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ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय १ ]

न अस्ति=इस विषयमें मनुष्यका प्रवेश नहीं होता; हि अणुप्रमाणात्= क्योंकि यह अत्यन्त सूक्ष्म वस्तुसे भी; अणीयान्=अधिक सूक्ष्म है; अतर्क्यम्=(इसलिये) तर्कसे अतीत है ॥८॥

व्याख्या —प्रकृतिपर्यन्त जो भी सूक्ष्मात्सूक्ष्म तत्त्व है, यह आत्मतत्त्व उससे भी सूक्ष्म है। यह इतना गहन है कि जबतक इसे यथार्थरूपसे समझानेवाले कोई महापुरुष नहीं मिलते, तबतक मनुष्यका इसमें प्रवेश पाना अत्यन्त ही कठिन है। अल्पज्ञ—साधारण ज्ञानवाले मनुष्य यदि इसे बतलाते हैं और उसके अनुसार यदि कोई विविध प्रकारसे इसके चिन्तनका अभ्यास करता है, तो उसका आत्मज्ञानरूपी फल नहीं होता, आत्मतत्त्व तनिक-सा भी समझमें नहीं आता। दूसरेसे सुने बिना केवल अपने-आप तर्क-वितर्कयुक्त विचार करनेसे भी यह आत्मतत्त्व समझमें नहीं आ सकता। अतः सुनना आवश्यक है; पर सुनना उनसे है, जो इसे भलीभाँति जाननेवाले महापुरुष हों। तभी तर्कसे सर्वथा अतीत इस गहन विषयकी जानकारी हो सकती है ॥८॥

नैषा | तर्केण | मतिरापनेया | ---|---|---|--- | प्रोक्तान्येनैव | सुज्ञानाय | प्रेष्ठ। यां | त्वमापः | सत्यधूर्तिर्बतासि | | त्वादृक् नो | भूयान्नचिकेतः | प्रष्ठा ॥ ९ ॥

प्रेष्ठ=हे प्रियतम!; याम् त्वम् आपः=जिसको तुमने पाया है; एषा मतिः=यह बुद्धि; तर्केण न आपनेया=तर्कसे नहीं मिल सकती (यह तो); अन्येन प्रोक्ता एव=दूसरेके द्वारा कही हुई ही; सुज्ञानाय=आत्मज्ञानमें निमित्त; [भवति=होती है;] बत=सचमुच ही (तुम); सत्यधूर्तिः=उत्तम धैर्यवाले; असि=हो; नचिकेतः=हे नचिकेता! (हम चाहते हैं कि); त्वादृक्=तुम्हारे-जैसे ही; प्रष्ठा=पूछनेवाले; नः भूयात्=हमें मिला करें ॥९॥

व्याख्या —नचिकेताकी प्रशंसा करते हुए यमराज फिर कहते हैं कि हे प्रियतम! तुम्हारी इस पवित्र मति—निर्मल निष्ठाको देखकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है। ऐसी निष्ठा तर्कसे कभी नहीं मिल सकती। यह तो तभी उत्पन्न होती

वल्ली २ ] कठोपनिषद् १०७


है, जब भगवत्कृपासे किसी महापुरुषका सङ्ग प्राप्त होता है और उनके द्वारा लगातार परमात्माके महत्त्वका विशद विवेचन सुननेका सौभाग्य मिलता है। ऐसी निष्ठा ही मनुष्यको आत्मज्ञानके लिये प्रयत्न करनेमें प्रवृत्त करती है। इतना प्रलोभन दिये जानेपर भी तुम अपनी निष्ठापर दृढ़ रहे, इससे यह सिद्ध है कि वस्तुतः तुम सच्ची धारणासे सम्पन्न हो। नचिकेता ! हमें तुम-जैसे ही पूछनेवाले जिज्ञासु मिला करें ॥ ९ ॥

**सम्बन्ध—**अब यमराज अपने उदाहरणसे निष्कामभावकी प्रशंसा करते हुए कहते हैं—

जानाम्यहꣳ शेवधिरित्यनित्यं
न ह्यध्रुवैः प्राप्यते हि ध्रुवं तत्।
ततो मया नाचिकेतश्चितोऽग्नि -
रनित्यैर्द्रव्यैः प्राप्तवानस्मि नित्यम् ॥ १० ॥

**अहम् जानामि=**मैं जानता हूँ कि; **शेवधिः=**कर्मफलरूप निधि; **अनित्यम् इति=**अनित्य है; **हि अध्रुवैः=**क्योंकि अनित्य (विनाशशील) वस्तुओंसे; **तत् ध्रुवम्=**वह नित्य पदार्थ (परमात्मा); **न हि प्राप्यते=**नहीं मिल सकता; **ततः=**इसलिये; **मया=**मेरे द्वारा (कर्तव्यबुद्धिसे); **अनित्यैः द्रव्यैः=**अनित्य पदार्थोंके द्वारा; **नाचिकेतः=**नाचिकेत नामक; **अग्निः चितः=**अग्निका चयन किया गया (अनित्य भोगोंकी प्राप्तिके लिये नहीं, अतः उस निष्कामभावकी अपूर्व शक्तिसे मैं); **नित्यम्=**नित्य वस्तु परमात्माको; **प्राप्तवान् अस्मि=**प्राप्त हो गया हूँ ॥ १० ॥

**व्याख्या—**नचिकेता ! मैं इस बातको भलीभाँति जानता हूँ कि कर्मोंके फलस्वरूप इस लोक और परलोकके भोगसमूहकी जो निधि मिलती है, वह चाहे कितनी ही महान् क्यों न हो, एक दिन उसका विनाश निश्चित है, अतएव वह अनित्य है और यह सिद्ध है कि अनित्य साधनोंसे नित्य पदार्थकी प्राप्ति नहीं हो सकती। इस रहस्यको जानकर ही मैंने नाचिकेत अग्निके चयनादिरूपसे जो कुछ यज्ञादि कर्तव्यकर्म अनित्य वस्तुओंके द्वारा

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय १ ]

किये, सब-के-सब कामना और आसक्तिसे रहित होकर केवल कर्तव्य-बुद्धिसे किये। इस निष्कामभावकी ही यह महिमा है कि अनित्य पदार्थोंके द्वारा कर्तव्य-पालनरूप ईश्वर-पूजा करके मैंने नित्य-सुखरूप परमात्माको प्राप्त कर लिया ॥ १० ॥

सम्बन्ध— नचिकेतामें वह निष्कामभाव पूर्णरूपसे है, इसलिये यमराज उसकी प्रशंसा करते हुए कहते हैं—

कामस्यासिंजगतःप्रतिष्ठां
क्रतो रनन्त्यमभयस्यपारम् ।
स्तोममहदुरुगायंप्रतिष्ठां
दृष्ट्वा धृत्या धीरो नचिकेतोऽत्यन्तस्वाक्षीः ॥ ११ ॥

