नये बन जाते हैं, यदि निद्रा न हो तो थोड़े ही समय में शरीर नष्ट हो जाय। जिस प्रकार रेल का इंजिन २४ घण्टे बराबर चलने से तप्त हो जाता है, यदि वह इंजिन उस समय नहीं बदला जाय तो वह गर्मी से फट कर नष्ट हो जाय। यही स्थिति इस शरीर को है यदि निद्रा न ली जाय तो शरीर में कोई न कोई उपद्रव खड़ा होकर स्वास्थ्य को नष्ट कर डालेगा। पूर्ण निद्रा लेने से सुख, बल और जीवन की वृद्धि होती है। कम तथा अधिक निद्रा से रोग, कृशता, निर्बलता आदि होकर शरीर का नाश होने लगता है इसलिए सम्यक और योग्य समय में निद्रा का सेवन करना आवश्यक है। उत्तम निद्रा के लिए यथेष्ट चारपाई, सुन्दर बिछौना, तकिया और ऋतु अनुसार ओढ़ने का वस्त्र एवं उत्तम कमरा होना चाहिए। सोने का कमरा शान्त और हवादार हो, जहाँ चारों ओर की वायु प्रवेश हो सके, क्योंकि शुद्ध वायु मनुष्य जीवन तथा शरीर को स्वस्थ रखने के लिए अत्यन्त आवश्यक है। कमरे में रात्रि को बहुत हल्का प्रकाश रहना उत्तम है।

प्राच्योदिशि शिरस्सप्तं याम्याया मथवानुप।

सदैवस्वपतः पुंसो विपरीतं तु रोगदम्।

बिष्णु पुराण ३/११/१११

अर्थ- सदा सोते समय पूर्व या दक्षिण दिशा को सिर करके सोना चाहिए, इसके विपरीत सोने से रोग पैदा होते हैं।

स्वगृहे प्राक् शिराशोते श्वसुर्यं दक्षिणा शिरा।

प्रत्यक् शिरा प्रावासे तु न कदाचिदुदक शिरा॥ गायः

इच्छानुसार सन्तान

६४

वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri