ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 128, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
मन भी लक्ष्यकी ओर लगा रहता है एवं उसकी इन्द्रियाँ निश्श्यात्मिका बुद्धिके अधीन रहकर भगवत्सम्बन्धी पवित्र विषयोंके सेवनमें उसी प्रकार संलग्न रहती हैं, जैसे श्रेष्ठ अश्व सावधान सारथिके अधीन रहकर उसके निर्दिष्ट मार्गपर चलते रहते हैं ॥ ६ ॥
सम्बन्ध— पाँचवें मन्त्रके अनुसार जिसके बुद्धि और मन आदि विवेक और संयमसे हीन होते हैं, उसकी क्या गति होती है—इसे बतलाते हैं—
यस्त्वविज्ञानवान् भवत्यमनस्कः सदाशुचिः ।
न स तत्पदमाजोति सः सारं चाधिगच्छति ॥ ७ ॥
यः तु सदा= जो कोई सदा; अविज्ञानवान्= विवेकहीन बुद्धिवाला; अमनस्कः= असंयतचित्त (और); अशुचिः= अपवित्र; भवति= रहता है; सः तत्पदम्= वह उस परमपदको; न आजोति= नहीं पा सकता; च= अपि तु; संसारम् अधिगच्छति= बार-बार जन्म-मृत्युरूप संसार-चक्रमें ही भटकता रहता है ॥ ७ ॥
व्याख्या— जिसकी बुद्धि सदा ही विवेकसे—कर्तव्याकर्तव्यके ज्ञानसे रहित और मनको वशमें रखनेमें असमर्थ रहती है, जिसका मन निग्रहरहित—असंयत है और जिसका विचार दूषित रहता है तथा जिसकी इन्द्रियाँ निरन्तर दुःखाचारमें प्रवृत्त रहती हैं—ऐसे बुद्धिशक्तिसे रहित मन-इन्द्रियोंके वशमें रहनेवाले मनुष्यका जीवन कभी पवित्र नहीं रह पाता और इसलिये वह मानव-शरीरसे प्राप्त होनेयोग्य परमपदको नहीं पा सकता, वरं अपने दुष्कर्मोंके परिणामस्वरूप अनवरत इस संसार-चक्रमें ही भटकता रहता है—कूकर-शूकरादि विभिन्न योनियोंमें जन्मता एवं मरता रहता है ॥ ७ ॥
यस्तु विज्ञानवान् भवति समनस्कः सदा शुचिः ।
स तु तत्पदमाजोति यस्माद् भूयो न जायते ॥ ८ ॥
तु यः सदा= परंतु जो सदा; विज्ञानवान्= विवेकशील बुद्धिसे युक्त; समनस्कः= संयतचित्त (और); शुचिः= पवित्र; भवति= रहता है; सः तु= वह तो; तत्पदम्= उस परमपदको; आजोति= प्राप्त कर लेता है; यस्मात् भूयः= जहाँसे (लौटकर) पुनः; न जायते= जन्म नहीं लेता ॥ ८ ॥