भारतकोश
संग्रह पर लौटें

इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा

स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)

Devanagarihipublished250 पृष्ठ

निद्रा

निद्रा

जिस प्रकार शरीर संचालन के लिए हमें भोजन की आवश्यकता रहती है, उसी प्रकार जब हमारे शरीर के अंग प्रत्यंग कार्य करते-करते थक जाते हैं और वे विश्राम करना चाहते हैं तब वही विश्राम हमारी निद्रा लेने से हमारे शरीर यन्त्र थकान को दूर करके पुनः नये बन जाते हैं, यदि निद्रा न हो तो थोड़े ही समय में शरीर नष्ट हो जाय। जिस प्रकार रेल का इंजिन २४ घण्टे बराबर चलने से तप्त हो जाता है, यदि वह इंजिन उस समय नहीं बदला जाय तो वह गर्मी से फट कर नष्ट हो जाय। यही स्थिति इस शरीर को है यदि निद्रा न ली जाय तो शरीर में कोई न कोई उपद्रव खड़ा होकर स्वास्थ्य को नष्ट कर डालेगा। पूर्ण निद्रा लेने से सुख, बल और जीवन की वृद्धि होती है। कम तथा अधिक निद्रा से रोग, कृशता, निर्बलता आदि होकर शरीर का नाश होने लगता है इसलिए सम्यक और योग्य समय में निद्रा का सेवन करना आवश्यक है। उत्तम निद्रा के लिए यथेष्ट चारपाई, सुन्दर बिछौना, तकिया और ऋतु अनुसार ओढ़ने का वस्त्र एवं उत्तम कमरा होना चाहिए। सोने का कमरा शान्त और हवादार हो, जहाँ चारों ओर की वायु प्रवेश हो सके, क्योंकि शुद्ध वायु मनुष्य जीवन तथा शरीर को स्वस्थ रखने के लिए अत्यन्त आवश्यक है। कमरे में रात्रि को बहुत हल्का प्रकाश रहना उत्तम है।

प्राच्योदिशि शिरस्सप्तं याम्याया मथवानुप।

सदैवस्वपतः पुंसो विपरीतं तु रोगदम्।

बिष्णु पुराण ३/११/१११

अर्थ- सदा सोते समय पूर्व या दक्षिण दिशा को सिर करके सोना चाहिए, इसके विपरीत सोने से रोग पैदा होते हैं।

स्वगृहे प्राक् शिराशोते श्वसुर्यं दक्षिणा शिरा।

प्रत्यक् शिरा प्रावासे तु न कदाचिदुदक शिरा॥ गायः

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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अर्थ- पूर्व दिशा की ओर सिर करके सोने से धन की प्राप्ति होती है, दक्षिण दिशा की ओर सिर करके सोने से आयु बढ़ती है, पश्चिम दिशा की ओर सिर करके सोने से चिन्ता रहती है और उत्तर दिशा को सिर करके सोने से मृत्यु होती है। पश्चिमी विद्वान् भी मानने लगे हैं कि उत्तर को सिर करके सोने से नेत्रों की ज्योति नष्ट हो जाती है, वह कहते हैं कि हमारे शरीर में एक रेखा खड़ी रहती है, परन्तु उत्तर की ओर सिर करके सोने से ध्रुव की शक्ति से यह रेखा बेड़ी होकर लहराने लगती है, इससे मस्तिष्क रोग, नेत्र रोग हो जाते हैं। सदा उत्तर को सिर करके सोने वाला या तो पागल हो जायगा या अन्धा हो जायगा। जब रोगी मरणोपसन्न हो और दम घुट रहा हो तो उसका सिर उत्तर दिशा की ओर करने की प्रथा हमारे भारत वर्ष में प्रचलित है, इससे प्राण सुगमता से निकल जाता है, इससे सिद्ध होता है कि उत्तर दिशा में प्राणकर्षक कोई वस्तु अवश्य है।

पूर्वरात्रे व्यतीतेतु सङ्ख्येद्वैतमिदिरम्।

पादौपक्षालयेत्पूर्वं पश्चाच्छव्यां समाविशेत्॥

यमः

अर्थ- यमाचार्य का मत है कि एक प्रहर रात्रि व्यतीत हो जाने पर सोने के लिए अन्तःपुर में प्रवेश करे और चारपाई पर बैठकर पीवों को भली प्रकार धोकर तौलिया से साफ करके ईश्वर का स्मरण करते हुए सो जावे। ऐसा करने से निद्रा खूब आती है और स्वप्नदोषादि नहीं होते।

चारपाई पर पहले बार्यी करवट लेटक ८ शर्वास लो फिर दार्यी करवट से १६ और फिर सीधे चित होक ३२ शर्वास लेकर चाहें जिस करवट सो जाओ। पीठ के बल चित और बाई करवट सोने से पाचन शक्ति ठीक रहती है और आयु बढ़ती है।

वाम दिशायामनलो नामेरुव्यव्ति जन्तूनाम्।

तव्यात्तु वाम पार्श्वं शयति भुक् प्रपाकर्थम्।।

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वीरेन्द्र गुप्तः

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अर्थ- बाई करवट सोने से भोजन शीघ्र पचता है, क्योंकि नाभि से ऊर्ध्व बायाँ ओर आँन रहती है। पिताशय यकृत के ऊपर दाहिनी ओर होता है और वह नीचे की ओर पित्त छोड़ता है, बाई करवट सोने से पित्त ठीक गिरता रहता है और दाहिनी करवट सोने से बन्द रहता है। इसी प्रकार बृहदान्न जो दाहिनी ओर से प्रारम्भ होकर नीचे मल ले जाती है। बाई करवट लेटने से बराबर अन्न सार बृहदान्न से होकर निकलता रहता है और दाहिनी करवट लेटने से निकलने में कठिनाई होती है।

सोते समय चारपाई के पांस लाठी, खड़ाऊ और जल का लोटा अवश्य होना चाहिए। सोते समय मुख से पान, अपनी चारपाई पर से स्त्री और पुष्प माला हटा देनी चाहिए। पानादि को मुख में रख कर सोने से दाँतों में रोग होकर कौड़ा लग जाता है और मुख से दुर्गन्ध आने लगती है। जब पुष्प कुछ कुम्हला जाते हैं। तो उन पर छोटे छोटे जन्तु आकर बैठ जाते हैं। यदि सोते समय अपने समीप से पुष्प माला न अलग की तो यह जन्तु स्वर्वास द्वारा शरीर में प्रविष्ट होकर रोग उत्पन्न कर देते हैं।

