ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 130, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
आपातरमणीय विषय-जन्ति सुखोंकी यथार्थ दुःखरूपताको समझकर इनके चिन्तन और उपभोगसे सर्वथा उपरत हो जाना चाहिये। केवल शरीरनिर्वाहके उपयुक्त कर्तव्यकर्माका निष्कामभावसे भगवान्की आज्ञा समझकर अनुष्ठान करते हुए अपनी बुद्धिमें भगवान्के नाम, रूप, लीला, धाम तथा उनकी अलौकिक शक्ति और अहैंतुकी दयापर दृढ़ विश्वास उत्पन्न करना चाहिये और सर्वतोभावसे भगवान्पर ही निर्भर हो जाना चाहिये। अपने मनको भगवान्के तत्त्व-चिन्तनमें, वाणीको उनके गुण-वर्णनमें, नेत्रोंको उनके दर्शनमें तथा कानोंको उनके महिमा-श्रवणमें लगाना चाहिये। इस प्रकार सारी इन्द्रियोंका सम्बन्ध भगवान्से जोड़ देना चाहिये। जीवनका एक क्षण भी भगवान्की मधुर स्मृतिके बिना न बीतने पाये। इसीमें मनुष्य-जीवनकी सार्थकता है। जो ऐसा करता है, वह निश्चय ही परब्रह्म पुरुषोत्तमके अचिन्त्य परमपदको प्राप्त होकर सदाके लिये कृतकृत्य हो जाता है॥ १॥
सम्बन्ध— उपर्युक्त वर्णनमें रथके रूपककी कल्पना करके भगवत्प्राप्तिके लिये जो साधन बतलाया गया, उसमें विवेकशील बुद्धिके द्वारा मनको वशमें करके, इन्द्रियोंको विपरीत मार्गसे हटाकर, भगवत्प्राप्तिके मार्गमें लगानेकी बात कही गयी। इसपर यह जिज्ञासा होती है कि स्वभावसे ही दुष्ट और बलवान् इन्द्रियोंको उनके प्रिय और अभ्यस्त असत्-मार्गसे किस प्रकार हटाया जाय; अतः इस बातका तात्त्विक विवेचन करके इन्द्रियोंको असत्-मार्गसे रोककर भगवान्की ओर लगानेका प्रकार बतलाते हैं—
इन्द्रियेभ्यः परा हार्था अर्थेभ्यश्च परं मनः।
मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेशात्मा महान् परः॥ १०॥
हि इन्द्रियेभ्यः=क्योंकि इन्द्रियोंसे; अर्थाः=शब्दादि विषय; पराः=बलवान् हैं; च=और; अर्थेभ्यः=शब्दादि विषयोंसे; मनः=मन; परम्=पर (प्रबल) है; तु मनसः=और मनसे भी; बुद्धिः=बुद्धि; परा=पर (बलवती) है; बुद्धेः=(तथा) बुद्धिसे; महान् आत्मा=महान् आत्मा (उन सबका स्वामी होनेके कारण); परः=अत्यन्त श्रेष्ठ और बलवान् है॥ १०॥