भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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मन्त्रविषयपृष्ठ
१५-१६प्रजापति-व्रतका फल—प्रजाकी उत्पत्ति तथा ब्रह्मचर्य, तप और सत्य-पालनका एवं सब प्रकारके दोषोंसे रहित होनेका फल—ब्रह्मलोककी प्राप्ति..... १८४

( द्वितीय प्रश्न )

प्रजाके आधारके विषयमें भाग्यवके तीन प्रश्न..... १८६
२-४पिप्पलादद्वारा उत्तरमें शरीरके धारक और प्रकाशक देवीका तथा उनमें प्राणदेवकी श्रेष्ठताका निरूपण..... १८६
५-६प्राणरूपसे परमेश्वरकी उपासना करनेके लिये सर्वात्मरूपसे उसके महत्त्वका वर्णन..... १८९
७-१३प्राणकी स्तुति..... १९०

( तृतीय प्रश्न )

प्राणकी उत्पत्ति आदिके विषयमें आश्वलायनके छः प्रश्न..... १९४
२-३पिप्पलादमुनिद्वारा दो प्रश्नोंके उत्तरमें—परमात्मासे प्राणकी उत्पत्तिका और संकल्पसे प्राणके शरीरमें प्रवेश करनेका कथन..... १९५
४-६तीसरे प्रश्नके उत्तरमें मुख्य प्राण, अपान, समानके वासस्थान और कार्यका तथा व्यानकी गतिका वर्णन..... १९६
चौथे प्रश्नके उत्तरमें उदानके स्थान और कार्यका एवं मृत्युके बाद परलोकमें ले जानेका कथन..... १९८
८-९पाँचवें और छठे प्रश्नके उत्तरमें जीवात्माके प्राण और इन्द्रियोंसहित दूसरे शरीरमें जानेका उल्लेख..... १९९
१०चौथे प्रश्नके उत्तरका पुनः स्पष्टीकरण..... २०१
११-१२प्राणविषयक ज्ञानका लौकिक और पारलौकिक फल..... २०१

( चतुर्थ प्रश्न )

गार्ग्यमुनिद्वारा जीवात्मा और परमात्माके विषयमें पाँच प्रश्न..... २०३
पिप्पलादमुनिद्वारा पहले प्रश्नके उत्तरमें सुषुप्तिके समय इन्द्रियोंके शयन (विलीन होने)-का स्थान मनको बतलाना..... २०३
३-४दूसरे प्रश्नके उत्तरमें सुषुप्तिकालमें पाँच प्राणरूप अग्रियोंके जागते रहनेका कथन तथा मनकी स्थितिका वर्णन..... २०५
तीसरे प्रश्नके उत्तरमें स्वप्नावस्थामें जीवात्माके ही द्वारा घटनाओंके अनुभव करनेका उल्लेख..... २०७