भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय १ ]

कर्मोंका फल भोगनेके लिये बाध्य होकर बारम्बार विविध योनियोंमें जन्म लेना पड़ेगा। वह मूर्ख समझता है कि बस, जो कुछ यहाँ प्रत्यक्ष दिखायी देता है, यही लोक है। इसीकी सत्ता है। यहाँ जितना विषय-सुख भोग लिया जाय, उतनी ही बुद्धिमानी है। इसके आगे क्या है। परलोकको किसने देखा है। परलोक तो लोगोंकी कल्पनामात्र है इत्यादि। इस प्रकारकी मान्यता रखनेवाला मनुष्य बारम्बार यमराजके चंगुलमें पड़ता है और वे उसके कर्मानुसार उसे नाना योनियोंमें ढकेलते रहते हैं। उसके जन्म-मरणका चक्र नहीं छूटता ॥ ६ ॥

सम्बन्ध— इस प्रकार विषयासक्त, प्रत्यक्षवादी मूर्खोंकी निन्दा करके अब उस आत्मतत्त्वकी और उसको जानने, समझने तथा वर्णन करनेवाले पुरुषोंकी दुर्लभताका वर्णन करते हैं—

श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः

शृण्वन्तोऽपि बहवो यं न विद्युः।

आश्रयौ वक्ता कुशलोऽस्य लब्धा-

ऽऽश्रयौ ज्ञाता कुशलानुशिष्टः ॥ ७ ॥

यः बहुभिः =जो (आत्मतत्त्व) बहतोंको तो; श्रवणाय अपि =सुननेके लिये भी; न लभ्यः =नहीं मिलता; यम् =जिसको; बहवः =बहुत-से लोग; शृण्वन्तः =अपि-सुनकर भी; न विद्युः =नहीं समझ सकते; अस्य =ऐसे इस गूढ़ आत्मतत्त्वका; वक्ता आश्रयः =वर्णन करनेवाला महापुरुष आश्रयमय है (बड़ा दुर्लभ है); लब्धा कुशलः =उसे प्राप्त करनेवाला भी बड़ा कुशल (सफल-जीवन) कोई एक ही होता है; कुशलानुशिष्टः =और जिसे तत्त्वकी उपलब्धि हो गयी है, ऐसे ज्ञानी महापुरुषके द्वारा शिक्षा प्राप्त किया हुआ; ज्ञाता =आत्मतत्त्वका ज्ञाता भी; आश्रयः =आश्रयमय है (परम दुर्लभ है) ॥ ७ ॥

व्याख्या— आत्मतत्त्वकी दुर्लभता बतलानेके लिये यमराजने कहा—नचिकेता! आत्मतत्त्व कोई साधारण-सी बात नहीं। जगत्में अधिकांश मनुष्य