नचिकेतः :-हे नचिकेता!; कामस्य आसिम् -जिसमें सब प्रकारके भोग मिल सकते हैं; जगतः प्रतिष्ठाम् -जो जगत्का आधार; क्रतोः अनन्त्यम् -यज्ञका चिरस्थायी फल; अभयस्य पारम् -निर्भयताकी अवधि (और); स्तोममहत् -स्तुति करनेयोग्य एवं महत्वपूर्ण है (तथा); उरुगायम् -वेदोंमें जिसके गुण नाना प्रकारसे गये गये हैं; प्रतिष्ठाम् -(और) जो दीर्घकालतककी स्थितिसे सम्पन्न है, ऐसे स्वर्गलोकको; दृष्ट्वा धृत्या -देखकर भी तुमने धैर्यपूर्वक; अत्यन्तस्वाक्षीः :-उसका त्याग कर दिया; [अतः=इसलिये;] (मैं समझता हूँ कि) धीरः [असि] -(तुम) बहुत ही बुद्धिमान् हो ॥ ११ ॥

व्याख्या— नचिकेता! तुम सब प्रकारसे श्रेष्ठ बुद्धिसम्पन्न और निष्काम हो। मैंने तुम्हारे सामने वरदानके रूपमें उस स्वर्गलोकको रखा, जो सब प्रकारके भोगोंसे परिपूर्ण, जगत्का आधारस्वरूप, यज्ञादि शुभकर्मोंका अन्तरहित फल, सब प्रकारके दुःख और भयसे रहित, स्तुति करनेयोग्य और अत्यन्त महत्वपूर्ण है। वेदोंने भाँति-भाँतिसे उसकी शोभाके गुणगान किये हैं और वह दीर्घकालतक स्थित रहनेवाला है; तुमने उसके महत्त्वको समझकर भी बड़े धैर्यके साथ उसका परित्याग कर दिया, तुम्हारा मन तनिक भी उसमें आसक्त नहीं हुआ,

वल्ल्बी २ ]

कठोपनिषद्

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तुम अपने निश्चयपर दृढ़ और अटल रहे—यह साधारण बात नहीं है। इसलिये मैं यह मानता हूँ कि तुम बड़े ही बुद्धिमान्, अनासक्त और आत्मतत्त्वको जाननेके अधिकारी हो ॥ ११ ॥

सम्बन्ध —इस प्रकार नचिकेताके निष्कामभावको देखकर यमराजने निश्चय कर लिया कि यह परमात्माके तत्त्वज्ञानका यथार्थ अधिकारी है; अतः उसके अन्तःकरणमें परब्रह्म पुरुषोत्तमके तत्त्वकी जिज्ञासा उत्पन्न करनेके लिये यमराज अब दो मन्त्रोंमें परब्रह्म परमात्माकी महिमाका वर्णन करते हैं—

तं दुर्दर्शं गृह्मनुप्रविष्टं गृहाहितं गृह्नेष्टं पुराणम् । अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति ॥ १२ ॥

गृह्म=जो योगमायाके पदमें छिपा हुआ; अनुप्रविष्ट=सर्वव्यापी; गृहाहितम्=सबके हृदयरूप गुफामें स्थित (अतएव); गृह्नेष्टम्=संसाररूप गहन वनमें रहनेवाला; पुराणम्=सनातन है, ऐसे; तम् दुर्दर्शम् देवम्=उस कठिनतासे देखे जानेवाले परमात्मदेवको; धीरः=शुद्ध बुद्धियुक्त साधक; अध्यात्मयोगाधिगमेन=अध्यात्मयोगकी प्राप्तिके द्वारा; मत्वा=समझकर; हर्षशोकौ जहाति=हर्ष और शोकको त्याग देता है ॥ १२ ॥

व्याख्या —यह सम्पूर्ण जगत् एक अत्यन्त दुर्गम गहन वनके सदृश है, परंतु यह परब्रह्म परमेश्वरसे परिपूर्ण है, वह सर्वव्यापी इसमें सर्वत्र प्रविष्ट है (गीता ९।४)। वह सबके हृदयरूपी गुफामें स्थित है (गीता १३।१७; १५।१५; १८।६१)। इस प्रकार नित्य साथ रहनेपर भी लोग उसे सहजमें देख नहीं पाते; क्योंकि वह अपनी योगमायाके पदमें छिपा है (गीता ७।२५), इसलिये अत्यन्त गुप्त है। उसके दर्शन बहुत ही दुर्लभ हैं। जो शुद्ध-बुद्धिसम्पन्न साधक अपने मन-बुद्धिको नित्य-निरन्तर उसके चिन्तनमें संलग्न रखता है, वह उस सनातन देवको प्राप्त करके सदाके लिये हर्ष-शोकसे

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय १ ]

रहित हो जाता है। उसके अन्तःकरणमेंसे हर्ष-शोकादि विकार समूल नष्ट हो जाते हैं*॥ १२॥

एतच्छ्रुत्वा सम्परिगृह्य मर्त्यः प्रवृह्य धर्म्यमणुमेतमाप्य । स मोदते मोदनीयः हि लब्ध्वा विवृतः सच्च नचिकेतसं मन्ये॥ १३॥

मर्त्यः=मनुष्य (जब); एतत्=इस; धर्म्यम्=धर्ममय (उपदेश)-को; श्रुत्वा=सुनकर; सम्परिगृह्य=भलीभाँति ग्रहण करके; प्रवृह्य=(और) उसपर विवेकपूर्वक विचार करके; एतम्=इस; अणुम्=सूक्ष्म आत्मतत्त्वको; आप्य=जानकर (अनुभव कर लेता है, तब); सः=वह; मोदनीयम्=आनन्दस्वरूप परब्रह्म पुरुषोत्तमको; लब्ध्वा=पाकर; मोदते हि=आनन्दमें ही मग्न हो जाता है; नचिकेतसम्=तुम नचिकेताके लिये; विवृतम् सच्च मन्ये=(मैं) परमधामका द्वार खुला हुआ मानता हूँ॥ १३॥

व्याख्या—इस अध्यात्म-विषयक धर्ममय उपदेशको पहले तो अनुभवी महापुरुषके द्वारा अतिशय श्रद्धापूर्वक सुना चाहिये, सुनकर उसका मनन करना चाहिये। तदनन्तर एकान्तमें उसपर विचार करके बुद्धिमें उसको स्थिर करना चाहिये। इस प्रकार साधन करनेपर जब मनुष्यको आत्मस्वरूपकी प्राप्ति हो जाती है अर्थात् जब वह आत्माको तत्त्वसे समझ लेता है, तब आनन्दस्वरूप परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाता है। उस आनन्दके महान् समुद्रको पाकर वह उसमें निमग्न हो जाता है। हे नचिकेता! तुम्हारे लिये उस परमधामका द्वार खुला हुआ है। तुमको वहाँ जानेसे कोई रोक नहीं सकता। तुम ब्रह्मप्राप्तिके उत्तम अधिकारी हो, ऐसा मैं मानता हूँ॥ १३॥

