ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 100, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
व्याख्या—नचिकेता कहता है—‘हे यमराज ! जिस आत्मतत्त्वसम्बन्धी महान् ज्ञानके विषयमें लोग यह शङ्का करते हैं कि मरनेके बाद आत्माका अस्तित्व रहता है या नहीं, उसके सम्बन्धमें निर्णयात्मक जो आपका अनुभूत ज्ञान हो, मुझे कृपापूर्वक उसीका उपदेश कीजिये। यह आत्मतत्त्वसम्बन्धी वर अत्यन्त गूढ़ है—यह सत्य है; पर आपका शिष्य यह नचिकेता इसके अतिरिक्त दूसरा कोई वर नहीं चाहता’ ॥ २९ ॥
॥ प्रथम वल्ली समाप्त ॥ १ ॥
द्वितीय वल्ली
सम्बन्ध—इस प्रकार परीक्षा करके जब यमराजने समझ लिया कि नचिकेता दृढ़ निश्चयी, परम वैराग्यवान् एवं निर्भीक है, अतः ब्रह्मविद्याका उत्तम अधिकारी है तब ब्रह्मविद्याका उपदेश आरम्भ करनेके पहले उसका महत्त्व प्रकट करते हुए यमराज बोले—
| अन्यच्छ्रेयोऽन्यदुतैव | प्रेय- |
|---|---|
| स्ते उभे नानार्थे | पुरुषःसिनीतः। |
| तयोः श्रेय आददानस्य | साधु |
| भवति हीयतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीते ॥ १ ॥ |
श्रेयः=कल्याणका साधन; अन्यत्=अलग है; उत्त=और; प्रेयः=प्रिय लगनेवाले भोगोंका साधन; अन्यत् एव=अलग ही है; ते=वे; नानार्थे=भिन्न-भिन्न फल देनेवाले; उभे=दोनों साधन; पुरुषम्=मनुष्यको; सिनीतः=बाँधते हैं—अपनी-अपनी ओर आकर्षित करते हैं; तयोः=उन दोनोंमेंसे; श्रेयः=कल्याणके साधनको; आददानस्य=ग्रहण करनेवालेका; साधु भवति=कल्याण होता है; उ यः=परंतु जो; प्रेयः वृणीते=सांसारिक भोगोंके साधनको स्वीकार करता है; [सः=वह;] अर्थात्=यथार्थ लाभसे; हीयते=भ्रष्ट हो जाता है ॥ १ ॥