ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 108, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
न अस्ति=इस विषयमें मनुष्यका प्रवेश नहीं होता; हि अणुप्रमाणात्= क्योंकि यह अत्यन्त सूक्ष्म वस्तुसे भी; अणीयान्=अधिक सूक्ष्म है; अतर्क्यम्=(इसलिये) तर्कसे अतीत है ॥८॥
व्याख्या —प्रकृतिपर्यन्त जो भी सूक्ष्मात्सूक्ष्म तत्त्व है, यह आत्मतत्त्व उससे भी सूक्ष्म है। यह इतना गहन है कि जबतक इसे यथार्थरूपसे समझानेवाले कोई महापुरुष नहीं मिलते, तबतक मनुष्यका इसमें प्रवेश पाना अत्यन्त ही कठिन है। अल्पज्ञ—साधारण ज्ञानवाले मनुष्य यदि इसे बतलाते हैं और उसके अनुसार यदि कोई विविध प्रकारसे इसके चिन्तनका अभ्यास करता है, तो उसका आत्मज्ञानरूपी फल नहीं होता, आत्मतत्त्व तनिक-सा भी समझमें नहीं आता। दूसरेसे सुने बिना केवल अपने-आप तर्क-वितर्कयुक्त विचार करनेसे भी यह आत्मतत्त्व समझमें नहीं आ सकता। अतः सुनना आवश्यक है; पर सुनना उनसे है, जो इसे भलीभाँति जाननेवाले महापुरुष हों। तभी तर्कसे सर्वथा अतीत इस गहन विषयकी जानकारी हो सकती है ॥८॥
नैषा | तर्केण | मतिरापनेया | ---|---|---|--- | प्रोक्तान्येनैव | सुज्ञानाय | प्रेष्ठ। यां | त्वमापः | सत्यधूर्तिर्बतासि | | त्वादृक् नो | भूयान्नचिकेतः | प्रष्ठा ॥ ९ ॥
प्रेष्ठ=हे प्रियतम!; याम् त्वम् आपः=जिसको तुमने पाया है; एषा मतिः=यह बुद्धि; तर्केण न आपनेया=तर्कसे नहीं मिल सकती (यह तो); अन्येन प्रोक्ता एव=दूसरेके द्वारा कही हुई ही; सुज्ञानाय=आत्मज्ञानमें निमित्त; [भवति=होती है;] बत=सचमुच ही (तुम); सत्यधूर्तिः=उत्तम धैर्यवाले; असि=हो; नचिकेतः=हे नचिकेता! (हम चाहते हैं कि); त्वादृक्=तुम्हारे-जैसे ही; प्रष्ठा=पूछनेवाले; नः भूयात्=हमें मिला करें ॥९॥
व्याख्या —नचिकेताकी प्रशंसा करते हुए यमराज फिर कहते हैं कि हे प्रियतम! तुम्हारी इस पवित्र मति—निर्मल निष्ठाको देखकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है। ऐसी निष्ठा तर्कसे कभी नहीं मिल सकती। यह तो तभी उत्पन्न होती