भारतकोश
इच्छानुसार संतान

इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा

स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)

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पुजितं हृशन नित्यं बलमूर्ज च यच्छति। अपुजितं तु तद भुक्तमुभयं नाशयेदितम्।।

मनु २/५५

अर्थ- संस्कृत अन्न वीर्य को देता है और असंस्कृत अन्न बल, सामर्थ्य इन दोनों का नाश करता है। (इसलिए शुद्ध पवित्र भोजन बलिवैश्य यज्ञ करके खाना चाहिए)

भोजन का स्थान एकात्म, स्वच्छ, पवित्र और सुन्दर होना चाहिए। क्रोध तथा शोक के समय में खाया हुआ भोजन शरीर में रस के स्थान पर विष बनाता है। इसलिये क्रोध और शोक के समय भोजन न करना चाहिए। भोजन के पात्र सुन्दर, आकर्षक और स्वच्छ हों।

भोजन के समय माता, पिता, वैद्य, मित्र, परिवार जन और पाककर्ता के अतिरिक्त अन्य किसी को समीप न रहने दो तथा मोर, चकोर, वानर, मुर्गा की दृष्टि के अतिरिक्त अन्य का दृष्टिपात योग्य नहीं।

भोजन करने के प्रथम अदरक और लवण की बनी चटनी खा लेनी चाहिए, इससे रुचि बढ़ती है और ग्रन्थियां खूब रस देने लगती हैं। यह रस पाचन में विशेष स्थान रखता है। तत्पश्चात् मधुर चिकना हलन्गरी घी, चावल, मीठा, फल, दही, रोटी उत्तम शाक के साथ धीरे-धीरे खाना चाहिए और अन्त में रुचिपूर्वक मिश्री युक्त दूध पियें। भोजन के आदि में जल पीने से मन्दाग्नि तथा भोजन के अन्त में जल पीने से विष सद्गुण और कफ को बढ़ाने वाला होता है। इसलिए भोजन के मध्य में थोड़ा सा जल धीरे-धीरे पीना चाहिए। जो अमृत के तुल्य है। भोजन के उपरान्त एक घण्टे के पश्चात् जल पीने से बल बढ़ता है।

अजीर्णं भैषजं वारि जीर्णं वारि बलप्रदम्।

भोजने चामृत वारि भोजनान्ते विषप्रदम्।।

चाणक्य नीति ८/७

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

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