भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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बल्ली २ ]

कठोपनिषद्

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गिरकर अथवा किसी चट्टान, दीवाल और पशु आदिसे टकराकर नाना प्रकारके कष्ट भोगता है, वैसे ही उन मूर्खोंको भी पशु, पक्षी, कीट, पतंग आदि विविध दुःखपूर्ण योनियोंमें एवं नरकादिमें प्रवेश करके अनन्त जन्मोंतक अनन्त यन्त्रणाओंका भोग करना पड़ता है, जो अपने-आपको ही बुद्धिमान् और विद्वान् समझते हैं, विद्या-बुद्धिके मिथ्याभिमानमें शास्त्र और महापुरुषोंके वचनोंकी कुछ भी परवा न करके उनकी अवहेलना करते हैं और प्रत्यक्ष सुखरूप प्रतीत होनेवाले भोगोंका भोग करनेमें तथा उनके उपाजनोंमें ही निरन्तर संलग्न रहकर मनुष्य-जीवनका अमूल्य समय व्यर्थ नष्ट करते रहते हैं ॥५॥

न साम्प्ररायः प्रतिभाति बालं

प्रमाद्यन्तं वित्तमोहेन मूढम् ।

अयं लोको नास्ति पर इति मानी

पुनः पुनर्वशमापद्यते मे ॥६॥

वित्तमोहेन मूढम्=इस प्रकार सम्पत्तिके मोहसे मोहित; प्रमाद्यन्तम् बालम्=निरन्तर प्रमाद करनेवाले अज्ञानीको; साम्प्ररायः=परलोक; न प्रतिभाति=नहीं सूझता; अयम् लोकः=(वह समझता है) कि यह प्रत्यक्ष दीखनेवाला लोक ही सत्य है; परः न अस्ति=इसके सिवा दूसरा (स्वर्ग-नरक आदि लोक) कुछ भी नहीं है; इति मानी=इस प्रकार माननेवाला अभिमानी मनुष्य; पुनः पुनः=बार-बार; मे वशम्=मेरे (यमराजके) वशमें; आपद्यते=आता है ॥६॥

व्याख्या—इस प्रकार मनुष्य-जीवनके महत्त्वको नहीं समझनेवाला अभिमानी मनुष्य सांसारिक भोग-सम्पत्तिकी प्राप्तिके साधनरूप धनादिके मोहसे मोहित हुआ रहता है; अतएव भोगोंमें आसक्त होकर वह प्रमादपूर्वक मनमाना आचरण करने लगता है। उसे परलोक नहीं सूझता। उसके अन्तःकरणमें इस प्रकारके विचार उत्पन्न ही नहीं होते कि मरनेके बाद मुझे अपने समस्त