रात्रि को स्त्री के साथ सोने से स्त्री पुरुष, रजः और वीर्य के रोगों से परिक्रान्त हो अपना जीवन नष्ट करते हैं, क्योंकि 'पिताधिक्यं यतः स्त्रियाः' स्त्री जाति में पिताधिक होता है। जब वह एक साथ लेटते हैं तो जो वीर्य नवनीत की भीति समस्त शरीर में व्याप्त होता है वह स्त्री की स्पर्श, जनित ऊष्मा से द्रवित हो प्रति समय पतित होता रहता है जो मूत्र करने में जरा सी उतेजना होने पर निकल जाता है और इस कारण निर्बलता प्रति दिन बढ़ती जाती है। जिससे वीर्य के द्रवीभूत होने से सन्तान जनक शुक्र का गुण विनष्ट हो जाता है।

एक साथ सोने से प्रतिदिन मैथुन करना पड़ता है, क्योंकि स्त्रियों में ऋणात्मक, पुरुषों में धनात्मक विद्युत शक्ति होती है, जो एक दूसरे को अपनी ओर खींचती है इससे मन विवश होकर

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वीरेन्द्र गुप्तः

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वीर्य

काम की इच्छा करता है और उपस्थेन्द्रियों में उत्तेजना होने लगती है। जिससे मैथुन करना ही पड़ता है।

इस कारण एक साथ सोने वाले प्रायः सन्तान हीन और निर्बल तथा नित्य नये रोगों से ग्रसित देखने में आये हैं।


वीर्य

वीर्य बड़ी अनुपम और अलभ्य वस्तु है। वीर्य शरीर का राजा है। राजा के सुदृढ़ रहने से समस्त राज्य और सेना सुदृढ़ रहती है। इसी प्रकार वीर्य के परिपक्व होने पर शरीर निरोगी और कंचनमय हो जाता है। अतएव हमको अपने राजा (वीर्य) की यत्न पूर्वक रक्षा करना अपना कर्तव्य समझना चाहिए। वीर्य की रक्षा करने को ब्रह्मचर्य कहते हैं। ब्रह्मचर्य आश्रम कम से कम युवकों के लिए २५ वर्ष और युवतियों के लिए १६ वर्ष का नियुक्त है। इसी समय में ब्रह्मचारी तथा ब्रह्मचारिणी को उचित है कि वह विद्याध्ययन का व्रत लेकर उसे यत्नपूर्वक पूरा करे। ब्रह्मचर्य ही एक ऐसा आश्रम है जिसके ठीक-ठीक पूर्ण होने से तीनों आश्रमों का पूर्ण सुख प्राप्त होता है। ब्रह्मचर्य की महिमा का वर्णन करने में हमारी निर्जीव लेखनी असमर्थ है।

ब्रह्मचर्य का बल पराक्रम कैसा अनुपम है इसका अनुमान अपने ग्रन्थों से भली प्रकार लग सकता है। ब्रह्मचर्य ही शरीर को दृढ़ और बलवान बनाता है। यही मनुष्य को देवता तथा मुनि बना देता है। इसी से मनुष्य के समस्त कार्य सिद्ध होते हैं।

सिद्धे विन्दो महा यत्ने।

किं न सिध्यति भूतले॥

अर्थ- जिसने वीर्य विन्दु को बड़े यत्न से सिद्ध कर लिया हो (अर्थात् ब्रह्मचर्य आश्रम विधि पूर्वक पूर्ण कर लिया हो) उसके

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वीरेन्द्र गुप्तः

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अर्थ- बाई करवट सोने से भोजन शीघ्र पचता है, क्योंकि नाभि से ऊर्ध्व बायीं ओर अग्नि रहती है। पिताशय यकृत के ऊपर दाहिनी ओर होता है और वह नीचे की ओर पित्त छोड़ता है, बाई करवट सोने से पित्त ठीक गिरता रहता है और दाहिनी करवट सोने से बन्द रहता है। इसी प्रकार बृहदान्न जो दाहिनी ओर से प्रारम्भ होकर नीचे मल ले जाती है। बाई करवट लेटने से बराबर अन्न सार बृहदान्न से होकर निकलता रहता है और दाहिनी करवट लेटने से निकलने में कठिनाई होती है।

सोते समय चारपाई के पांस लाठी, खड़ाऊ और जल का लोटा अवश्य होना चाहिए। सोते समय मुख से पान, अपनी चारपाई पर से स्त्री और पुष्प माला हटा देनी चाहिए। पानादि को मुख में रख कर सोने से दीर्घों में रोग होकर कौड़ा लग जाता है और मुख से दुर्गन्ध आने लगती है। जब पुष्प कुछ कुम्हला जाते हैं। तो उन पर छोटे छोटे जन्तु आकर बैठ जाते हैं। यदि सोते समय अपने समीप से पुष्प माला न अलग की तो यह जन्तु र्वींस द्वारा शरीर में प्रविष्ट होकर रोग उत्पन्न कर देते हैं।

रात्रि को स्त्री के साथ सोने से स्त्री पुरुष, रजः और वीर्य के रोगों से परिक्रान्त हो अपना जीवन नष्ट करते हैं, क्योंकि 'पिताधिक्यं यतः स्त्रियाः' स्त्री जाति में पिताधिक होता है। जब वह एक साथ लेटते हैं तो जो वीर्य नवनीत की भीति समस्त शरीर में व्याप्त होता है वह स्त्री की स्पर्श, जनित ऊष्मा से द्रवित हो प्रति समय पतित होता रहता है जो मूत्र करने में जरा सी उतेजना होने पर निकल जाता है और इस कारण निर्बलता प्रति दिन बढ़ती जाती है। जिससे वीर्य को द्रवीभूत होने से सन्तान जनक शुक्र का गुण विनष्ट हो जाता है।

