ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 129, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंवल्ल्बी ३ ]
कठोपनिषद्
१२७
व्याख्या —इसके विपरीत जो छठे मन्त्रके अनुसार स्वयं सावधान होकर अपनी बुद्धिको निरन्तर विवेकशील बनाये रखता है और उसके द्वारा मनको रोककर पवित्रभावमें स्थित रहता है अर्थात् इन्द्रियोंके द्वारा भगवान्की आज्ञाके अनुसार पवित्र कर्मोंका निष्कामभावसे आचरण करता है तथा भगवान्को अर्पण किये हुए भोगोंका राग-द्वेषसे रहित हो निष्कामभावसे शरीर-निर्वाहके लिये उपभोग करता रहता है, वह परमेश्वरके उस परमधामको प्राप्त कर लेता है, जहाँसे फिर लौटना नहीं होता ॥ ८ ॥
सम्बन्ध —आठवें मन्त्रमें कही हुई बातको फिरसे स्पष्ट करते हुए रथके रूपकका उपसंहार करते हैं—
विज्ञानसारथिर्यस्तु मनःप्रग्रहवान् नरः । सोऽध्वनः पारमाज्जोति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ ९ ॥
यः नरः=जो (कोई) मनुष्य; विज्ञानसारथिः तु=विवेकशील बुद्धिरूप सारथिसे सम्पन्न (और); मनःप्रग्रहवान्=मनरूप लगामको वशमें रखनेवाला है; सः=वह; अध्वनः=संसारमार्गिके; पारम्=पार पहुँचकर; विष्णोः=सर्वव्यापी परब्रह्म पुरुषोत्तमभगवान्के; तत् परमम् पदम्=उस सुप्रसिद्ध परमपदको; आज्जोति=प्राप्त हो जाता है ॥ ९ ॥
व्याख्या —तृतीय मन्त्रसे नवम मन्त्रतक—सात मन्त्रोंमें रथके रूपकसे यह बात समझायी गयी है कि यह अति दुर्लभ मनुष्य-शरीर जिस जीवात्माको परमात्माकी कृपासे मिल गया है, उसे शीघ्र सचेत होकर भगवत्प्राप्तिके मार्गमें लग जाना चाहिये। शरीर अनित्य है, प्रतिक्षण इसका ह्रास हो रहा है। यदि अपने जीवनके इस अमूल्य समयको पशुओंकी भाँति सांसारिक भोगोंके भोगनेमें ही नष्ट कर दिया गया तो फिर बारम्बार जन्म-मृत्युरूप संसार-चक्रमें घूमनेको बाध्य होना पड़ेगा। जिस महान् कार्यकी सिद्धिके लिये यह दुर्लभ मनुष्य-शरीर मिला था, वह पूरा नहीं होगा। अतः मनुष्यको भगवान्की कृपासे मिली हुई विवेकशक्तिका सदुपयोग करना चाहिये। संसारकी अनित्यताको और इन