  • प्रातःस्मरणीय भाष्यकार श्रीशङ्कराचार्यजीने भी ब्रह्मसूत्रके भाष्यमें इस प्रकरणको परमात्मविषयक माना है ('प्रकरणं चेद परमात्मनः'—देखिये ब्रह्मसूत्र अध्याय १ पा० २ के १२ वें सूत्रका भाष्य)।

वल्ली २ ] कठोपनिषद् १११

सम्बन्ध— यमराजके मुखसे परब्रह्म पुरुषोत्तमकी महिमा सुनकर और अपनेको उसका अधिकारी जानकर नचिकेताके मनमें परमात्मतत्त्वकी जिज्ञासा उत्पन्न हो गयी। साथ ही उसे यमराजके द्वारा अपनी प्रशंसा सुनकर साधु-सम्मत संकोच भी हुआ। इसलिये उसने यमराजसे बीचमें ही पूछा—

अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात्कृताकृतात्।
अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत्पश्यसि तद्वद॥ १४॥

यत् तत्= जिस उस परमेश्वरको; धर्मात् अन्यत्र= धर्मसे अतीत; अधर्मात् अन्यत्र= अधर्मसे भी अतीत; च= तथा; अस्मात् कृताकृतात्= इस कार्य और कारणरूप सम्पूर्ण जगत्से भी; अन्यत्र= भिन्न; च= और; भूतात् भव्यात्= भूत, वर्तमान एवं भविष्यत्—तीनों कालोंसे तथा इनसे सम्बन्धित पदार्थोंसे भी; अन्यत्र= पृथक्; पश्यसि= (आप) जानते हैं; तत्= उसे; वद= बतलाइये॥ १४॥

व्याख्या— नचिकेता कहता है—भगवन्! आप यदि मुझपर प्रसन्न हैं तो धर्म और अधर्मके सम्बन्धसे रहित, कार्य-कारणरूप प्रकृतिसे पृथक् एवं भूत, वर्तमान और भविष्यत्—इन सबसे भिन्न जिस परमात्मतत्त्वको आप जानते हैं, उसे मुझको बतलाइये* ॥१४॥

सम्बन्ध— नचिकेताके इस प्रकार पूछनेपर यमराज उस ब्रह्मतत्त्वके वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा करते हुए उपदेश आरम्भ करते हैं—

सर्वे वेदा यत् पदमामनन्ति
तपाꣳसि सर्वाणि च यद् वदन्ति।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति
तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत्॥ १५॥

सर्वे वेदाः= सम्पूर्ण वेद; यत् पदम्= जिस परम पदका; आमनन्ति= बारम्बार


* भाष्यकार श्रीशङ्कराचार्यजीने इस प्रकरणको भी अपने ब्रह्मसूत्रभाष्यमें परमेश्वरविषयक ही माना है (‘पृष्टं चेह ब्रह्म’—देखिये ब्रह्मसूत्र अध्याय १ पा० ३ के २४ वें सूत्रका भाष्य)।

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय १ ]

प्रतिपादन करते हैं; च=और; सर्वाणि तपांसि=सम्पूर्ण तप; यत्=जिस पदका; वदन्ति=लक्ष्य कराते हैं अर्थात् वे जिसके साधन हैं; यत् इच्छन्तः=जिसको चाहनेवाले साधकगण; ब्रह्मचर्यम्=ब्रह्मचर्यका; चरन्ति=पालन करते हैं; तत् पदम्=वह पद; ते=तुम्हें; (मैं) संग्रहेण=संक्षेपसे; ब्रवीमि=बतलाता हूँ; (वह है) ओम्=ओम्; इति=ऐसा; एतत्=यह (एक अक्षर) ॥ १५ ॥

व्याख्या —यमराज यहाँ परब्रह्म पुरुषोत्तमको परमप्राप्य बतलाकर उसके वाचक अँकारको प्रतीकरूपसे उसका स्वरूप बतलाते हैं। वे कहते हैं कि समस्त वेद नाना प्रकार और नाना छन्दोंसे जिसका प्रतिपादन करते हैं, सम्पूर्ण तप आदि साधनोंका जो एकमात्र परम और चरम लक्ष्य है तथा जिसको प्राप्त करनेकी इच्छासे साधक निष्ठापूर्वक ब्रह्मचर्यका अनुष्ठान किया करते हैं, उस पुरुषोत्तमभगवान्का परमतत्त्व मैं तुम्हें संक्षेपमें बतलाता हूँ। वह है 'अँ' यह एक अक्षर ॥ १५ ॥

सम्बन्ध —नामरहित होनेपर भी परमात्मा अनेक नामोंसे पुकारे जाते हैं। उनके सब नामोंमें 'अँ' सर्वश्रेष्ठ माना गया है। अतः यहाँ नाम और नामीका अभेद मानकर 'प्रणव' को परब्रह्म पुरुषोत्तमके स्थानमें वर्णन करते हुए यमराज कहते हैं—

एतद्भ्येवाक्षरं ब्रह्म एतद्भ्येवाक्षरं परम्।

एतद्भ्येवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ॥ १६ ॥

एतत्=यह; अक्षरम् एव हि=अक्षर ही तो; ब्रह्म=ब्रह्म है (और); एतत्=यह; अक्षरम् एव हि=अक्षर ही; परम्=परब्रह्म है; हि=इसलिये; एतत् एव=इसी; अक्षरम्=अक्षरको; ज्ञात्वा=जानकर; यः=जो; यत्=जिसको; इच्छति=चाहता है; तस्य=उसको; तत्=वही (मिल जाता है) ॥ १६ ॥

व्याख्या —यह अविनाशी प्रणव—अँकार ही तो ब्रह्म (परमात्माका स्वरूप) है और यही परब्रह्म परमपुरुष पुरुषोत्तम है अर्थात् उस ब्रह्म और परब्रह्म दोनोंका ही नाम अँकार है; अतः इस तत्त्वको समझकर साधक इसके द्वारा दोनोंमेंसे किसी भी अभीष्ट रूपको प्राप्त कर सकता है ॥ १६ ॥

बल्ली २ ]

कठोपनिषद्

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एतदालम्बनः श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम्। एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ॥ १७ ॥

एतत्=यही; श्रेष्ठम्=अत्युत्तम; आलम्बनम्=आलम्बन है; एतत्=यही (सबका); परम् आलम्बनम्=अन्तिम आश्रय है; एतत्=इस; आलम्बनम्=आलम्बनको; ज्ञात्वा=भलीभाँति जानकर (साधक); ब्रह्मलोके=ब्रह्मलोकमें; महीयते=महिमान्वित होता है ॥ १७ ॥