एक साथ सोने से प्रतिदिन मैथुन करना पड़ता है, क्योंकि स्त्रियों में ऋणात्मक, पुरुषों में धनात्मक विद्युत शक्ति होती है, जो एक दूसरे को अपनी ओर खींचती है इससे मन विवश होकर

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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काम की इच्छा करता है और उपरस्थितियों में उत्तेजना होने लगती है। जिससे मैथुन करना ही पड़ता है।

इस कारण एक साथ सोने वाले प्रायः सन्तान हीन और निर्बल तथा नित्य नये रोगों से ग्रसित देखने में आये हैं।

★★★

वीर्य

वीर्य बड़ी अनुपम और अलभ्य वस्तु है। वीर्य शरीर का राजा है। राजा के सुदृढ़ रहने से समस्त राज्य और सेना सुदृढ़ रहती है। इसी प्रकार वीर्य के परिपक्व होने पर शरीर निरोगी और कंचनमय हो जाता है। अतएव हमको अपने राजा (वीर्य) की यत्नपूर्वक रक्षा करना अपना कर्तव्य समझना चाहिए। वीर्य की रक्षा करने को ब्रह्मचर्य कहते हैं। ब्रह्मचर्य आश्रम कम से कम युवकों के लिए २५ वर्ष और युवतियों के लिए १६ वर्ष का नियुक्त है। इसी समय में ब्रह्मचारी तथा ब्रह्मचारिणी को उचित है कि वह विद्याध्ययन का व्रत लेकर उसे यत्नपूर्वक पूरा करे। ब्रह्मचर्य ही एक ऐसा आश्रम है जिसके ठीक-ठीक पूर्ण होने से तीनों आश्रमों का पूर्ण सुख प्राप्त होता है। ब्रह्मचर्य की महिमा का वर्णन करने में हमारी निर्जीव लेखनी असमर्थ है।

ब्रह्मचर्य का बल पराक्रम कैसा अनुपम है इसका अनुमान अपने ग्रन्थों से भली प्रकार लग सकता है। ब्रह्मचर्य ही शरीर को दृढ़ और बलवान बनाता है। यही मनुष्य को देवता तथा मुनि बना देता है। इसी से मनुष्य के समस्त कार्य सिद्ध होते हैं।

सिद्धे विन्दो महा यत्ने।

किं न सिध्यति भूतले॥

अर्थ- जिसने वीर्य बिन्दु को बड़े यत्न से सिद्ध कर लिया हो (अर्थात् ब्रह्मचर्य आश्रम विधि पूर्वक पूर्ण कर लिया हो) उसके

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वीरेन्द्र गुप्तः

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लिपि पृथ्वी पर कोई ऐसा कार्य नहीं जिसे सिद्ध न कर सकें।

यही अकाल मृत्यु को विजय करता है। ब्रह्मचर्य पालन ही आयु बढ़ाने का सबसे सरल उपाय है। यही मनुष्य को अमर बना देता है इसी को बल प्रताप से असम्भव बातें भी सम्भव दीख पड़ने लगती हैं। भीष्म पितामह ने अपनी दृढ़ प्रतिज्ञा को अखण्ड ब्रह्मचर्य के बल से पूर्ण किया जो संसार में सूर्य के समान प्रकाशमान हैं। अंजनी सुत अखण्ड ब्रह्मचारी हनुमान ने अकेले ही सारी लंका को योद्धाओं के छवकें छुड़ा दिये और अन्त में सारी लंका को अग्नि के अर्पण करके माता जानकी की सुध ले वापिस लौटकर श्रीरामचन्द्र जी को समाचार दिया। आप इन घटनाओं को त्रेता और द्वापर की कहकर छोड़ देंगे, तो आप कलयुग की उन्नीसवीं शताब्दी के सुधारक ऋषि दयानन्द सरस्वती को ही ले लीजिये यह उनके अखण्ड ब्रह्मचर्य के बल तथा तेज का ही कारण है कि आज भारतवर्ष की काया ही पलटी दीखती है। सन् १८५७ की राज्य क्रान्ति के पश्चात् स्वतन्त्रता का शब्द लुप्त हो गया था उस समय स्वतन्त्रता शब्द को मुख से निकालना मानों मृत्यु को आमंत्रित करना था परन्तु ऐसे भयंकर समय में जबकि भारत पर पश्चिमी शासकों का पूरा दमन चक्र चल रहा था और भारतीय जनता को खटमल और चींटी के समान मसला जा रहा था, जिसके फलस्वरूप भारतवासी अपने शब्दकोष से स्वतंत्रता शब्द को निकाल चुके थे, क्योंकि स्वतंत्रता के शब्द को उच्चारित करने वाले को गोली लगा दी जाती थी। ऐसे भयंकर समय में और यह जानते हुए भी, इस समय भारत में मेरे विचारों जैसा अन्य कोई भी व्यक्ति नहीं है। तिस पर भी एक अपने अखण्ड ब्रह्मचर्य बल के प्रताप और ईश्वर की अपने ऊपर छाया के ही सहारे निर्भय निःसंकोच और स्वाभिमान के साथ कलकत्ते के भरे दरबार में वायसराय के सामने ऋषि दयानन्द सरस्वती ने गरज कर कहा कि अपने राज्य में चाहे सूखे चने ही क्यों न

