ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 109, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंवल्ली २ ] कठोपनिषद् १०७
है, जब भगवत्कृपासे किसी महापुरुषका सङ्ग प्राप्त होता है और उनके द्वारा लगातार परमात्माके महत्त्वका विशद विवेचन सुननेका सौभाग्य मिलता है। ऐसी निष्ठा ही मनुष्यको आत्मज्ञानके लिये प्रयत्न करनेमें प्रवृत्त करती है। इतना प्रलोभन दिये जानेपर भी तुम अपनी निष्ठापर दृढ़ रहे, इससे यह सिद्ध है कि वस्तुतः तुम सच्ची धारणासे सम्पन्न हो। नचिकेता ! हमें तुम-जैसे ही पूछनेवाले जिज्ञासु मिला करें ॥ ९ ॥
**सम्बन्ध—**अब यमराज अपने उदाहरणसे निष्कामभावकी प्रशंसा करते हुए कहते हैं—
जानाम्यहꣳ शेवधिरित्यनित्यं
न ह्यध्रुवैः प्राप्यते हि ध्रुवं तत्।
ततो मया नाचिकेतश्चितोऽग्नि -
रनित्यैर्द्रव्यैः प्राप्तवानस्मि नित्यम् ॥ १० ॥
**अहम् जानामि=**मैं जानता हूँ कि; **शेवधिः=**कर्मफलरूप निधि; **अनित्यम् इति=**अनित्य है; **हि अध्रुवैः=**क्योंकि अनित्य (विनाशशील) वस्तुओंसे; **तत् ध्रुवम्=**वह नित्य पदार्थ (परमात्मा); **न हि प्राप्यते=**नहीं मिल सकता; **ततः=**इसलिये; **मया=**मेरे द्वारा (कर्तव्यबुद्धिसे); **अनित्यैः द्रव्यैः=**अनित्य पदार्थोंके द्वारा; **नाचिकेतः=**नाचिकेत नामक; **अग्निः चितः=**अग्निका चयन किया गया (अनित्य भोगोंकी प्राप्तिके लिये नहीं, अतः उस निष्कामभावकी अपूर्व शक्तिसे मैं); **नित्यम्=**नित्य वस्तु परमात्माको; **प्राप्तवान् अस्मि=**प्राप्त हो गया हूँ ॥ १० ॥
**व्याख्या—**नचिकेता ! मैं इस बातको भलीभाँति जानता हूँ कि कर्मोंके फलस्वरूप इस लोक और परलोकके भोगसमूहकी जो निधि मिलती है, वह चाहे कितनी ही महान् क्यों न हो, एक दिन उसका विनाश निश्चित है, अतएव वह अनित्य है और यह सिद्ध है कि अनित्य साधनोंसे नित्य पदार्थकी प्राप्ति नहीं हो सकती। इस रहस्यको जानकर ही मैंने नाचिकेत अग्निके चयनादिरूपसे जो कुछ यज्ञादि कर्तव्यकर्म अनित्य वस्तुओंके द्वारा