व्याख्या —यह ॐकार ही परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिके लिये सब प्रकारके आलम्बनोंमेंसे सबसे श्रेष्ठ आलम्बन है और यही चरम आलम्बन है। इससे परे और कोई आलम्बन नहीं है अर्थात् परमात्माके श्रेष्ठ नामकी शरण हो जाना ही उनकी प्राप्तिका सर्वोत्तम एवं अमोघ साधन है। इस रहस्यको समझकर जो साधक श्रद्धा और प्रेमपूर्वक इसपर निर्भर करता है, वह निस्संदेह परमात्माकी प्राप्तिका परम गौरव लाभ करता है ॥ १७ ॥

सम्बन्ध —इस प्रकार ॐकारको ब्रह्म और परब्रह्म—इन दोनोंका प्रतीक बताकर अब नचिकेताके प्रश्नानुसार यमराज पहले आत्माके स्वरूपका वर्णन करते हैं—

न जायते म्रियते वा विपश्चि- न्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित्। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ १८ ॥

विपश्चित्=नित्य ज्ञानस्वरूप आत्मा; न जायते=न तो जन्मता है; वा न म्रियते=और न मरता ही है; अयम् न=यह न तो स्वयं; कुतश्चित्=किसीसे हुआ है; [न=न] (इससे); कश्चित्=कोई भी; बभूव=हुआ है अर्थात् यह न तो किसीका कार्य है और न कारण ही है; अयम्=यह; अजः=अजन्मा; नित्यः=नित्य; शाश्वतः=सदा एकरस रहनेवाला (और); पुराणः=पुरातन है अर्थात्

११४ ईशादि नौ उपनिषद् [ अध्याय १

क्षय और वृद्धिसे रहित है; शरीरे हन्यमाने=शरीरके नाश किये जानेपर भी (इसका); न हन्यते=नाश नहीं किया जा सकता*॥ १८॥

हन्ता चेन्मन्यते हन्तुँ हतश्चेन्मन्यते हतम्।
उभौ तौ न विजानीतो नायँ हन्ति न हन्यते॥ १९॥

चेत्=यदि कोई; हन्ता=मारनेवाला व्यक्ति; हन्तुम्=अपनेको मारनेमें समर्थ; मन्यते=मानता है (और); चेत्=यदि; हतः=(कोई) मारा जानेवाला व्यक्ति; हतम्=अपनेको मारा गया; मन्यते=समझता है (तो); तौ उभौ=वे दोनों ही; न विजानीतः=(आत्मस्वरूपको) नहीं जानते (क्योंकि); अयम्=यह आत्मा; न हन्ति=न तो (किसीको) मारता है (और); न हन्यते=न मारा ही जाता है†॥१९॥

व्याख्या—यमराज यहाँ आत्माके शुद्ध स्वरूपका और उसकी नित्यताका निरूपण करते हैं; क्योंकि जबतक साधकको अपनी नित्यता और निर्विकारताका अनुभव नहीं हो जाता एवं वह जबतक अपनेको शरीर आदि अनित्य वस्तुओंसे भिन्न नहीं समझ लेता, तबतक इन अनित्य पदार्थोंसे वैराग्य होकर उसके अन्तःकरणमें नित्य तत्त्वकी अभिलाषा उत्पन्न नहीं होती। उसको यह दृढ़ अनुभूति होनी चाहिये कि जीवात्मा नित्य चेतन ज्ञानस्वरूप है; अनित्य, विनाशी


* गीतामें इस मन्त्रके भावको इस प्रकार समझाया गया है—
न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
(२।२०)
‘यह आत्मा किसी भी कालमें न तो जन्मता है और न मरता ही है तथा न यह उत्पन्न होकर फिर होनेवाला ही है; क्योंकि यह अजन्मा, नित्य, सनातन और पुरातन है; शरीरके मारे जानेपर भी यह नहीं मारा जाता।’

† गीतामें इस मन्त्रके भावको और भी स्पष्टरूपसे व्यक्त किया गया है—
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते॥
(२।१९)
‘जो इस आत्माको मारनेवाला समझता है तथा जो इसको मारा गया मानता है, वे दोनों ही नहीं जानते; क्योंकि यह आत्मा वास्तवमें न तो किसीको मारता है न किसीके द्वारा मारा जाता है।’

वल्ली २ ] कठोपनिषद् ११५


जड शरीर और भोगोंसे वास्तवमें इसका कोई सम्बन्ध नहीं है। यह अनादि और अनन्त है; न तो इसका कोई कारण है और न कार्य ही; अतः यह जन्म-मरणसे सर्वथा रहित, सदा एकरस, सर्वथा निर्विकार है। शरीरके नाशसे इसका नाश नहीं होता। जो लोग इसको मारनेवाला या मरनेवाला मानते हैं, वे वस्तुतः आत्मस्वरूपको जानते ही नहीं, वे सर्वथा भ्रान्त हैं। उनकी बातोंपर ध्यान नहीं देना चाहिये। वस्तुतः आत्मा न तो किसीको मारता है और न इसे कोई मार ही सकता है।

साधकको शरीर और भोगोंकी अनित्यता और अपने आत्माकी नित्यतापर विचार करके, इन अनित्य भोगोंसे सुखकी आशाका त्याग करके सदा अपने साथ रहनेवाले नित्य सुखस्वरूप परब्रह्म पुरुषोत्तमको प्राप्त करनेका अभिलाषी बनना चाहिये॥ १८-१९॥

सम्बन्ध— इस प्रकार आत्मतत्त्वके वर्णनद्वारा नचिकेताके अन्तःकरणमें परब्रह्म पुरुषोत्तमके तत्त्वकी जिज्ञासा उत्पन्न करके यमराज अब परमात्माके स्वरूपका वर्णन करते हैं—

अणोरणीयान्महतो महीया-
नात्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम्।
तमक्रतुः पश्यति वीतशोको
धातुप्रसादान्महिमानमात्मनः ॥ २०॥*

अस्य = इस; जन्तोः = जीवात्माके; गुहायाम् = हृदयरूप गुफामें; निहितः = रहनेवाला; आत्मा = परमात्मा; अणोः अणीयान् = सूक्ष्मसे अतिसूक्ष्म (और); महतः महीयान् = महान्‌से भी महान् है; आत्मनः तम् महिमानम् = परमात्माकी उस महिमाको; अक्रतुः = कामनारहित (और); वीतशोकः = चिन्तारहित (कोई विरला साधक); धातुप्रसादात् = सर्वाधार परब्रह्म परमेश्वरकी कृपासे ही; पश्यति = देख पाता है॥ २०॥