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विरेंद्र गुप्तः

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खाने को मिलें, पर वह विदेशी शासन की भुंखलाओं के बीच रहते हुए घी, दूध, और हलुआ-पूरी के सामने श्रेष्ठ है। लार्ड नार्थब्रुक ऐसे शब्द सुनकर चकित हो गया, जबकि भारत की जनता अपने घर में बैठकर भी स्वतंत्रता के शब्द का उच्चारण तो दूर रहा स्मरण भी नहीं कर सकती थी, उस समय देश का यह सन्यासी निर्भय होकर स्वतंत्रता के सच्चे सुख का अनुभव करे। परन्तु उस लार्ड का साहस न हुआ कि वह ऋषि दयानन्द सरस्वती को बन्दी बना सके। क्यों? क्योंकि ऋषि दयानन्द की निर्भयता, सच्ची देश भक्ति और चेहरे के तेज से वह भयभीत हो गया। लोकमान्य तिलक आदि देश भक्तों ने ऋषि दयानन्द सरस्वती द्वारा उच्चारित स्वतंत्रता शब्द को अपने रक्त से सींचा और जिसके फलस्वरूप हम आज स्वतंत्र हैं। यही नहीं ऋषि दयानन्द सरस्वती की विद्वत्ता की दुंदुभी भी सारे विश्व-मण्डल में बज गई और अब बज भी रही है, उनका लिखित सत्यार्थप्रकाश संसार की २८ भाषाओं में प्रकाशित हो चुका है और संसार की शेष सभी भाषाओं में सत्यार्थप्रकाश का अनुवाद हो रहा है। फ्रांस ने सत्यार्थप्रकाश को तीसरे नम्बर पर मान्यता दी है। अतएव मुझे इतना ही कहना है कि पूर्ण ब्रह्मचर्य द्वारा ही भारतवर्ष के सारे दुःख और क्लेश दूर हो सकते हैं। संसार के आगे सिर उठाने और गौरव बढ़ाने का साहस तभी हो सकता है कि जब संमस्त भारतवासी ब्रह्मचर्य के पालन करने में पूर्ण ध्यान देंगे। ब्रह्मचर्य का अर्थ अविवाहित होना नहीं है, परन्तु हर प्रकार से कम से कम युवकों को २५ वर्ष और युवतियों को १६ वर्ष तक वीर्य को खण्डित नहीं होने देना और पूर्णरूप से वीर्य की रक्षा करने को ही ब्रह्मचर्य कहते हैं।

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वीरेन्द्र गुप्तः

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एषां वै भूतानां पृथिवी रसः | ---|--- पृथिव्या | आपोऽपामोषधय औषधीनां | पुष्पाणि पुष्पाणां | फलानि फलानां | पुरुषः पुरुषस्य | रेतः ॥

ब्रह्मदर्पणकोपनिषद् ६/४/१

अर्थ- इन भूतों का रस (पंच भौतिक) पृथ्वी है, पृथ्वी का रस जल है, जल का रस औषधियाँ हैं, औषधियों का रस पुष्प है, पुष्पों का रस फल है, फलों का रस (आधार) मनुष्य शरीर है तथा मनुष्य शरीर का रस (सार) शुक्र (वीर्य) है।

रसा इत्कं ततो मांसम्, मासात्, मेदः प्रजायते। मेद सोऽस्थि ततो मज्जा, मज्जाः शुक्रस्य सम्भवः ॥

भावप्रकाश पु- प्र- ६३

अर्थ- (जो मनुष्य अन्नादि खाता है) शरीर में प्रथम उसका रस बनता है, रस से रक्त, रक्त से मांस, मांस से मेद, मेद से हड्डी, हड्डी से मज्जा (मीग जो हड्डी के अन्दर होती है) और मज्जा से शुक्र (वीर्य) बनता है।

उपरोक्त प्रमाणों से सिद्ध होता है कि वीर्य भोजनादि से किस प्रकार बनता है। एक दिन का खाया हुआ अन्न ४० वें दिन रस रक्त आदि बनता हुआ वीर्य रूप में आता है। एक बार वीर्य के पात में १ तोला वीर्य का क्षय होता है जो १ सेर रक्त का सार होता है। १ सेर रक्त ४० सेर अर्थात् १ मन अन्न जल के भोजन से बनता है। एक मन अन्न ४० दिन में एक मनुष्य खाता है इसका अभिप्राय यह है कि एक बार के वीर्य क्षय होने में ४० दिन के भोजन का सार रस शरीर से निकल जाता है।

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वीरेन्द्र गुप्तः

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कामी पुरुषों का यह कहना है कि जब एक बार के भोग में ४० दिन के भोजन से बना यह वीर्य निकल जाता है, तो जब हम नित्य भोग करते हैं तो यह वीर्य कहीं से आता है। वह वीर्य संचित कोष से आता है जो बचपन से २५ वर्ष तक संचित होता रहता है। परन्तु ऐसे पुरुषों का वही हाल होता है, जैसा आयु कम और व्यय अधिक करने वाले का दिवाला निकल जाता है। उसी प्रकार शरीर नष्ट हो जाता है।

कच्ची कलियाँ तोड़ने से पुष्पों की महक मारी जाती है कच्चे फल तोड़ लेने से फलों का स्वादिष्टपन का आनन्द नहीं मिलता, कच्चा भोजन खाने से रोग उत्पन्न होते हैं। इसी प्रकार अपरिपक्व वीर्यपात से नपुन्मकत्त्व आदि महा भीषण रोग उत्पन्न हो जाते हैं जो मनुष्य को काल के गाल में शीघ्रतया पहुँचाने के लिए सहज साधन का कार्य करते हैं। ऐसी उत्तम वस्तु (वीर्य) को सुरक्षित रखने से जीवन प्राप्त होता है और पतन से मृत्यु।

मरणम् विन्दुपातेन जीवनम् विन्दु धारणम्।

तस्मात् अति प्रयत्नेन कुतृते विन्दु धारणम्॥

अर्थ— वीर्य का पतन मरण है, वीर्य धारण से जीवन, इस लिए अति प्रयत्न से वीर्य बिन्दु को धारण करें और रक्षा करें, उसका व्यर्थ क्षय न होने दें।

इसके अकालपात से मनुष्य केवल ठटरी रह जाता है। ऐसा पुरुष गृहस्थाश्रम का पूर्ण सुख अनुभव नहीं कर सकता। बाल्यवस्था (विद्यार्थी जीवन में) काम वासनाओं में प्रवृत्त हो जाने से युवाकाल में मुख लालिया रहित सौन्दर्य और तेज रहित तथा अशोभनीय लगता है। प्रथम तो ऐसे स्त्री पुरुषों के सन्तान ही नहीं होती, यदि होती भी है तो निर्बल, निस्तेज, मलीन, कुरूप, विद्याहीन, बलहीन, रोगी और निकृष्ट होती है। क्या जिस भारतवर्ष देश के अन्दर तैंतीस करोड़ देवता थे अर्थात् यहाँ का एक-एक नागरिक देवता के नाम से पुकारा जाता था। सारे संसार को विद्या सम्यत्ता

