भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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११४ ईशादि नौ उपनिषद् [ अध्याय १

क्षय और वृद्धिसे रहित है; शरीरे हन्यमाने=शरीरके नाश किये जानेपर भी (इसका); न हन्यते=नाश नहीं किया जा सकता*॥ १८॥

हन्ता चेन्मन्यते हन्तुँ हतश्चेन्मन्यते हतम्।
उभौ तौ न विजानीतो नायँ हन्ति न हन्यते॥ १९॥

चेत्=यदि कोई; हन्ता=मारनेवाला व्यक्ति; हन्तुम्=अपनेको मारनेमें समर्थ; मन्यते=मानता है (और); चेत्=यदि; हतः=(कोई) मारा जानेवाला व्यक्ति; हतम्=अपनेको मारा गया; मन्यते=समझता है (तो); तौ उभौ=वे दोनों ही; न विजानीतः=(आत्मस्वरूपको) नहीं जानते (क्योंकि); अयम्=यह आत्मा; न हन्ति=न तो (किसीको) मारता है (और); न हन्यते=न मारा ही जाता है†॥१९॥

व्याख्या—यमराज यहाँ आत्माके शुद्ध स्वरूपका और उसकी नित्यताका निरूपण करते हैं; क्योंकि जबतक साधकको अपनी नित्यता और निर्विकारताका अनुभव नहीं हो जाता एवं वह जबतक अपनेको शरीर आदि अनित्य वस्तुओंसे भिन्न नहीं समझ लेता, तबतक इन अनित्य पदार्थोंसे वैराग्य होकर उसके अन्तःकरणमें नित्य तत्त्वकी अभिलाषा उत्पन्न नहीं होती। उसको यह दृढ़ अनुभूति होनी चाहिये कि जीवात्मा नित्य चेतन ज्ञानस्वरूप है; अनित्य, विनाशी


* गीतामें इस मन्त्रके भावको इस प्रकार समझाया गया है—
न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
(२।२०)
‘यह आत्मा किसी भी कालमें न तो जन्मता है और न मरता ही है तथा न यह उत्पन्न होकर फिर होनेवाला ही है; क्योंकि यह अजन्मा, नित्य, सनातन और पुरातन है; शरीरके मारे जानेपर भी यह नहीं मारा जाता।’

† गीतामें इस मन्त्रके भावको और भी स्पष्टरूपसे व्यक्त किया गया है—
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते॥
(२।१९)
‘जो इस आत्माको मारनेवाला समझता है तथा जो इसको मारा गया मानता है, वे दोनों ही नहीं जानते; क्योंकि यह आत्मा वास्तवमें न तो किसीको मारता है न किसीके द्वारा मारा जाता है।’