ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११८ ईशादि नौ उपनिषद् [ अध्याय १
यमेवैष वृणुते तेन लभ्य- स्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्॥ २३॥*
अयम् आत्मा = यह परब्रह्म परमात्मा; न = न तो; प्रवचनेन = प्रवचनसे; न मेधया = न बुद्धिसे (और); न बहुना श्रुतेन = न बहुत सुननेसे ही; लभ्यः = प्राप्त हो सकता है; यम् = जिसको; एषः = यह; वृणुते = स्वीकार कर लेता है; तेन एव लभ्यः = उसके द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है (क्योंकि); एषः आत्मा = यह परमात्मा; तस्य = उसके लिये; स्वाम् तनूम् = अपने यथार्थ स्वरूपको; विवृणुते = प्रकट कर देता है॥ २३॥
**व्याख्या—**जिन परमेश्वरकी महिमाका वर्णन मैं कर रहा हूँ, वे न तो उनको मिलते हैं, जो शास्त्रोंको पढ़-सुनकर लच्छेदार भाषामें परमात्मतत्त्वका नाना प्रकारसे वर्णन करते हैं, न उन तर्कशील बुद्धिमान् मनुष्योंको ही मिलते हैं, जो बुद्धिके अभिमानमें प्रमत्त हुए तर्कके द्वारा विवेचन करके उन्हें समझनेकी चेष्टा करते हैं और न उनको ही मिलते हैं, जो परमात्माके विषयमें बहुत कुछ सुनते रहते हैं। वे तो उसीको प्राप्त होते हैं, जिसको वे स्वयं स्वीकार कर लेते हैं और वे स्वीकार उसीको करते हैं, जिसको उनके लिये उत्कट इच्छा होती है। जो उनके बिना रह नहीं सकता। जो अपनी बुद्धि या साधनापर भरोसा न करके केवल उनकी कृपाकी ही प्रतीक्षा करता रहता है, ऐसे कृपा-निर्भर साधकपर परमात्मा कृपा करते हैं और योगमायाका परदा हटाकर उसके सामने अपना स्वरूप प्रकट कर देते हैं॥ २३॥
**सम्बन्ध—**अब यह बतलाते हैं कि परमात्मा किसको प्राप्त नहीं होते—
नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः। नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात्॥ २४॥
प्रज्ञानेन = सूक्ष्म बुद्धिके द्वारा; अपि = भी; एनम् = इस परमात्माको; न दुश्चरितात् अविरतः आप्नुयात् = न तो वह मनुष्य प्राप्त कर सकता है, जो बुरे
* यह मन्त्र मुण्डकोपनिषद् (३।२।३) में भी इसी प्रकार है।