ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 104, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
मन्ये=मैं विद्याका ही अभिलाषी मानता हूँ (क्योंकि); त्वा बहवः कामाः=तुमको बहुत-से भोग; न अलोल्पन्त=(किसी प्रकार भी) नहीं लुभा सके ॥ ४ ॥
व्याख्या—ये अविद्या और विद्या नामसे प्रसिद्ध दो साधन पृथक्-पृथक् फल देनेवाले हैं और परस्पर अत्यन्त विरुद्ध हैं। जिसकी भोगोंमें आसक्ति है, वह कल्याण-साधनमें आगे नहीं बढ़ सकता और जो कल्याणमार्गका पथिक है, वह भोगोंकी ओर दृष्टि नहीं डालता। वह सब प्रकारके भोगोंको दुःखरूप मानकर उनका परित्याग कर देता है। हे नचिकेता! मैं मानता हूँ कि तुम विद्याके ही अभिलाषी हो, क्योंकि बहुत-से बड़े-बड़े भोग भी तुम्हारे मनमें किञ्चिन्मात्र भी लोभ नहीं उत्पन्न कर सके ॥ ४ ॥
अविद्यायामन्तरे
वर्तमानाः
स्वयं
धीराः
पण्डितमन्यमानाः।
दन्द्रम्यमाणाः
परियन्ति
मूढा
अन्धेनैव
नीयमाना
यथान्धाः * ॥ ५ ॥
अविद्यायाम् अन्तरे वर्तमानाः=अविद्याके भीतर रहते हुए (भी); स्वयं धीराः=अपने-आपको बुद्धिमान् (और); पण्डितम् मन्यमानाः=विद्वान् माननेवाले; मूढाः=(भोगकी इच्छा करनेवाले) वे मूर्खलोग; दन्द्रम्यमाणाः= नाना योनियोंमें चारों ओर भटकते हुए; (तथा) परियन्ति=ठीक वैसे ही ठोकरें खाते रहते हैं; यथा=जैसे; अन्धेन एव नीयमानाः=अन्धे मनुष्यके द्वारा चलाये जानेवाले; अन्धाः=अन्धे (अपने लक्ष्यतक न पहुँचकर इधर-उधर भटकते और कष्ट भोगते हैं) ॥ ५ ॥
व्याख्या—जब अन्धे मनुष्यको मार्ग दिखलानेवाला भी अन्धा ही मिल जाता है, तब जैसे वह अपने अभीष्ट स्थानपर नहीं पहुँच पाता, बीचमें ही ठोकरें खाता भटकता है और कॉट-कंकड़ोंसे बिंधकर या गहरे गड़ढे आदिमें
*यह मन्त्र मुण्डकोपनिषद्में भी आया है। (मु० ३० १।२।८)