भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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वल्ल्बी ३ ]

कठोपनिषद्

१३१

सम्बन्ध—यही भाव अगले मन्त्रमें स्पष्ट करते हैं—

एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्था न प्रकाशते।

दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ॥ १२ ॥

एषः आत्मा=यह सबका आत्मरूप परमपुरुष; सर्वेषु भूतेषु=समस्त प्राणियोंमें रहता हुआ भी; गूढः=मायाके परदेमें छिपा रहनेके कारण; न प्रकाशते=सबके प्रत्यक्ष नहीं होता; तु सूक्ष्मदर्शिभिः=केवल सूक्ष्मतत्त्वोंको समझनेवाले पुरुषोंद्वारा ही; सूक्ष्मया अग्र्यया बुद्ध्या=अति सूक्ष्म तीक्ष्ण बुद्धिसे; दृश्यते=देखा जाता है ॥ १२ ॥

व्याख्या—ये परब्रह्म पुरुषोत्तमभगवान् सबके अन्तर्धामी हैं, अतः सब प्राणियोंके हृदयमें विराजमान हैं, परंतु अपनी मायाके परदेमें छिपे हुए हैं, इस कारण उनके जाननेमें नहीं आते। जिन्होंने भगवान्का आश्रय लेकर अपनी बुद्धिको तीक्ष्ण बना लिया है, वे सूक्ष्मदर्शी ही भगवान्की दयासे सूक्ष्मबुद्धिके द्वारा उन्हें देख पाते हैं ॥ १२ ॥

सम्बन्ध—विवेकशील मनुष्यको भगवान्के शरण होकर किस प्रकार भगवान्की प्राप्तिके लिये साधन करना चाहिये?—इस जिज्ञासापर कहते हैं—

यच्छेद्वाद्भुमन्सी प्राज्ञस्तद्यच्छेञ्ज्ञान आत्मनि।

ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेत्तद्यच्छेच्छान्त आत्मनि ॥ १३ ॥

प्राज्ञः=बुद्धिमान् साधकको चाहिये कि; वाक्=(पहले) वाक् आदि (समस्त इन्द्रियों) को; मनसी=मनमें; यच्छेत्=निरुद्ध करे; तत्=उस मनको; ज्ञाने आत्मनि=ज्ञानस्वरूप बुद्धिमें; यच्छेत्=विलीन करे; ज्ञानम्=ज्ञानस्वरूप बुद्धिको; महति आत्मनि=महान् आत्मामें; नियच्छेत्=विलीन करे; (और); तत्=उसको; शान्ते आत्मनि=शान्तस्वरूप परमपुरुष परमात्मामें; यच्छेत्=विलीन करे ॥ १३ ॥

व्याख्या—बुद्धिमान् मनुष्यको उचित है कि वह पहले तो वाक् आदि इन्द्रियोंको बाह्य विषयोंसे हटाकर मनमें विलीन कर दे अर्थात् इनकी ऐसी स्थिति कर दे कि इनकी कोई भी क्रिया न हो—मनमें विषयोंकी स्फुरणा न