ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 134, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
रहे। जब यह साधन भलीभाँति होने लगे, तब मनको ज्ञानस्वरूप बुद्धिमें विलीन कर दे अर्थात् एकमात्र विज्ञानस्वरूप निश्चयात्मिका बुद्धिकी वृत्तिके सिवा मनकी भिन्न सत्ता न रहे, किसी प्रकारका अन्य कोई भी चिन्तन न रहे। जब यहाँतक दृढ़ अभ्यास हो जाय, तदनन्तर उस ज्ञानस्वरूपा बुद्धिको भी जीवात्माके शुद्ध स्वरूपमें विलीन कर दे। अर्थात् ऐसी स्थितिमें स्थित हो जाय, जहाँ एकमात्र आत्मतत्त्वके सिवा—अपनेसे भिन्न किसी भी वस्तुकी सत्ता या स्मृति नहीं रह जाती। इसके पश्चात् अपने-आपको भी पूर्व निश्चयके अनुसार शान्त आत्मरूप परब्रह्म पुरुषोत्तममें विलीन कर दे॥ १३ ॥
सम्बन्ध— इस प्रकार परमात्माके स्वरूपका वर्णन करके तथा उसकी प्राप्तििका महत्त्व और साधन बतलाकर अब श्रुति मनुष्योंको सावधान करती हुई कहती है—
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरात्रिबोधत। क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्ग पथस्तत्कवयो वदन्ति ॥ १४ ॥
उत्तिष्ठत =(हे मनुष्यो!) उठो; जाग्रत =जागो (सावधान हो जाओ और); वरात्र प्राप्य =श्रेष्ठ महापुरुषोंको पाकर—उनके पास जाकर (उनके द्वारा); निबोधत =उस परब्रह्म परमेश्वरको जान लो (क्योंकि); कवयः =त्रिकालज्ञ ज्ञानीजन; तत् पथः =उस तत्त्वज्ञानके मार्गको; क्षुरस्य =छूरेकी; निशिता दुरत्यया =तीक्ष्ण की हुई दुस्तर; धारा [इब]=धारके सद्गुण; दुर्गम् =दुर्गम (अत्यन्त कठिन); वदन्ति =बतलाते हैं॥ १४ ॥
व्याख्या— हे मनुष्यो! तुम जन्म-जन्मान्तरसे अज्ञाननिद्रामें सो रहे हो। अब तुम्हें परमात्माकी दयासे यह दुर्लभ मनुष्य-शरीर मिला है। इसे पाकर अब एक क्षण भी प्रमादमें मत खोओ। शीघ्र सावधान हो जाओ। श्रेष्ठ महापुरुषोंके पास जाकर उनके उपदेशद्वारा अपने कल्याणका मार्ग और परमात्माका रहस्य समझ लो। परमात्माका तत्त्व बड़ा गहन है; उसके स्वरूपका ज्ञान, उसकी प्राप्तििका मार्ग महापुरुषोंकी सहायता और परमात्माकी कृपाके बिना वैसा ही दुस्तर है, जिस प्रकार छूरेकी तेज धारपर चलना। ऐसे दुस्तर मार्गसे सुगमतापूर्वक पार