ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 132, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
महतः=उस जीवात्मासे; परम्=बलवती है; अव्यक्तम्=भगवान्की अव्यक्त मायाशक्ति; अव्यक्तात्=अव्यक्त मायासे भी; परः=श्रेष्ठ है; पुरुषः=परमपुरुष (स्वयं परमेश्वर); पुरुषात्=परमपुरुष भगवान्से; परम्=श्रेष्ठ और बलवान्; किञ्चित्=कुछ भी; न=नहीं है; सा काष्ठा=वही सबकी परम अवधि (और); सा परा गतिः=वही परम गति है ॥ ११ ॥
व्याख्या —इस मन्त्रमें ‘अव्यक्त’ शब्द भगवान्की उस त्रिगुणमयी दैवी मायाशक्तिके लिये प्रयुक्त हुआ है, जो गीतामें दुरत्यय (अतिदुस्तर) बतायी गयी है (गीता ७।१४) तथा जिससे मोहित हुए जीव भगवान्को नहीं जानते (गीता ७।१३)। यही जीवात्मा और परमात्माके बीचमें परदा है, जिसके कारण जीव सर्वव्यापी अन्तर्यामी परमेश्वरको नित्य समीप होनेपर भी नहीं देख पाता। इसे इस प्रकारणमें जीवसे भी बलवान् बतलानेका यह भाव है कि जीव अपनी शक्तिसे इस मायाको नहीं हटा सकता, भगवान्की शरण ग्रहण करनेपर भगवान्की दयाके बलसे ही वह इससे पार हो सकता है (गीता ७।१४)। यहाँ ‘अव्यक्त’ शब्दसे सांख्यमतावलम्बियोंका ‘प्रधान तत्त्व’ नहीं ग्रहण करना चाहिये; क्योंकि उनके मतमें ‘प्रधान’ स्वतन्त्र है, वह आत्मासे पर नहीं है; तथा आत्माको भोग और मुक्ति—दोनों वस्तुएँ देकर उसका प्रयोजन सिद्ध करनेवाला है। परंतु उपनिषद् और गीतामें इस अव्यक्त प्रकृतिको कहीं भी मुक्ति देनेमें समर्थ नहीं माना है। अतः इस मन्त्रका तात्पर्य यह है कि इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि—इन सबपर आत्माका अधिकार है; अतः यह स्वयं उनको वशमें करके भगवान्की ओर बढ़ सकता है। परंतु इस आत्मासे भी बलवान् एक और तत्त्व है, जिसका नाम ‘अव्यक्त’ है। कोई उसे प्रकृति और कोई माया भी कहते हैं। इसीसे सब जीवसमुदाय मोहित होकर उसके वशमें हो रहा है। इसको हटाना जीवके अधिकारकी बात नहीं है; अतः इससे भी बलवान् जो इसके स्वामी परमपुरुष परमेश्वर हैं—जो बल, क्रिया और ज्ञान आदि सभी शक्तियोंकी अन्तिम अवधि और परम आधार हैं—उन्हींकी शरण लेनी चाहिये। जब वे दया करके इस मायारूप परदेको स्वयं हटा लेंगे, तब उसी क्षण वही भगवान्की प्राप्ति हो जायगी; क्योंकि वे तो सदासे ही सर्वत्र विद्यमान हैं ॥ ११ ॥