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वीरेन्द्र गुप्तः

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ब्रह्मचर्य साधन

साम्यता का देने वाला कहा जाता था। वह भारतवर्ष ब्रह्मचर्य से हीन होकर कैसी निकुष्ट दशा को प्राप्त हुआ है। जहाँ हमारा नेतृत्व करने वालों की कमी नहीं थी, उस देश में अब नेतृत्व करने वालों की कमी ही नहीं वरन् अभाव है क्या आप बता सकते हैं कि हमारे बीच से जो नेता, सुधारक पथप्रदर्शक चला गया उसके स्थान पर दूसरा आया? नहीं। जैसे ऋषि दयानन्द सरस्वती का स्थान रिक्त हुआ उसकी पूर्ति नहीं हुई। इसी प्रकार स्वामी श्रद्धानन्द जी, पं.लेखराम, पंजाब केसरी लाला लाजपतराय महात्मा गांधी, सरदार पटेल, श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पं. जवाहर लाल नेहरू, इन सब के जाने के पश्चात् इनके स्थानों की पूर्ति नहीं हुई नाही भविष्य में दीखता है कि पूर्ति हो।

ब्रह्मचर्य के नियमोल्लंघन ने आज भारतवर्ष का नाश कर डाला है आज भी यह समझा जाय कि जिस वीर्य के पतन से हमारे क्षति हुई। इसके रक्षण से जो लाभ होगा उससे हमारी सन्तान भयानक दुःखों और क्लेशों से मुक्त होगी और उनका पुरुषत्व पुनः संसार के इतिहास में आकाश के दिवाकर सद्गुण दैदीप्यमान होने लगेगा।

अतएव आपको चाहिए कि अपनी सन्तानों को और स्वयं भी ब्रह्मचर्य के नियमों का पालन करते कराते हुए विद्या पढ़ें पढ़ाएँ और बच्चों को वीर पुरुषों के चित्र तथा कहानियाँ सुनाकर उनके हृदय-पट पर सच्चरित्रता चित्र को अंकित कर दें ताकि उन बच्चों को यश, कीर्ति, बुद्धि और तेज से यथा समय लाभ पहुंच सके।

तरुणावस्था भी कैसी मनमोहक अवस्था है। शैशवावस्था को पार कर तरुणावस्था में पदार्पण करते ही यौवन कुसुम खिलने लगता है, मुखमण्डल पर गुलाबी रंगत लहराने लगती है। इसी अवस्था में शरीर के गठन का सौन्दर्य प्रत्येक दृष्टिगोची को अपनी ओर आकर्षित करता है। यही काल मदन की तरंगों में लहराया करता है। द्वादश वर्षारम्भ में ही तरुणावस्था के चिन्ह प्रदर्शित होने

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७२

वीरेन्द्र गुप्तः

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लगते हैं। युवक पच्चीसवें वर्ष में पूर्ण यौवन को प्राप्त होते हैं और युवतियाँ सोहलवें वर्ष में पूर्ण यौवन को प्राप्त होती हैं। क्योंकि शरीर में समस्त धातुओं, वीर्य आदि की उत्पत्ति होती है। ज्यों-ज्यों वीर्य परिपक्व होता जाता है त्यों-त्यों शरीर सर्वांग सुन्दर और सुदृढ़ होता जाता है, मुख पर लालिमा प्रकट होने लगती है, यहाँ तक कि पूर्ण युवाकाल पर पहुँच कर तेज, बल और सौन्दर्य बस देखने योग्य होता है।

ऋषि दयानन्द सरस्वती ने अपने सत्यार्थ प्रकाश के तीसरे समुल्लास में ब्रह्मचर्य के तीन प्रकार बताये हैं।

१. निकुष्टतम- २५ वर्ष का युवक और १६ वर्ष की युवती।

२. मध्यम- ३६ या ४० वर्ष का युवक और १८ या बीस वर्ष की युवती।

३. श्रेष्ठतम- ४८ वर्ष का युवक और २४ वर्ष की युवती।

स्मरण रहे कि यह विशेषता अविवाहित होने से नहीं मिलती, वरन् वीर्य रक्षा करने से (अक्षत् वीर्य और अक्षत् योनि) होने से ही मिलती है।

यह समय बड़ा ही विकट और चंचल है। इसी में युवक और युवतियों को अपने ब्रह्मचर्य व्रत की परीक्षा देनी पड़ती है मदन की तरंगों को हटाना बड़ा कठिन कार्य है। यदि इस कठिन परीक्षा में उत्तीर्ण हो गये और वीर्य के उबलते हुए वेग को पूर्ण रक्षा यथावत् कर सके तो फिर मनुष्य नहीं वरन् देवता है। ऐसे युवक और युवतियाँ हर कहीं आदरणीय और पूज्य होते हैं।

परन्तु शोक है कि भारतवर्ष के ऐसे भाग्य कहीं! दुःखाचारी जनों की गोष्ठियाँ दुष्ट प्रभावों और निशिदिन बढ़ने वाले कूटवों ने हमारे देश का सर्वनाश कर दिया। जैसे युवाकाल से पूर्व ही विवाह का हो जाना, खोटी संगत में पड़ कर हस्त मैथुन तथा गुदा मैथुनादि करना कराना। इन्हीं कूटवों के कारण आज भारत रसातल को जा रहा है। हे भारत के युवकों! युवतियों, आप ही के

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वारेन्द्र गुप्तः

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स्वप्न दोष नाशक चमत्कारी बूटियाँ

कन्यों पर भारत का भविष्य है। युवाकाल में खोटी संगत में न पड़कर इन कुट्टेओं से बचकर अपने शरीर को पुष्ट बनाकर विद्या प्राप्त करो। जिससे भारत का भविष्य उज्ज्वल होकर समस्त विश्व को सभ्यता और साम्यता का पाठ दे सके।

हमारा इतिहास बताता है कि द्वारपर में वीर अर्जुन ने अमरीका के राजा की कन्या उलूपी से विवाह किया था। धर्मराज युधिष्ठिर की राजसूय यज्ञ में समस्त विश्व के राजाओं ने अपना-अपना कर देकर महाराजा युधिष्ठिर को चक्रवर्ती राजा माना था। हे भारतवासियों! हांशा मत हो ब्रह्मचर्य का पालन करो और फिर से अपने पूर्वजों के समान चक्रवर्ती राजा बनो।


