ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished548 पृष्ठ
पृष्ठ 13, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 13
( ११ )
| मन्त्र | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| १५-१६ | प्रजापति-व्रतका फल—प्रजाकी उत्पत्ति तथा ब्रह्मचर्य, तप और सत्य-पालनका एवं सब प्रकारके दोषोंसे रहित होनेका फल—ब्रह्मलोककी प्राप्ति | ..... १८४ |
( द्वितीय प्रश्न )
| १ | प्रजाके आधारके विषयमें भाग्यवके तीन प्रश्न | ..... १८६ |
|---|---|---|
| २-४ | पिप्पलादद्वारा उत्तरमें शरीरके धारक और प्रकाशक देवीका तथा उनमें प्राणदेवकी श्रेष्ठताका निरूपण | ..... १८६ |
| ५-६ | प्राणरूपसे परमेश्वरकी उपासना करनेके लिये सर्वात्मरूपसे उसके महत्त्वका वर्णन | ..... १८९ |
| ७-१३ | प्राणकी स्तुति | ..... १९० |
( तृतीय प्रश्न )
| १ | प्राणकी उत्पत्ति आदिके विषयमें आश्वलायनके छः प्रश्न | ..... १९४ |
|---|---|---|
| २-३ | पिप्पलादमुनिद्वारा दो प्रश्नोंके उत्तरमें—परमात्मासे प्राणकी उत्पत्तिका और संकल्पसे प्राणके शरीरमें प्रवेश करनेका कथन | ..... १९५ |
| ४-६ | तीसरे प्रश्नके उत्तरमें मुख्य प्राण, अपान, समानके वासस्थान और कार्यका तथा व्यानकी गतिका वर्णन | ..... १९६ |
| ७ | चौथे प्रश्नके उत्तरमें उदानके स्थान और कार्यका एवं मृत्युके बाद परलोकमें ले जानेका कथन | ..... १९८ |
| ८-९ | पाँचवें और छठे प्रश्नके उत्तरमें जीवात्माके प्राण और इन्द्रियोंसहित दूसरे शरीरमें जानेका उल्लेख | ..... १९९ |
| १० | चौथे प्रश्नके उत्तरका पुनः स्पष्टीकरण | ..... २०१ |
| ११-१२ | प्राणविषयक ज्ञानका लौकिक और पारलौकिक फल | ..... २०१ |
( चतुर्थ प्रश्न )
| १ | गार्ग्यमुनिद्वारा जीवात्मा और परमात्माके विषयमें पाँच प्रश्न | ..... २०३ |
|---|---|---|
| २ | पिप्पलादमुनिद्वारा पहले प्रश्नके उत्तरमें सुषुप्तिके समय इन्द्रियोंके शयन (विलीन होने)-का स्थान मनको बतलाना | ..... २०३ |
| ३-४ | दूसरे प्रश्नके उत्तरमें सुषुप्तिकालमें पाँच प्राणरूप अग्रियोंके जागते रहनेका कथन तथा मनकी स्थितिका वर्णन | ..... २०५ |
| ५ | तीसरे प्रश्नके उत्तरमें स्वप्नावस्थामें जीवात्माके ही द्वारा घटनाओंके अनुभव करनेका उल्लेख | ..... २०७ |