ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 124, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें१२२
ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
भाँति परस्पर भिन्न हैं। जीवात्मा छायाकी भाँति अल्प प्रकाश—अल्पज्ञ है और परमात्मा धूपकी भाँति पूर्णप्रकाश—सर्वज्ञ! परंतु जीवात्मामें जो कुछ अल्पज्ञान है, वह भी परमात्माका ही है, जैसे छायामें अल्प-प्रकाश पूर्णप्रकाशरूप धूपका ही होता है।*
इस रहस्यको समझकर मनुष्यको अपनेमें किसी प्रकारकी भी शक्ति-सामर्थ्यका अभिमान नहीं करना चाहिये और अन्तर्धामीरूपसे सदा-सर्वदा अपने हृदयमें रहनेवाले परम आत्मीय परम कृपालु परमात्माका नित्य-निरन्तर चिन्तन करते रहना चाहिये ॥ १ ॥
सम्बन्ध— परमात्माको जानने और प्राप्त करनेका जो सर्वोत्तम साधन 'उन्हें जानने और पानेकी शक्ति प्रदान करनेके लिये उन्हींसे प्रार्थना करना है' इस बातको यमराज स्वयं प्रार्थना करते हुए बतलाते हैं—
यः सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म यत् परम्। अभयं तितीर्षतां पारं नाचिकेतः शकेमहि ॥ २ ॥
ईजानानाम्=यज्ञ करनेवालोंके लिये; यः सेतुः=जो दुःखसमुद्रसे पार पहुँचा देनेयोग्य सेतु है; [तम्] नाचिकेतम्=उस नाचिकेत-अग्रिको (और); पारम् तितीर्षताम्=संसार-समुद्रसे पार होनेकी इच्छावालोंके लिये; यत् अभयम्=जो भयरहित पद है; [तत्] अक्षरम्=उस अविनाशी; परम् ब्रह्म=परब्रह्म पुरुषोत्तमको; शकेमहि=जानने और प्राप्त करनेमें भी हम समर्थ हों ॥ २ ॥
व्याख्या— यमराज कहते हैं कि हे परमात्मन्! आप हमें वह सामर्थ्य दीजिये, जिससे हम निष्कामभावसे यज्ञादि शुभकर्म करनेकी विधिको भलीभाँति जान सकें और आपके आज्ञापालनार्थ उनका अनुष्ठान करके आपकी प्रसन्नता प्राप्त कर सकें तथा जो संसार-समुद्रसे पार होनेकी इच्छावाले विरक्त पुरुषोंके
- इस मन्त्रमें 'जीवात्मा' और 'परमात्मा'को ही गुहामें प्रविष्ट बतलाया गया है, 'बुद्धि' और 'जीव' को नहीं। 'गुहाहितत्वं तु परमात्मन एव दृश्यते' (देखिये—ब्रह्मसूत्र अध्याय १ पाद २ सू० ११ का शाङ्करभाष्य)।