ब्रह्मचर्य साधन

प्रातः सूर्योदय से कुछ समय पूर्व शौच, संध्यापासनादि से निवृत्त होकर सिद्धासन पर बैठे। आसन लगाते समय ध्यान रहे कि पहले बायें पैर को एड़ी गुदा और अण्डकोषों के मध्य सीमन पर लगायें, पश्चात् दाहिने पैर की एड़ी लिंग के मूल पर रखनी चाहिए, दोनों पैरों के गट्टे आपस में ऊपर नीचे मिले रहें। कुछ ही दिनों में आसन पर बैठने का सही अभ्यास हो जायगा। आसन पर सीधे बैठकर देखें कौन-सा स्वर चल रहा है, जिस नथने से श्वास आ जा रही हो उससे दूसरे नथने को अंगुली या अंगुठे से दबाकर बन्द करें, फिर चलते हुए नथने से धीरे-धीरे श्वास अन्दर खींचें, उसी समय गुदा को ऊपर खींचकर संकोचन करते हुए मूल बन्ध लगायें। पूर्ण श्वास भर जाने पर नथने से हाथ हटाकर श्वास को भीतर ही रोकें रहें, ध्यान रहे गुदा, द्वार बराबर ऊपर को खिंचा रहे, ढीला न होने पावे। श्वास रोक कर पेट के निचले भाग को गति दें अर्थात् पेट को अन्दर सिकोड़ें और बाहर को फेकें, निरन्तर पेट को गति देते रहें, मानों लिंग द्वारा कोई चीज

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वीरेन्द्र गुप्तः

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ऊपर को खींची जा रही है, परन्तु मूलबन्ध बराबर लगा रहे, सरलता से जितनी देर श्वास रुक सकें उतनी देर तक पेट की गति का अभ्यास करते रहें, तत्पश्चात् पेट की गति को रोक कर जिस नथने से श्वास खींची है उसे अंगुली या अंगूठे से बन्द करके दूसरे नथने से धीरे धीरे श्वास को बाहर निकाल दो, नाक से हाथ हटाकर जितनी देर हो सकें श्वास को बाहर ही रोको। मूलबन्ध लगा रहे और पेट को भी गति नहीं देनी। यह एक प्राणायाम हुआ। इसी प्रकार चलते नथने से पुनः श्वास-खींचकर पूर्ववत् क्रिया करें, इस प्रकार तीन प्राणायाम करें। जब भली प्रकार गुदा का संकोचन होने लगे तो प्राणायाम की संख्या बढ़ाते जायें। गुदा संकोचन से ही वीर्य का स्तम्भन होता है और गुदा के ढीले रहने से ही स्वप्नदोष एवं वीर्यपातादि होते हैं। अतः जब गुदा संकोचन द्वारा वश में होगी तो वीर्य में पूर्ण स्तम्भन होगा। इस साधन में जितना मनसा, वाचा, कर्मणा, स्त्री प्रसंग से दूर रहेंगे उतना ही शीघ्र लाभ होगा। जब एक बार इस साधन को सिद्ध कर चुके हैं तो आयु पर्यन्त स्वप्नदोष, शीघ्रपतन, शुक्रमेह आदि सारे वीर्य सम्बन्धी दोषों से आपको मुक्ति मिल जायगी और दिन प्रतिदिन आपका स्वास्थ्य, आयु, बल और बुद्धि में विकास होता रहेगा। यदि साधन समय में पेट के नलों में पीड़ा होने लगे तो शुद्ध देशी घी गर्म करके मलें या पिसी हल्दी की कपड़े में पोटली बीचकर गर्म करके उसकी टकोरें दें। ध्यान रहे साधन काल में सुपाच भोजन लें, मिर्च, खटाई और तेज पदार्थों का त्याग करें।


इच्छानुसार सन्तान

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स्वप्नदोष नाशक चमत्कारिक बूँटी

जिन नवयुवकों को स्वप्नदोष होता ही रहता है, उन्हें चाहिए कि वह प्रातःकाल शौच, स्नानादि से निवृत्त होकर निराहार मुँह 'अपामार्ग' जिसे 'औंगा' भी कहते हैं, लम्बी शाख वाली जिस पर चावल से लगे रहते हैं, उसकी ताजा जड़ उखाड़ कर जल से मिट्टी साफ करके तीन अंगुल अर्थात् २ इंच अनुपात में लेकर मुख में रखकर धीरे-धीरे चबाकर रस चूसते जायें, बाद में फोकस को थूक दें। इसे आठ दिन निरन्तर सेवन करें। इसके सेवन से स्वप्नदोष जैसे भयंकर रोग से शीघ्र छुटकारा मिल जायगा। बाद में भी सप्ताह में एक दो बार बूँटी का सेवन करते रहा करें। अभूतपूर्व लाभ होगा। जड़ नित्य ताजा लेनी चाहिए।


विवाह

विवाह जीवन में बड़े महत्त्व का संस्कार है। इसी पर आगामी सन्तानोत्पत्ति तथा देशोन्मति निर्भर है। विवाह ही सृष्टि वृद्धि का साधन है तथा पारिवारिक सुख का एक मात्र द्वार है।

विवाह प्रेम तथा नवजीवन का आरम्भ है। इसके द्वारा पति और पत्नि दो शब्दों की उत्पत्ति होती है। विवाह के नाम से बच्चों के मुख पर हँसी आ जाती है। युवकों का हृदय विवाह के नाम से नव-प्रेम संचार की आशा तथा पूर्णसुख का अनुभव के लिए लालायित हो जाता है। युवतियों का मदन-कुमुद खिलने लगता है तथा लज्जा से नेत्र नीचे हो जाते हैं। यह विवाह सुख और आनन्द के आमोद-प्रमोद से भरा होता है। इसी कारण यह समारोह के साथ सम्पन्न होता है।