व्याख्या— इससे पहले जीवात्माके शुद्ध स्वरूपका वर्णन किया गया


* यह मन्त्र श्वेता० उ० (३। २०) में भी है।

११६ ईशादि नौ उपनिषद् [ अध्याय १

है, उसीको इस मन्त्रमें ‘जन्तु’ नाम देकर उसकी बद्धावस्था व्यक्त की गयी है। भाव यह कि यद्यपि परब्रह्म पुरुषोत्तम उस जीवात्माके अत्यन्त समीप जहाँ यह स्वयं रहता है, वहीं हृदयमें छिपे हुए हैं तो भी यह उनकी ओर नहीं देखता। मोहवश भोगोंमें भूला रहता है। इसी कारण यह ‘जन्तु’ है— मनुष्य-शरीर पाकर भी कीट-पतङ्ग आदि तुच्छ प्राणियोंकी भाँति अपना दुर्लभ जीवन व्यर्थ नष्ट कर रहा है। जो साधक पूर्वोक्त विवेचनके अनुसार अपने- आपको नित्य चेतनस्वरूप समझकर सब प्रकारके भोगोंकी कामनासे रहित और शोकरहित हो जाता है, वह परमात्माकी कृपासे यह अनुभव करता है कि परब्रह्म पुरुषोत्तम अणुसे भी अणु और महान्‌से भी महान्—सर्वव्यापी हैं और इस प्रकार उनकी महिमाको समझकर उनका साक्षात्कार कर लेता है। (यहाँ ‘धातुप्रसादात्’ का अर्थ ‘परमेश्वरकी कृपा’ किया गया है। ‘धातु’ शब्दका अर्थ सर्वाधार परमात्मा माना गया है। विष्णुसहस्रनाममें भी ‘अनादिनिधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः’—‘धातु’ को भगवान्‌का एक नाम माना गया है) ॥२०॥

आसीनो दूरं व्रजति शयानो याति सर्वतः। कस्तं मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातुमर्हति ॥ २१ ॥

आसीनः=(वह परमेश्वर) बैठा हुआ ही; **दूरम् व्रजति=**दूर पहुँच जाता है; **शयानः=**सोता हुआ (भी); **सर्वतः याति=**सब ओर चलता रहता है; तम् **मदामदम् देवम्=**उस ऐश्वर्यके मदसे उन्मत्त न होनेवाले देवको; **मदन्यः कः=**मुझसे भिन्न दूसरा कौन; **ज्ञातुम्=**जाननेमें; **अर्हति=**समर्थ है॥२१॥

**व्याख्या—**परब्रह्म परमात्मा अचिन्त्यशक्ति हैं और विरुद्ध धर्मोंके आश्रय हैं। एक ही समयमें उनमें विरुद्ध धर्मोंकी लीला होती है। इसीसे वे एक ही साथ सूक्ष्म-से-सूक्ष्म और महान्-से-महान् बताये गये हैं। यहाँ यह कहते हैं कि वे परमेश्वर अपने नित्य परमधाममें विराजमान रहते हुए ही भक्ताधीनतावश उनकी पुकार सुनते ही दूर-से-दूर चले जाते हैं। परमधाममें निवास करनेवाले पार्षद भक्तोंकी दृष्टिमें वहाँ शयन करते हुए ही वे सब

वल्ली २ ] कठोपनिषद् ११७

ओर चलते रहते हैं। अथवा वे परमात्मा सदा-सर्वदा सर्वत्र स्थित हैं। उनकी सर्वव्यापकता ऐसी है कि बैठे भी वही हैं, दूर देशमें चलते भी वही हैं, सोते भी वही हैं और सब ओर जाते-आते भी वही हैं। वे सर्वत्र सब रूपोंमें नित्य अपनी महिमामें स्थित हैं। इस प्रकार अलौकिक परमैश्वर्यस्वरूप होनेपर भी उन्हें अपने ऐश्वर्यका तनिक भी अभिमान नहीं है। उन परमदेवको जाननेका अधिकारी उनका कृपापात्र मेरे (आत्मतत्त्वज्ञ यमराजके सदृश अधिकारियोंके) सिवा दूसरा कौन हो सकता है॥ २१॥

सम्बन्ध— अब इस प्रकार उन परमेश्वरकी महिमाको समझानेवाले पुरुषकी पहचान बताते हैं—

अशरीरं शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम्। महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति॥ २२॥

अनवस्थेषु=(जो) स्थिर न रहनेवाले (विनाशशील); शरीरेषु=शरीरोंमें; अशरीरम्=शरीररहित (एवं); अवस्थितम्=अविचलभावसे स्थित है; महान्तम्= (उस) महान्; विभुम्=सर्वव्यापी; आत्मानम्=परमात्माको; मत्वा=जानकर; धीरः=बुद्धिमान् महापुरुष; न शोचति=(कभी किसी भी कारणसे) शोक नहीं करता॥ २२॥

व्याख्या— प्राणियोंके शरीर अनित्य और विनाशशील हैं, इनमें प्रतिक्षण परिवर्तन होता रहता है। इन सबमें समभावसे स्थित परब्रह्म पुरुषोत्तम इन शरीरोंसे सर्वथा रहित, अशरीरी है। इसी कारण वे नित्य और अचल हैं। प्राकृत देश-काल-गुणादिसे अपरिच्छिन्न उन महान्, सर्वव्यापी, सबके आत्मरूप परमेश्वरको जान लेनेके बाद वह ज्ञानी महापुरुष कभी किसी भी कारणसे किञ्चिन्मात्र भी शोक नहीं करता। यही उसकी पहचान है॥ २२॥

सम्बन्ध— अब यह बतलाते हैं कि वे परमात्मा अपने पुरुषार्थसे नहीं मिलते, वरं उसीको मिलते हैं, जिसको वे स्वीकार कर लेते हैं—

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।

११८ ईशादि नौ उपनिषद् [ अध्याय १

यमेवैष वृणुते तेन लभ्य- स्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्॥ २३॥*

अयम् आत्मा = यह परब्रह्म परमात्मा; = न तो; प्रवचनेन = प्रवचनसे; न मेधया = न बुद्धिसे (और); न बहुना श्रुतेन = न बहुत सुननेसे ही; लभ्यः = प्राप्त हो सकता है; यम् = जिसको; एषः = यह; वृणुते = स्वीकार कर लेता है; तेन एव लभ्यः = उसके द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है (क्योंकि); एषः आत्मा = यह परमात्मा; तस्य = उसके लिये; स्वाम् तनूम् = अपने यथार्थ स्वरूपको; विवृणुते = प्रकट कर देता है॥ २३॥

**व्याख्या—**जिन परमेश्वरकी महिमाका वर्णन मैं कर रहा हूँ, वे न तो उनको मिलते हैं, जो शास्त्रोंको पढ़-सुनकर लच्छेदार भाषामें परमात्मतत्त्वका नाना प्रकारसे वर्णन करते हैं, न उन तर्कशील बुद्धिमान् मनुष्योंको ही मिलते हैं, जो बुद्धिके अभिमानमें प्रमत्त हुए तर्कके द्वारा विवेचन करके उन्हें समझनेकी चेष्टा करते हैं और न उनको ही मिलते हैं, जो परमात्माके विषयमें बहुत कुछ सुनते रहते हैं। वे तो उसीको प्राप्त होते हैं, जिसको वे स्वयं स्वीकार कर लेते हैं और वे स्वीकार उसीको करते हैं, जिसको उनके लिये उत्कट इच्छा होती है। जो उनके बिना रह नहीं सकता। जो अपनी बुद्धि या साधनापर भरोसा न करके केवल उनकी कृपाकी ही प्रतीक्षा करता रहता है, ऐसे कृपा-निर्भर साधकपर परमात्मा कृपा करते हैं और योगमायाका परदा हटाकर उसके सामने अपना स्वरूप प्रकट कर देते हैं॥ २३॥

