ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 121, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंवल्ली २ ] कठोपनिषद् १११
आचरणोंसे निवृत्त नहीं हुआ है; **न अशान्तः=**न वह प्राप्त कर सकता है, जो अशान्त है; **न असमाहितः=**न वह कि जिसके मन, इन्द्रियाँ संयत नहीं हैं; **वा=**और; **न अशान्तमानसः [ आप्नुयात् ]=**न वही प्राप्त करता है, जिसका मन शान्त नहीं है॥ २४॥
**व्याख्या—**जो मनुष्य बुरे आचरणोंसे विरक्त होकर उनका त्याग नहीं कर देता, जिसका मन परमात्माको छोड़कर दिन-रात सांसारिक भोगोंमें भटकता रहता है, परमात्मापर विश्वास न होनेके कारण जो सदा अशान्त रहता है, जिसका मन, बुद्धि और इन्द्रियाँ वशमें की हुई नहीं हैं, ऐसा मनुष्य सूक्ष्म बुद्धिद्वारा आत्मविचार करते रहनेपर भी परमात्माको नहीं पा सकता, क्योंकि वह परमात्माकी असीम कृपाका आदर नहीं करता, उसकी अवहेलना करता रहता है; अतः वह उनकी कृपाका अधिकारी नहीं होता॥ २४॥
**सम्बन्ध—**उस परब्रह्म परमेश्वरके तत्त्वको सुनकर और बुद्धिद्वारा विचार करके भी मनुष्य उसे क्यों नहीं जान सकता? इस जिज्ञासापर कहते हैं—
यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च उभे भवत ओदनः।
मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः॥ २५॥
यस्य=(संहारकालमें) जिस परमेश्वरके; **ब्रह्म च क्षत्रम् च उभे=**ब्राह्मण और क्षत्रिय—ये दोनों ही अर्थात् सम्पूर्ण प्राणिमात्र; **ओदनः=**भोजन; **भवतः=**बन जाते हैं (तथा); **मृत्युः यस्य=**सबका संहार करनेवाली मृत्यु (भी) जिसका; **उपसेचनम्=**उपसेचन (भोज्य वस्तुके साथ लगाकर खानेका व्यञ्जन, तरकारी आदि); **[ भवति ]=**बन जाता है; **सः यत्र=**वह परमेश्वर जहाँ (और); **इत्था=**जैसा है, यह ठीक-ठीक; **कः वेद=**कौन जानता है॥ २५॥
**व्याख्या—**मनुष्य-शरीरमें भी धर्मशील ब्राह्मण और धर्मरक्षक क्षत्रियका शरीर परमात्माकी प्राप्तिके लिये अधिक उत्तम माना गया है; किंतु वे भी उन कालस्वरूप परमेश्वरके भोजन बन जाते हैं, फिर अन्य साधारण मनुष्य-शरीरोंकी तो बात ही क्या है। जो सबको मारनेवाले मृत्युदेव हैं, वे भी