भारतकोश
इच्छानुसार संतान

इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा

स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)

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अर्थ- जल अजीर्ण (कब्जा) में औषधि है, पच जाने पर बल देने वाला है भोजन के मध्य में जल अमृत के समान है, और वही भोजन के अन्त में विष का फल देता है।

भोजन करते समय इस बात का ध्यान रखना उचित है कि आधा पेट भोजन से भर लें और चतुर्थ भाग जल से तथा शेष चतुर्थ भाग वायु के लिए रिक्त रहने दें। इस प्रकार की मात्रा से भोजन कभी अजीर्ण नहीं करता और सदैव सुख देता है। अधिक प्यास लगी होने पर भोजन नहीं करना चाहिए। भोजन करने से गुल्म रोग हो जाता है, इसलिए जल पीकर एक घण्टे पश्चात् भोजन करें। भूख लगने पर जल नहीं पीना चाहिए। जल पी लेने से जलोदर हो जाता है। भोजन सदैव सादा हल्का शीघ्र ही पच जाने वाला खाना चाहिए। अधिक मसालेदार भोजन से हानि होती है। भोजन को भली प्रकार चबा-चबाकर खाना चाहिए। एक-एक ग्राम को ३२ बार चबाना चाहिए जिससे उसमें लार गिल्हियों का रस पूरी मात्रा में मिलकर पाचन क्रिया को ठीक रखे। प्रभु ने दंत भोजन पीसने को दिये हैं और आँतें पचाने के लिए। जो मनुष्य दंतों का काम आँतों से लेते हैं वह सदैव रोगी रहते हैं। उनकी आँतें शक्ति हीन होकर अपना भी कार्य करने में असमर्थ हो जाती हैं। भोजन सदैव निश्चित समय पर ही करना उचित है। कहावत है कि हजार काम छोड़ कर नहाना और सौ काम छोड़कर खाना। भोजन हाथ पैर और मुख थोकर करना चाहिए इससे आयु और बल बढ़ता है।

शतं विहाय भोकव्यं, सहस्रं स्नान माचरेत्। लक्षं विहाय दातव्यं, कोटिं त्यक्त्वा हरि भजेत्॥

महाभारत

अर्थ- सौ काम छोड़कर भोजन करना, हजार काम छोड़कर स्नान करना चाहिये, लाख काम छोड़कर दान और करोड़ों कामों को त्यागकर प्रभु चिन्तन अर्थात् सन्ध्यापासनादि करना चाहिये।

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri