भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय १ ]

किये, सब-के-सब कामना और आसक्तिसे रहित होकर केवल कर्तव्य-बुद्धिसे किये। इस निष्कामभावकी ही यह महिमा है कि अनित्य पदार्थोंके द्वारा कर्तव्य-पालनरूप ईश्वर-पूजा करके मैंने नित्य-सुखरूप परमात्माको प्राप्त कर लिया ॥ १० ॥

सम्बन्ध— नचिकेतामें वह निष्कामभाव पूर्णरूपसे है, इसलिये यमराज उसकी प्रशंसा करते हुए कहते हैं—

कामस्यासिंजगतःप्रतिष्ठां
क्रतो रनन्त्यमभयस्यपारम् ।
स्तोममहदुरुगायंप्रतिष्ठां
दृष्ट्वा धृत्या धीरो नचिकेतोऽत्यन्तस्वाक्षीः ॥ ११ ॥

नचिकेतः :-हे नचिकेता!; कामस्य आसिम् -जिसमें सब प्रकारके भोग मिल सकते हैं; जगतः प्रतिष्ठाम् -जो जगत्का आधार; क्रतोः अनन्त्यम् -यज्ञका चिरस्थायी फल; अभयस्य पारम् -निर्भयताकी अवधि (और); स्तोममहत् -स्तुति करनेयोग्य एवं महत्वपूर्ण है (तथा); उरुगायम् -वेदोंमें जिसके गुण नाना प्रकारसे गये गये हैं; प्रतिष्ठाम् -(और) जो दीर्घकालतककी स्थितिसे सम्पन्न है, ऐसे स्वर्गलोकको; दृष्ट्वा धृत्या -देखकर भी तुमने धैर्यपूर्वक; अत्यन्तस्वाक्षीः :-उसका त्याग कर दिया; [अतः=इसलिये;] (मैं समझता हूँ कि) धीरः [असि] -(तुम) बहुत ही बुद्धिमान् हो ॥ ११ ॥

व्याख्या— नचिकेता! तुम सब प्रकारसे श्रेष्ठ बुद्धिसम्पन्न और निष्काम हो। मैंने तुम्हारे सामने वरदानके रूपमें उस स्वर्गलोकको रखा, जो सब प्रकारके भोगोंसे परिपूर्ण, जगत्का आधारस्वरूप, यज्ञादि शुभकर्मोंका अन्तरहित फल, सब प्रकारके दुःख और भयसे रहित, स्तुति करनेयोग्य और अत्यन्त महत्वपूर्ण है। वेदोंने भाँति-भाँतिसे उसकी शोभाके गुणगान किये हैं और वह दीर्घकालतक स्थित रहनेवाला है; तुमने उसके महत्त्वको समझकर भी बड़े धैर्यके साथ उसका परित्याग कर दिया, तुम्हारा मन तनिक भी उसमें आसक्त नहीं हुआ,