ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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कठोपनिषद्
१७
अजीर्यताममृतानामुपेत्य
जीर्यन् मर्त्यः क्वधःस्थः प्रजानन् ।
अभिध्यायन् वर्णरतिप्रमोदा-
नतिदीर्घं जीविते को रमेत ॥ २८ ॥
जीर्यन् मर्त्यः=यह मनुष्य जीर्ण होनेवाला और मरणधर्मा है; प्रजानन्=इस तत्त्वको भलीभाँति समझनेवाला; क्वधःस्थः=मनुष्यलोकका निवासी; कः=कौन (ऐसा) मनुष्य है (जो कि); अजीर्यताम्=बुढ़ापेसे रहित; अमृतानाम्=न मरनेवाले (आप-सदृश) महात्माओंका; उपेत्य=सङ्ग पाकर भी; वर्णरतिप्रमोदान्=(स्त्रियोंके) सौन्दर्य, क्रीडा और आमोद-प्रमोदका; अभिध्यायन्=बार-बार चिन्तन करता हुआ; अतिदीर्घं=बहुत कालतक; जीविते=जीवित रहनेमें; रमेत=प्रेम करेगा ? ॥ २८ ॥
व्याख्या—हे यमराज! आप ही बताइये—भला, आप-सरीखे अजर-अमर महात्मा देवताओंका दुर्लभ एवं अमोघ सङ्ग प्राप्त करके मृत्युलोकका जरा-मरणशील ऐसा कौन बुद्धिमान् मनुष्य होगा जो स्त्रियोंके सौन्दर्य, क्रीडा और आमोद-प्रमोदमें आसक्त होकर उनकी ओर दृष्टिपात करेगा और इस लोकमें दीर्घकालतक जीवित रहनेमें आनन्द मानेगा ? ॥ २८ ॥
यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति मृत्यो
यत्साम्पराये महति ब्रूहि नस्तत् ।
योऽयं वरो गूढमनुप्रविष्टो
नान्यं तस्मान्नचिकेता वृणीते ॥ २९ ॥
मृत्यो=हे यमराज; यस्मिन्=जिस; महति साम्पराये=महान् आश्चर्यमय परलोकसम्बन्धी आत्मज्ञानके विषयमें; इदम् विचिकित्सन्ति=(लोग) यह शङ्का करते हैं कि यह आत्मा मरनेके बाद रहता है या नहीं; (तत्र) यत्=उसमें जो निर्णय है; तत् नः ब्रूहि=वह आप हमें बतलाइये; यः अयम्=जो यह; गूढम् अनुप्रविष्टः वरः=अत्यन्त गम्भीरताको प्राप्त हुआ वर है; तस्मात्=इससे; अन्यम्=दूसरा वर; नचिकेताः=नचिकेता; न वृणीते=नहीं माँगाता ॥ २९ ॥