भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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वल्ल्मी ३ ]

कठोपनिषद्

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है। इन्द्रियरूपी बलवान् और दुर्धर्ष घोड़े स्वाभाविक ही आपातरमणीय विषयोंसे भरे संसाररूप हरी-हरी घासके जंगलकी ओर मनमाना दौड़ना चाहते हैं; परंतु यदि बुद्धिरूप सारथि मनरूपी लगामको जोरसे खींचकर उन्हें अपने वशमें कर लेता है तो फिर घोड़े मनरूपी लगामके सहारे बिना चाहे जिस ओर नहीं जा सकते। यह सभी जानते हैं कि इन्द्रियाँ विषयोंका ग्रहण तभी कर सकती हैं, जब मन उनके साथ होता है। घोड़े उसी ओर दौड़ते हैं, जिस ओर लगामका सहारा होता है; पर इस लगामको ठीक रखना सारथिकी बलबुद्धिपर निर्भर करता है। यदि बुद्धिरूपी सारथि विवेकयुक्त स्वामीका आज्ञाकारी, लक्ष्यपर सदा स्थिर, बलवान्, मार्गके ज्ञानसे सम्पन्न और इन्द्रियरूपी घोड़ोंको चलानेमें दक्ष नहीं होता तो इन्द्रियरूपी दुष्ट घोड़े उसके वशमें न रहकर लगामके सहारे सम्पूर्ण रथको ही अपने वशमें कर लेते हैं और फलस्वरूप रथी और सारथिसमेत उस रथको लिये हुए गहरे गड्ढेमें जा पड़ते हैं। बुद्धिके नियन्त्रणसे रहित इन्द्रियाँ उत्तरोत्तर उसी प्रकार उच्छृङ्खल होती चली जाती हैं जैसे असावधान सारथिके दुष्ट घोड़े॥५॥

सम्बन्ध —अब स्वयं सावधान रहकर अपनी बुद्धिको विवेकशील बनानेका लाभ बतलाते हैं—

यस्तु विज्ञानवान् भवति युक्तेन मनसा सदा तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्चा इव सारथेः॥६॥

तु यः सदा=परंतु जो सदा; विज्ञानवान्=विवेकयुक्त बुद्धिवाला (और); युक्तेन=वशमें किये हुए; मनसा=मनसे सम्पन्न; भवति=रहता है; तस्य=उसकी; इन्द्रियाणि=इन्द्रियाँ; सारथेः=सावधान सारथिके; सदश्चाः इव=अच्छे घोड़ोंकी भाँति; वश्यानि=वशमें; [ भवन्ति ]=रहती हैं॥६॥

व्याख्या —जो जीवात्मा अपनी बुद्धिको विवेकसम्पन्न बना लेता है—जिसकी बुद्धि अपने लक्ष्यकी ओर ध्यान रखती हुई नित्य-निरन्तर निपुणताके साथ इन्द्रियोंको सन्मार्गपर चलानेके लिये मनको बाध्य किये रहती है, उसका