**सम्बन्ध—**अब यह बतलाते हैं कि परमात्मा किसको प्राप्त नहीं होते—

नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः। नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात्॥ २४॥

प्रज्ञानेन = सूक्ष्म बुद्धिके द्वारा; अपि = भी; एनम् = इस परमात्माको; न दुश्चरितात् अविरतः आप्नुयात् = न तो वह मनुष्य प्राप्त कर सकता है, जो बुरे


* यह मन्त्र मुण्डकोपनिषद् (३।२।३) में भी इसी प्रकार है।

वल्ली २ ] कठोपनिषद् १११

आचरणोंसे निवृत्त नहीं हुआ है; **न अशान्तः=**न वह प्राप्त कर सकता है, जो अशान्त है; **न असमाहितः=**न वह कि जिसके मन, इन्द्रियाँ संयत नहीं हैं; **वा=**और; **न अशान्तमानसः [ आप्नुयात् ]=**न वही प्राप्त करता है, जिसका मन शान्त नहीं है॥ २४॥

**व्याख्या—**जो मनुष्य बुरे आचरणोंसे विरक्त होकर उनका त्याग नहीं कर देता, जिसका मन परमात्माको छोड़कर दिन-रात सांसारिक भोगोंमें भटकता रहता है, परमात्मापर विश्वास न होनेके कारण जो सदा अशान्त रहता है, जिसका मन, बुद्धि और इन्द्रियाँ वशमें की हुई नहीं हैं, ऐसा मनुष्य सूक्ष्म बुद्धिद्वारा आत्मविचार करते रहनेपर भी परमात्माको नहीं पा सकता, क्योंकि वह परमात्माकी असीम कृपाका आदर नहीं करता, उसकी अवहेलना करता रहता है; अतः वह उनकी कृपाका अधिकारी नहीं होता॥ २४॥

**सम्बन्ध—**उस परब्रह्म परमेश्वरके तत्त्वको सुनकर और बुद्धिद्वारा विचार करके भी मनुष्य उसे क्यों नहीं जान सकता? इस जिज्ञासापर कहते हैं—

यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च उभे भवत ओदनः।
मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः॥ २५॥

यस्य=(संहारकालमें) जिस परमेश्वरके; **ब्रह्म च क्षत्रम् च उभे=**ब्राह्मण और क्षत्रिय—ये दोनों ही अर्थात् सम्पूर्ण प्राणिमात्र; **ओदनः=**भोजन; **भवतः=**बन जाते हैं (तथा); **मृत्युः यस्य=**सबका संहार करनेवाली मृत्यु (भी) जिसका; **उपसेचनम्=**उपसेचन (भोज्य वस्तुके साथ लगाकर खानेका व्यञ्जन, तरकारी आदि); **[ भवति ]=**बन जाता है; **सः यत्र=**वह परमेश्वर जहाँ (और); **इत्था=**जैसा है, यह ठीक-ठीक; **कः वेद=**कौन जानता है॥ २५॥

**व्याख्या—**मनुष्य-शरीरमें भी धर्मशील ब्राह्मण और धर्मरक्षक क्षत्रियका शरीर परमात्माकी प्राप्तिके लिये अधिक उत्तम माना गया है; किंतु वे भी उन कालस्वरूप परमेश्वरके भोजन बन जाते हैं, फिर अन्य साधारण मनुष्य-शरीरोंकी तो बात ही क्या है। जो सबको मारनेवाले मृत्युदेव हैं, वे भी

१२०

ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय १ ]

उन परमेश्वरके उपसेचन अर्थात् भोजनके साथ लगाकर खाये जानेवाले व्यञ्जन—चटनी—तरकारी आदिकी भाँति हैं। ऐसे ब्राह्मण-क्षत्रियादि समस्त प्राणियोंके और स्वयं मृत्युके संहारक अथवा आश्रयदाता परमेश्वरको भला, कोई भी मनुष्य इन अनित्य मन, बुद्धि और इन्द्रियोंके द्वारा अन्य ज्ञेय वस्तुओंकी भाँति कैसे जान सकता है। किसकी सामर्थ्य है, जो सबके जाननेवालेको जान ले। अतः (पूर्वीक २३ वें मन्त्रके अनुसार) जिसको परमात्मा अपनी कृपाका पात्र बनाकर अपना तत्त्व समझाना चाहते हैं, वही उनको जान सकता है। अपनी शक्तिसे उन्हें कोई भी यथार्थ रूपमें नहीं जान सकता; क्योंकि वे लौकिक ज्ञेय वस्तुओंकी भाँति बुद्धिके द्वारा जाननेमें आनेवाले नहीं हैं ॥ २५ ॥

॥ द्वितीय वल्ली समाप्त ॥ २ ॥

तृतीय वल्ली

सम्बन्ध —द्वितीय वल्लीमें जीवात्मा और परमात्माके स्वरूपका पृथक्-पृथक् वर्णन किया गया और उनको जानकर परब्रह्मको प्राप्त कर लेनेका फल भी बतलाया गया। संक्षेपमें यह बात भी कही गयी कि जिसको वे परमात्मा स्वीकार करते हैं, वही उन्हें जान सकता है, परंतु परमात्माको प्राप्त करनेके साधनोंका वहाँ स्पष्टरूपसे वर्णन नहीं हुआ; अतः साधनोंका वर्णन करनेके लिये तृतीय वल्लीका आरम्भ करते हुए यमराज पहले मन्त्रमें जीवात्मा और परमात्माका नित्य सम्बन्ध और निवास-स्थान बतलाते हैं—

ऋतंपिबन्तौसुकृतस्यलोकं
गुहांप्रविष्टौपरमे परार्धे।
छायातपौब्रह्मविदोवदन्ति
पञ्चाग्रयो ये च त्रिणाचिकेताः ॥ १ ॥

वल्ल्बी ३ ]

कठोपनिषद्

१२१

सुकृतस्य लोके=शुभ कर्मोंके फलस्वरूप मनुष्य-शरीरमें; परमे परार्धे=परब्रह्मके उत्तम निवास-स्थान (हृदय-आकाश)-में; गुह्यम् प्रविष्टौ=बुद्धिरूप गुफामें छिपे हुए; ऋतम् पिबन्तौ=सत्यका पान करनेवाले (दो हैं); छायातपो=(वे) छाया और धूपकी भाँति परस्पर भिन्न हैं; (यह बात) ब्रह्मविदः=ब्रह्मवेत्ता ज्ञानी महापुरुष; वदन्ति=कहते हैं; च ये=तथा जो; त्रिणाचिकेताः=तीन बार नाचिकेत-अग्निका चयन कर लेनेवाले; (और) पञ्चाग्रयः=पञ्चाग्निसम्पन्न गृहस्थ हैं; [ ते वदन्ति ]=वे भी यही बात कहते हैं॥१॥

