ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 103, कुल 548 में से
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कठोपनिषद्
१०१
नचिकेतः=हे नचिकेता! (उन्हीं मनुष्योंमें); सः त्वम्=तुम (ऐसे निःस्पृह हो कि); प्रियान् च=प्रिय लगनेवाले और; प्रियरूपान्=अत्यन्त सुन्दर रूपवाले; कामान्=इस लोक और परलोकके समस्त भोगोंको; अभिध्यायन्=भलीभाँति सोच-समझकर; अत्यन्तस्वाक्षीः=(तुमने) छोड़ दिया; एताम् वित्तमयीम् सुद्वाम्= इस सम्पत्तिरूप शृङ्खला (बेड़ी) को; न अवाप्तः=(तुम) नहीं प्राप्त हुए (इसके बन्धनमें नहीं फँसे); यस्याम्=जिसमें; बहवः मनुष्याः=बहुत-से मनुष्य; मज्जन्ति=फँस जाते हैं ॥ ३ ॥
व्याख्या—यमराज कहते हैं—‘हे नचिकेता! तुम्हारी परीक्षा करके मैंने अच्छी तरह देख लिया कि तुम बड़े बुद्धिमान्, विवेकी तथा वैराग्यसम्पन्न हो। अपनेको बहुत बड़े चतुर, विवेकी और तार्किक माननेवाले लोग भी जिस चमक-दमकवाली सम्पत्तिके मोहजालमें फँस जाया करते हैं, उसे भी तुमने स्वीकार नहीं किया। मैंने बड़ी ही लुभावनी भाषामें तुम्हें बार-बार पुत्र, पौत्र, हाथी, घोड़े, गौएँ, धन, सम्पत्ति, भूमि आदि अनेकों दुष्प्राप्य और लोभनीय भोगोंका प्रलोभन दिया; इतना ही नहीं, स्वर्गके दिव्य भोगों और अप्रतिम सुन्दरी स्वर्गीय रमणियोंके चिर-भोगसुखका लालच दिया; परंतु तुमने सहज ही उन सबकी उपेक्षा कर दी। अतः तुम अवश्य ही परमात्मतत्त्वका श्रवण करनेके सर्वोत्तम अधिकारी हो ॥ ३ ॥
दूरमेते विपरीते विपूची अविद्या या च विद्येति ज्ञाता। विद्याभीप्सिनं नचिकेतसं मन्ये न त्वा कामा बहवोऽलोलुपन्त ॥ ४ ॥
या अविद्या=जो कि अविद्या; च विद्या इति ज्ञाता=और विद्या नामसे विख्यात हैं; एते=ये दोनों; दूरम् विपरीते=परस्पर अत्यन्त विपरीत; (और) विपूची=भिन्न-भिन्न फल देनेवाली हैं; नचिकेतसम्=तुम नचिकेताको; विद्याभीप्सिनम्