भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय १ ]

ही क्या है। अतएव मैं यह सब नहीं चाहता। ये आपके रथ, हाथी, घोड़े, ये रमणियों और इनके नाच-गान आप अपने ही पास रखें ॥ २६ ॥

न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो लप्स्यामहे वित्तमद्राक्षम् चेतु त्वा। जीविष्यामो यावदीशिष्यसि त्वं वरस्तु मे वरणीयः स एव ॥ २७ ॥

मनुष्यः=मनुष्य; वित्तेन=धनसे; तर्पणीयः न=कभी भी तूस नहीं किया जा सकता है; चेतु=जब कि (हमने); त्वा अद्राक्षम्=आपके दर्शन पा लिये हैं (तब); वित्तम्=धनको; लप्स्यामहे=(तो हम) पा ही लेंगे; (और) त्वम् यावत्=आप जबतक; ईशिष्यसि=शासन करते रहेंगे (तबतक तो); जीविष्यामः=हम जीते ही रहेंगे (इन सबको भी क्या माँगना है अतः); मे वरणीयः वरः तु=मेरे माँगनेलायक वर तो; सः एव=वह (आत्मज्ञान) ही है ॥ २७ ॥

व्याख्या—आप जानते ही हैं, धनसे मनुष्य कभी तूस नहीं हो सकता। आगमें घी-ईंधन डालनेसे जैसे आग जोरोंसे भड़कती है, उसी प्रकार धन और भोगोंकी प्राप्तिसे भोग-कामनाका और भी विस्तार होता है। वहाँ तुसि कैसी। वहाँ तो दिन-रात अपूर्णता और अभावकी अग्रिमें ही जलना पड़ता है। ऐसे दुःखमय धन और भोगोंको कोई भी बुद्धिमान् पुरुष नहीं माँग सकता। मुझे अपने जीवननिर्वाहके लिये जितने धनकी आवश्यकता होगी, उतना तो आपके दर्शनसे अपने-आप प्राप्त हो जायगा। रही दीर्घ जीवनकी बात, सो जबतक मृत्युके पदपर आपका शासन है, तबतक मुझे मरनेका भी भय क्यों होने लगा। अतएव किसी भी दृष्टिसे दूसरा वर माँगना उचित नहीं मालूम होता। इसलिये मेरा प्रार्थनीय तो वह आत्मतत्त्वविषयक वर ही है। मैं उसे लौटा नहीं सकता ॥ २७ ॥

सम्बन्ध—इस प्रकार भोगोंकी तुच्छताका वर्णन करके अब नचिकेता अपने वरका महत्त्व बतलाता हुआ उसीको प्रदान करनेके लिये दृढ़तापूर्वक निवेदन करता है—