व्याख्या —यमराजने यहाँ जीवात्मा और परमात्माके नित्य सम्बन्धका परिचय देते हुए कहा कि ब्रह्मवेत्ता ज्ञानी महानुभाव तथा यज्ञादि शुभकर्मोंका अनुष्ठान करनेवाले आस्तिक सज्जन—सभी एक स्वरसे यही कहते हैं कि यह मनुष्य-शरीर बहुत ही दुर्लभ है। पूर्वजन्माजित अनेकों पुण्यकर्मोंको निमित्त बनाकर परम कृपालु परमात्मा कृपापरवश हो जीवको उसके कल्याण-सम्पादनके लिये यह श्रेष्ठ शरीर प्रदान करते हैं और फिर उस जीवात्माके साथ ही स्वयं भी उसीके हृदयके अन्तस्तलमें—परब्रह्मके निवासस्वरूप श्रेष्ठ स्थानमें अन्तर्धामीरूपसे प्रविष्ट हो रहते हैं (छा० ३० ६। ३। २) इतना ही नहीं, वे दोनों साथ-ही-साथ वहाँ सत्यका पान करते हैं—शुभकर्मोंके अवश्यम्भावी सत्फलका भोग करते हैं (गीता ५। २९)। अवश्य ही दोनोंके भोगमें बड़ा अन्तर है। (परमात्मा असङ्ग और अभोक्ता हैं) उनका प्रत्येक प्राणीके हृदयमें निवास करके उसके शुभकर्मोंके फलका उपभोग करना उनकी वैसी ही लीला है, जैसी अजन्मा होकर जन्म ग्रहण करना। इसलिये यह कहा जाता है कि वे भोगते हुए भी वस्तुतः नहीं भोगते। अथवा यह भी कहा जा सकता है कि परमात्मा सत्यको पिलाते हैं—शुभ-कर्मका फल भुगताते हैं और जीवात्मा पीता है—फल भोगता है। परंतु जीवात्मा फलभोगके समय असङ्ग नहीं रहता। वह अभिमानवश उसमें सुखका उपभोग करता है। इस प्रकार साथ रहनेपर भी जीवात्मा और परमात्मा दोनों छाया और धूपकी

१२२

ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय १ ]

भाँति परस्पर भिन्न हैं। जीवात्मा छायाकी भाँति अल्प प्रकाश—अल्पज्ञ है और परमात्मा धूपकी भाँति पूर्णप्रकाश—सर्वज्ञ! परंतु जीवात्मामें जो कुछ अल्पज्ञान है, वह भी परमात्माका ही है, जैसे छायामें अल्प-प्रकाश पूर्णप्रकाशरूप धूपका ही होता है।*

इस रहस्यको समझकर मनुष्यको अपनेमें किसी प्रकारकी भी शक्ति-सामर्थ्यका अभिमान नहीं करना चाहिये और अन्तर्धामीरूपसे सदा-सर्वदा अपने हृदयमें रहनेवाले परम आत्मीय परम कृपालु परमात्माका नित्य-निरन्तर चिन्तन करते रहना चाहिये ॥ १ ॥

सम्बन्ध— परमात्माको जानने और प्राप्त करनेका जो सर्वोत्तम साधन 'उन्हें जानने और पानेकी शक्ति प्रदान करनेके लिये उन्हींसे प्रार्थना करना है' इस बातको यमराज स्वयं प्रार्थना करते हुए बतलाते हैं—

यः सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म यत् परम्। अभयं तितीर्षतां पारं नाचिकेतः शकेमहि ॥ २ ॥

ईजानानाम्=यज्ञ करनेवालोंके लिये; यः सेतुः=जो दुःखसमुद्रसे पार पहुँचा देनेयोग्य सेतु है; [तम्] नाचिकेतम्=उस नाचिकेत-अग्रिको (और); पारम् तितीर्षताम्=संसार-समुद्रसे पार होनेकी इच्छावालोंके लिये; यत् अभयम्=जो भयरहित पद है; [तत्] अक्षरम्=उस अविनाशी; परम् ब्रह्म=परब्रह्म पुरुषोत्तमको; शकेमहि=जानने और प्राप्त करनेमें भी हम समर्थ हों ॥ २ ॥

व्याख्या— यमराज कहते हैं कि हे परमात्मन्! आप हमें वह सामर्थ्य दीजिये, जिससे हम निष्कामभावसे यज्ञादि शुभकर्म करनेकी विधिको भलीभाँति जान सकें और आपके आज्ञापालनार्थ उनका अनुष्ठान करके आपकी प्रसन्नता प्राप्त कर सकें तथा जो संसार-समुद्रसे पार होनेकी इच्छावाले विरक्त पुरुषोंके

  • इस मन्त्रमें 'जीवात्मा' और 'परमात्मा'को ही गुहामें प्रविष्ट बतलाया गया है, 'बुद्धि' और 'जीव' को नहीं। 'गुहाहितत्वं तु परमात्मन एव दृश्यते' (देखिये—ब्रह्मसूत्र अध्याय १ पाद २ सू० ११ का शाङ्करभाष्य)।

वल्ल्बी ३ ]

कठोपनिषद्

१२३

लिये निर्भय पद है, उस परम अविनाशी आप परब्रह्म पुरुषोत्तमभगवान्को भी जानने और प्राप्त करनेके योग्य बन जायँ।

इस मन्त्रमें यमराजने परमात्मासे उन्हें जाननेकी शक्ति प्रदान करनेके लिये प्रार्थना करके यह भाव दिखलाया है कि परब्रह्म पुरुषोत्तमको जानने और प्राप्त करनेका सबसे उत्तम और सरल साधन उनसे प्रार्थना करना ही है॥२॥

सम्बन्ध— अब, उस परब्रह्म पुरुषोत्तमके परमधाममें किन साधनोंसे सम्पन्न मनुष्य पहुँच सकता है, यह बात रथ और रथीके रूपककी कल्पना करके समझायी जाती है—

आत्मानः रथिनं विद्धि शरीरः रथमेव तु। बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च॥३॥

आत्मानम्=(हे नचिकेता! तुम) जीवात्माको तो; रथिनम्=रथका स्वामी (उसमें बैठकर चलनेवाला); विद्धि=समझो; तु=और; शरीरम् एव=शरीरको ही; रथम्=रथ (समझो); तु बुद्धिम्=तथा बुद्धिको; सारथिम्=सारथि (रथको चलानेवाला); विद्धि=समझो; च मनः एव=और मनको ही; प्रग्रहम्=लगाम (समझो) ॥३॥

इन्द्रियाणि हयानाहूर्विषयाः स्तेषु गोचरान्। आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहूर्मनीषिणः॥४॥