विवाह का उद्देश्य सुख के साथ पारिवारिक जीवन

इच्छानुसार सन्तान

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व्यतीत करना है। परन्तु आजकल इसके सर्वथा विपरीत देखने में आता है। विरले ही पुरुष विवाह करके यथार्थ सुख को पाते हैं। विवाह का मुख्य उद्देश्य बलिष्ठ सन्तान उत्पन्न करके अपने परिवार देश तथा जाति को उन्नति की ओर अग्रसर करना है। बाल-विवाह से इस हेतु की पूर्ति नहीं हो सकती। बाल-विवाह के कारण ही विविध रोगों को उत्पत्ति हो गई है। सहस्रों बालक अकाल मृत्यु से पंचतत्व में विलीन हो जाते हैं। जिस देश में बच्चे बाल्यकाल में ही मृत्यु को प्राप्त हो जायें, वह देश आगे को कैसे उन्नति कर सकता है। बाल-विवाह ही के कारण सहस्रों बाल-विधवा स्त्रियाँ भारत को कर्त्तविकर रहती हैं। जो देश में वेश्याओं के रूप में पुरुषों से अपना प्रतिशोध लेती हैं। वह कहती हैं कि तुमने हमारा विवाह बाल्यकाल में ही कर दिया और जब हमारी आयु तरुणावस्था को प्राप्त हुई उस समय से पूर्व ही विधवा हो जाने पर घर से निकाल दिया। क्या पुरुष अपने अनेक विवाह नहीं करते हैं? तो हमें द्वितीय विवाह करने का अधिकार क्यों नहीं? हम वेश्या वृत्ति करके तुम्हारे पुरुषत्व को समय से पूर्व ही अपने हाव-भाव दिखाकर नष्ट कर देंगी।

मित्रों, आपको योग्य है कि आप अपने बच्चों का विवाह पूर्ण तरुणता प्राप्त होने पर ही करें अर्थात् युवकों का २५ वर्ष और युवतियों का १६ वर्ष से पूर्व विवाह न करें।

ऊन षोडश वर्षा याम प्राप्तः पंचविंशतिम्।

यद्याधत्ते पुमान गर्भं कृक्षिस्थः सविपद्यते॥

जातो वा न चिरं जीवेत् जीवेद्वा दुर्बलेन्द्रियः।

तस्मादत्यन्त बालायां गर्भाधानं न कारयेत्॥

सुश्रुत शरीर स्थान अ- १०

अर्थ- यदि २५ वर्ष से कम आयु का युवक १६ वर्ष से कम आयु की युवती के साथ समागम करता है तो गर्भ की स्थिति नहीं हो पाती। यदि गर्भ रह भी जाता है तो वह नष्ट हो

इच्छानुसार सन्तान

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जाता है। यदि गर्भ नष्ट न हो और बच्चा उत्पन्न हो जाय तो वह अधिक समय तक जीवित नहीं रहता। यदि अधिक समय तक जीवित रह जाय तो वह दुर्बलीन्द्रिय होता है। अतः अपरिपक्व आयु की युवती से बच्चा उत्पन्न करने का प्रयत्न न होना चाहिए।

जब आम के नये वृक्ष पर मौल आता है तो माली ३ वर्ष तक उस मौल को तोड़ते रहते हैं। एक माली से मालमू किया कि आम के नये वृक्ष का मौल ३ साल तक क्यों तोड़ देते हैं? उसने कहा कि पुरखों से ऐसा ही चला आता है। पर जो वनस्पति विद्या के जानकार हैं वह कहते हैं कि यदि तीन वर्ष तक आम का मौल तोड़ दिया जायगा तो उस पर लगे फलों में कीड़े नहीं पड़ते और फल भी मीठा और बड़ा आवेगा। यह एक प्रत्यक्ष चमकता हुआ सर्वदेशीय नियम है, इसी नियम के ज्ञाता मनु भगवान ने लिखा है—

श्रीणि वषाण्युदीक्षेत कुर्मार्मृतुमती सती।

ऊर्ध्वं तु काला देतस्माहिन्देत सदृशं पतिम्॥

मनु १/१०

अर्थ— जब तीन वर्ष तक (अर्थात् छत्तीस बार) कन्या पिता के यहाँ रजस्वला हो ले तब अपने सदृश गुण वाले पति को प्राप्त होवे।

परो देहिं शामुल्यं ब्रह्मभ्यो वि भजा वसु।

कृत्येषा पद्मती भूत्वा जाया विशते पतिम्॥

ऋग्वेद १०/८५/२९

भावार्थ— जब स्त्री का विषाक्त शरीरस्थ मल का अंश दूर हो जाय तभी पुरुष के समीप जाना उचित है। अन्यथा स्त्री का विषाक्त पुरुष के शरीर में प्रविष्ट होकर पुरुष को रोग युक्त बना देता है। अर्थात् जब तक ३६ बार रजोदर्शन द्वारा स्त्री का शरीर शुद्ध न हो जाय तब तक स्त्री से कभी समागम न करे। यदि इससे पूर्व समागम करेगा तो वीर्य सम्बन्धी अनेक रोग उत्पन्न हो

इच्छानुसार सन्तान

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जनक और जननी

जावंगे तथा रजस्वला स्त्री से भी समागम न करे।

जब इन नियमों पर मनुष्य चलते थे तब बच्चे आजकल की भाँति निर्बल, रोगी, अल्पायु नहीं होते थे और अब भी यदि सन्तानोत्पत्ति में नियमों का पालन होने लग तो पुनः वहाँ समय आ जाने की सम्भावना है और फिर से अर्जुन, द्रोणाचार्य और भीष्म जैसी वज्रगंभी सन्तानों उत्पन्न होने लगेंगे।

मनु जी ने विवाह आठ प्रकार के लिखे हैं— ब्राह्मो दैवतर्थेवार्षः प्राजापत्यस्यसासुरः।

गान्धर्वोराक्षसश्चैव पेशाचश्चाष्टमोघमः॥

मनु ३/२१

अर्थ— १. ब्राह्म २. दैव ३. आर्य ४. प्रजापत्य ५. आसुर ६. गान्धर्व ७. राक्षस ८. पेशाच, यह आठ प्रकार के विवाह हैं।

