ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 117, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंवल्ली २ ] कठोपनिषद् ११५
जड शरीर और भोगोंसे वास्तवमें इसका कोई सम्बन्ध नहीं है। यह अनादि और अनन्त है; न तो इसका कोई कारण है और न कार्य ही; अतः यह जन्म-मरणसे सर्वथा रहित, सदा एकरस, सर्वथा निर्विकार है। शरीरके नाशसे इसका नाश नहीं होता। जो लोग इसको मारनेवाला या मरनेवाला मानते हैं, वे वस्तुतः आत्मस्वरूपको जानते ही नहीं, वे सर्वथा भ्रान्त हैं। उनकी बातोंपर ध्यान नहीं देना चाहिये। वस्तुतः आत्मा न तो किसीको मारता है और न इसे कोई मार ही सकता है।
साधकको शरीर और भोगोंकी अनित्यता और अपने आत्माकी नित्यतापर विचार करके, इन अनित्य भोगोंसे सुखकी आशाका त्याग करके सदा अपने साथ रहनेवाले नित्य सुखस्वरूप परब्रह्म पुरुषोत्तमको प्राप्त करनेका अभिलाषी बनना चाहिये॥ १८-१९॥
सम्बन्ध— इस प्रकार आत्मतत्त्वके वर्णनद्वारा नचिकेताके अन्तःकरणमें परब्रह्म पुरुषोत्तमके तत्त्वकी जिज्ञासा उत्पन्न करके यमराज अब परमात्माके स्वरूपका वर्णन करते हैं—
अणोरणीयान्महतो महीया-
नात्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम्।
तमक्रतुः पश्यति वीतशोको
धातुप्रसादान्महिमानमात्मनः ॥ २०॥*
अस्य = इस; जन्तोः = जीवात्माके; गुहायाम् = हृदयरूप गुफामें; निहितः = रहनेवाला; आत्मा = परमात्मा; अणोः अणीयान् = सूक्ष्मसे अतिसूक्ष्म (और); महतः महीयान् = महान्से भी महान् है; आत्मनः तम् महिमानम् = परमात्माकी उस महिमाको; अक्रतुः = कामनारहित (और); वीतशोकः = चिन्तारहित (कोई विरला साधक); धातुप्रसादात् = सर्वाधार परब्रह्म परमेश्वरकी कृपासे ही; पश्यति = देख पाता है॥ २०॥
व्याख्या— इससे पहले जीवात्माके शुद्ध स्वरूपका वर्णन किया गया
* यह मन्त्र श्वेता० उ० (३। २०) में भी है।