मनीषिणः=ज्ञानीजन (इस रूपकमें); इन्द्रियाणि=इन्द्रियोंको; हयान्=घोड़े; आहुः=बतलाते हैं (और); विषयान्=विषयोंको; तेषु गोचरान्=उन घोड़ोंके विचरनेका मार्ग (बतलाते हैं); आत्मेन्द्रियमनोयुक्तम्=(तथा) शरीर, इन्द्रिय और मन—इन सबके साथ रहनेवाला जीवात्मा ही; भोक्ता=भोक्ता है; इति आहुः=यों कहते हैं॥४॥

व्याख्या— जीवात्मा परमात्मासे बिछुड़ा हुआ है, अनन्त कालसे वह अनवरत संसाररूपी बीहड़ वनमें इधर-उधर सुखकी खोजमें भटक रहा है। सुख समझकर जहाँ भी जाता है, वहाँ धोखा खाता है। सर्वथा साधनहीन और दयनीय है। जबतक वह परम सुखस्वरूप परमात्माके समीप नहीं पहुँच जाता, तबतक

१२४

ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय १ ]

उसे सुख-शान्ति कभी नहीं मिल सकती। उसकी इस दयनीय दशाको देखकर दयामय परमात्माने उसे मानव-शरीररूपी सुन्दर सर्वसाधनसम्पन्न रथ दिया। इन्द्रियरूप बलवान् घोड़े दिये। उनके मनरूपी लगाम लगाकर उसे बुद्धिरूपी सारथिके हाथोंमें सौंप दिया और जीवात्माको उस रथमें बैठाकर—उसका स्वामी बनाकर यह बतला दिया कि वह निरन्तर बुद्धिकी प्रेरणा करता रहे और परमात्माकी ओर ले जानेवाले भगवान्के नाम, रूप, लीला, धाम आदिके श्रवण, कीर्तन, मननादि विषयरूप प्रशस्त और सहज मार्गपर चलकर शीघ्र परमात्माके धाममें पहुँच जाय।

जीवात्मा यदि ऐसा करता तो वह शीघ्र ही परमात्मातक पहुँच जाता; परंतु वह अपने परमानन्दमय भगवत्प्रासरूप इस महान् लक्ष्यको मोहवश भूल गया। उसने बुद्धिकी प्रेरणा देना बंद कर दिया, जिससे बुद्धिरूपी सारथि असावधान हो गया, उसने मनरूपी लगामको इन्द्रियरूपी दुष्ट घोड़ोंकी इच्छापर छोड़ दिया। परिणाम यह हुआ कि जीवात्मा विषयप्रवण इन्द्रियोंके अधीन होकर सतत संसारचक्रमें डालनेवाले लौकिक शब्द-स्पर्शादि विषयोंमें भटकने लगा। अर्थात् वह जिन शरीर, इन्द्रिय, मनके सहयोगसे भगवान्को प्राप्त कर सकता, उन्हींके साथ युक्त होकर वह विषय-विषके उपभोगमें लग गया ॥ ३-४ ॥

सम्बन्ध —परमात्माकी ओर न जाकर उसकी इन्द्रियाँ लौकिक विषयोंमें क्यों लग गयीं, इसका कारण बतलाते हैं—

यस्त्वविज्ञानवान् भवत्ययुक्तेन मनसा सदा।

तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्चा इव सारथेः ॥ ५ ॥

यः सदा=जो सदा; अविज्ञानवान्=विवेकहीन बुद्धिवाला; तु=और; अयुक्तेन=अवशीभूत (चञ्चल); मनसा=मनसे (युक्त); भवति=रहता है; तस्य=उसकी; इन्द्रियाणि=इन्द्रियाँ; सारथेः=असावधान सारथिके; दुष्टाश्चाः इव=दुष्ट घोड़ोंकी भाँति; अवश्यानि=वशमें न रहनेवाली; [ भवन्ति ]=हो जाती हैं ॥ ५ ॥

व्याख्या —रथको घोड़े ही चलाते हैं, परंतु उन घोड़ोंको चाहे जिस ओर, चाहे जिस मार्गपर ले जाना—लगाम हाथमें थामे हुए बुद्धिमान् सारथिका काम

वल्ल्मी ३ ]

कठोपनिषद्

१२५

है। इन्द्रियरूपी बलवान् और दुर्धर्ष घोड़े स्वाभाविक ही आपातरमणीय विषयोंसे भरे संसाररूप हरी-हरी घासके जंगलकी ओर मनमाना दौड़ना चाहते हैं; परंतु यदि बुद्धिरूप सारथि मनरूपी लगामको जोरसे खींचकर उन्हें अपने वशमें कर लेता है तो फिर घोड़े मनरूपी लगामके सहारे बिना चाहे जिस ओर नहीं जा सकते। यह सभी जानते हैं कि इन्द्रियाँ विषयोंका ग्रहण तभी कर सकती हैं, जब मन उनके साथ होता है। घोड़े उसी ओर दौड़ते हैं, जिस ओर लगामका सहारा होता है; पर इस लगामको ठीक रखना सारथिकी बलबुद्धिपर निर्भर करता है। यदि बुद्धिरूपी सारथि विवेकयुक्त स्वामीका आज्ञाकारी, लक्ष्यपर सदा स्थिर, बलवान्, मार्गके ज्ञानसे सम्पन्न और इन्द्रियरूपी घोड़ोंको चलानेमें दक्ष नहीं होता तो इन्द्रियरूपी दुष्ट घोड़े उसके वशमें न रहकर लगामके सहारे सम्पूर्ण रथको ही अपने वशमें कर लेते हैं और फलस्वरूप रथी और सारथिसमेत उस रथको लिये हुए गहरे गड्ढेमें जा पड़ते हैं। बुद्धिके नियन्त्रणसे रहित इन्द्रियाँ उत्तरोत्तर उसी प्रकार उच्छृङ्खल होती चली जाती हैं जैसे असावधान सारथिके दुष्ट घोड़े॥५॥

सम्बन्ध —अब स्वयं सावधान रहकर अपनी बुद्धिको विवेकशील बनानेका लाभ बतलाते हैं—

यस्तु विज्ञानवान् भवति युक्तेन मनसा सदा तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्चा इव सारथेः॥६॥

तु यः सदा=परंतु जो सदा; विज्ञानवान्=विवेकयुक्त बुद्धिवाला (और); युक्तेन=वशमें किये हुए; मनसा=मनसे सम्पन्न; भवति=रहता है; तस्य=उसकी; इन्द्रियाणि=इन्द्रियाँ; सारथेः=सावधान सारथिके; सदश्चाः इव=अच्छे घोड़ोंकी भाँति; वश्यानि=वशमें; [ भवन्ति ]=रहती हैं॥६॥

व्याख्या —जो जीवात्मा अपनी बुद्धिको विवेकसम्पन्न बना लेता है—जिसकी बुद्धि अपने लक्ष्यकी ओर ध्यान रखती हुई नित्य-निरन्तर निपुणताके साथ इन्द्रियोंको सन्मार्गपर चलानेके लिये मनको बाध्य किये रहती है, उसका