ब्राह्मदिषु विवाहेषु चतुर्विजानुपूर्वशः।

ब्रह्मवर्चस्विनः पुत्रा जायन्ते शिष्टसम्पत्ता॥

मनु ३/२९

अर्थ— ब्रह्मादि चार प्रकार के विवाहों में ही क्रम से ऐसे पुत्र होते हैं जो ब्रह्म, तेजस्वी और श्रेष्ठ मनुष्यों के प्यारे।

रूप सत्त्वगुणोपेता धनवन्तो यशस्विनः।

पर्याप्तभोगा धर्मिष्ठा जीवन्ति च शतं समाः॥

मनु ३/४०

अर्थ— रूपवान्, पराक्रमी, गुणवान्, धनवान्, यश वाले, पुष्कल भोग वाले, धर्मात्मा और सौ वर्ष की आयु वाले होते हैं।

इतरे तु शिष्टेषु नृशंसानृतवादिनः।

जायन्ते दुर्विवाहेषु ब्रह्मधर्म द्विषः सुता॥

मनु ३/४१

अर्थ— शेष दुष्ट विवाह से सन्तान निर्लज्ज, झूठ बोलने वाली, ब्रह्म, धर्म द्वेषी (ब्राह्मणों व धर्मों के शत्रु) उत्पन्न होते हैं।

इच्छानुसार सन्तान

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अनिन्दतैः स्त्री विवहैरनिन्द्या भवति प्रजा । निन्दन्तनिन्दिता नृणां तस्मान्निन्द्यानिवर्जयेत् ॥

मनु ३/८२

अर्थ- अच्छे विवाहों से अच्छी और बुरे विवाहों से बुरी सन्तान मनुष्यों के होती है। इस कारण निन्दित विवाहों का त्याग करें।

इसका अभिप्राय यह है कि व्यभिचार, अपहरण, दुराचार और बिना लक्ष के द्वारा जो सन्तान होती है वह दुष्ट प्रकृति का, धन तथा कर्म से होन, देश जाति को कलंकित करने वाली होती है, और जो विचार पूर्वक नियमानुसार संस्कारमय सन्तान होती है वह देश जाति के गौरव को द्विगुणित, चौगुणित करती है इसीलिए सुसन्तति के निर्माण हेतु ही संस्कारित विवाह के लिए वेद तथा मनु जी ने उपदेश किया है।

आजकल जिस प्रकार की पद्धति विवाह में चल रही है उसका एक उदाहरण यहाँ देते हैं, विद्वान् जन उसके दोषों को समझकर अपनी परिपाटी में परिवर्तन करें।

लाला श्यामलाल की एक पुत्री थी। जिसका नाम लक्ष्मी देवी था। उन्होंने उसे पश्चिमी पद्धति से शिक्षा दिलाई, लक्ष्मी बड़ी ही विचारशील, सभ्य और साथ ही भारतीय संस्कृति सभ्यता को भी भली प्रकार जानती थी। अपनी तीव्र बुद्धि के कारण गायनादि कला में भी पूर्ण पारंगत थी। लाला श्यामलाल ने अपने एक मित्र के लड़के के साथ उसका विवाह कर देना तय कर दिया। उस समय वह महोदय इंग्लैंड में आईन्सीएस० की तैयारी कर रहे थे। लक्ष्मी को घर के माता-पिता एवं सभी पारिवारिक जनों ने देखकर पसन्द कर लिया था।

लाला श्यामलाल के यहाँ बारात आ गई। रात्रि के तीन बजे वह महोदय कन्या के पिता के द्वार पर आ खड़े हुए। लाला श्यामलाल के पास अपना विजिटिंग कार्ड भेजा। लाला श्यामलाल

इच्छानुसार सन्तान

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आश्चर्य चकित हो द्वार पर आये। देखा, भावी दामाद खड़े हैं। लाला श्यामलाल ने चकित होकर रात्रि के समय उपस्थित होने का कारण मालूम किया। उत्तर में वर ने कहा मैं लड़की देखने आया हूँ, मैंने वैसे तो लड़की की बहुत प्रशंसा सुनी है। माता-पिता प्रशंसा करते नहीं थकते। परन्तु फिर भी आप जानते हैं, अपनी-अपनी आँखें हैं और अपनी-अपनी पसन्द। इसमें कोई हर्ज भी नहीं। हर्ज तो तब था जब पर्दे की प्रथा थी। क्योंकि कल को यदि न बने तो दोनों का जीवन नष्ट होने से बचा रहे। लाला श्यामलाल पुराने विचारों के पुरुष थे। उनके लिए प्रथा अटल नियम थी। उन्हें समाज का भय था। इसलिए उन्होंने पहले तो मना कर दिया और कहा मान लो मैंने तुम्हें लड़की दिखा दी और तुमने उसे पसन्द न किया तो क्या विवाह रुक जायगा? तुम कहोगे इसमें हनि ही क्या है। तुम्हारे लिए न होगी हमारी तो नाक कट जायगी। इन बातों का वर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वर ने कहा बिना देखे मैं विवाह न करूँगा, अब तो लाला श्यामलाल बड़ी विपत्ति में पड़ गए। बारत घर पर आ गई थी प्रातः ब्राह्ममुहूर्त में विवाह होना था, चार घण्टे का अन्तर। आखिर पिता ने लक्ष्मी को कमरे में बुला लिया। वर ने देखा वह वास्तव में वैसी ही सुन्दर है जैसी उसकी प्रशंसा सुनी थी। वर ने प्रश्न किया 'आप इग्लिश पढ़ी हैं?' लक्ष्मी ने संकोच से उत्तर दिया 'पढ़ी हैं'। लक्ष्मी के हाथ में अंग्रेजी का समाचार-पत्र देकर पढ़वाया। वह लक्ष्मी के उच्चारण और मधुर कण्ठ पर मुग्ध हो गए। लक्ष्मी ने संगीत में भी परीक्षा दी और उसमें भी उत्तीर्ण हो गई।

वर ने कहा- 'मुझे लड़की पसन्द है।' लक्ष्मी ने निश्चयात्मक रूप से कहा- 'परन्तु आप मुझे पसन्द नहीं।'

लक्ष्मी ने अपने उक्त शब्दों के समर्थन में जो कहा, वह एक सुशील भारतीय महिला के लिए उपयुक्त है।

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