ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 125, कुल 548 में से
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कठोपनिषद्
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लिये निर्भय पद है, उस परम अविनाशी आप परब्रह्म पुरुषोत्तमभगवान्को भी जानने और प्राप्त करनेके योग्य बन जायँ।
इस मन्त्रमें यमराजने परमात्मासे उन्हें जाननेकी शक्ति प्रदान करनेके लिये प्रार्थना करके यह भाव दिखलाया है कि परब्रह्म पुरुषोत्तमको जानने और प्राप्त करनेका सबसे उत्तम और सरल साधन उनसे प्रार्थना करना ही है॥२॥
सम्बन्ध— अब, उस परब्रह्म पुरुषोत्तमके परमधाममें किन साधनोंसे सम्पन्न मनुष्य पहुँच सकता है, यह बात रथ और रथीके रूपककी कल्पना करके समझायी जाती है—
आत्मानः रथिनं विद्धि शरीरः रथमेव तु। बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च॥३॥
आत्मानम्=(हे नचिकेता! तुम) जीवात्माको तो; रथिनम्=रथका स्वामी (उसमें बैठकर चलनेवाला); विद्धि=समझो; तु=और; शरीरम् एव=शरीरको ही; रथम्=रथ (समझो); तु बुद्धिम्=तथा बुद्धिको; सारथिम्=सारथि (रथको चलानेवाला); विद्धि=समझो; च मनः एव=और मनको ही; प्रग्रहम्=लगाम (समझो) ॥३॥
इन्द्रियाणि हयानाहूर्विषयाः स्तेषु गोचरान्। आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहूर्मनीषिणः॥४॥
मनीषिणः=ज्ञानीजन (इस रूपकमें); इन्द्रियाणि=इन्द्रियोंको; हयान्=घोड़े; आहुः=बतलाते हैं (और); विषयान्=विषयोंको; तेषु गोचरान्=उन घोड़ोंके विचरनेका मार्ग (बतलाते हैं); आत्मेन्द्रियमनोयुक्तम्=(तथा) शरीर, इन्द्रिय और मन—इन सबके साथ रहनेवाला जीवात्मा ही; भोक्ता=भोक्ता है; इति आहुः=यों कहते हैं॥४॥
व्याख्या— जीवात्मा परमात्मासे बिछुड़ा हुआ है, अनन्त कालसे वह अनवरत संसाररूपी बीहड़ वनमें इधर-उधर सुखकी खोजमें भटक रहा है। सुख समझकर जहाँ भी जाता है, वहाँ धोखा खाता है। सर्वथा साधनहीन और दयनीय है। जबतक वह परम सुखस्वरूप परमात्माके समीप नहीं पहुँच जाता, तबतक