ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 123, कुल 548 में से
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कठोपनिषद्
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सुकृतस्य लोके=शुभ कर्मोंके फलस्वरूप मनुष्य-शरीरमें; परमे परार्धे=परब्रह्मके उत्तम निवास-स्थान (हृदय-आकाश)-में; गुह्यम् प्रविष्टौ=बुद्धिरूप गुफामें छिपे हुए; ऋतम् पिबन्तौ=सत्यका पान करनेवाले (दो हैं); छायातपो=(वे) छाया और धूपकी भाँति परस्पर भिन्न हैं; (यह बात) ब्रह्मविदः=ब्रह्मवेत्ता ज्ञानी महापुरुष; वदन्ति=कहते हैं; च ये=तथा जो; त्रिणाचिकेताः=तीन बार नाचिकेत-अग्निका चयन कर लेनेवाले; (और) पञ्चाग्रयः=पञ्चाग्निसम्पन्न गृहस्थ हैं; [ ते वदन्ति ]=वे भी यही बात कहते हैं॥१॥
व्याख्या —यमराजने यहाँ जीवात्मा और परमात्माके नित्य सम्बन्धका परिचय देते हुए कहा कि ब्रह्मवेत्ता ज्ञानी महानुभाव तथा यज्ञादि शुभकर्मोंका अनुष्ठान करनेवाले आस्तिक सज्जन—सभी एक स्वरसे यही कहते हैं कि यह मनुष्य-शरीर बहुत ही दुर्लभ है। पूर्वजन्माजित अनेकों पुण्यकर्मोंको निमित्त बनाकर परम कृपालु परमात्मा कृपापरवश हो जीवको उसके कल्याण-सम्पादनके लिये यह श्रेष्ठ शरीर प्रदान करते हैं और फिर उस जीवात्माके साथ ही स्वयं भी उसीके हृदयके अन्तस्तलमें—परब्रह्मके निवासस्वरूप श्रेष्ठ स्थानमें अन्तर्धामीरूपसे प्रविष्ट हो रहते हैं (छा० ३० ६। ३। २) इतना ही नहीं, वे दोनों साथ-ही-साथ वहाँ सत्यका पान करते हैं—शुभकर्मोंके अवश्यम्भावी सत्फलका भोग करते हैं (गीता ५। २९)। अवश्य ही दोनोंके भोगमें बड़ा अन्तर है। (परमात्मा असङ्ग और अभोक्ता हैं) उनका प्रत्येक प्राणीके हृदयमें निवास करके उसके शुभकर्मोंके फलका उपभोग करना उनकी वैसी ही लीला है, जैसी अजन्मा होकर जन्म ग्रहण करना। इसलिये यह कहा जाता है कि वे भोगते हुए भी वस्तुतः नहीं भोगते। अथवा यह भी कहा जा सकता है कि परमात्मा सत्यको पिलाते हैं—शुभ-कर्मका फल भुगताते हैं और जीवात्मा पीता है—फल भोगता है। परंतु जीवात्मा फलभोगके समय असङ्ग नहीं रहता। वह अभिमानवश उसमें सुखका उपभोग करता है। इस प्रकार साथ रहनेपर भी जीवात्मा और परमात्मा दोनों छाया और धूपकी