भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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बल्ली ३ ]

कठोपनिषद्

१३३

होनेका सरल उपाय वे अनुभवी महापुरुष ही बता सकते हैं, जो स्वयं इसे पार कर चुके हैं ॥ १४ ॥

सम्बन्ध —ब्रह्मप्राप्तिका मार्ग इतना दुस्तर क्यों है ? इस जिज्ञासापर परमात्माके स्वरूपका वर्णन करते हुए उसको जाननेका फल बतलाते हैं—

अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं

तथारसं नित्यमगन्धवच्च यत्।

अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं

निचाव्य तन्मृत्युमुखात् प्रमुच्यते ॥ १५ ॥

यत्=जो; अशब्दम्=शब्दरहित; अस्पर्शम्=स्पर्शरहित; अरूपम्=रूपरहित; अरसम्=रसरहित; च=और; अगन्धवत्=बिना गन्धवाला है; तथा=तथा (जो); अव्ययम्=अविनाशी; नित्यम्=नित्य; अनादि=अनादि; अनन्तम्= अनन्त (असीम); महतः परम्=महान् आत्मासे श्रेष्ठ (एवं); ध्रुवम्=सर्वथा सत्य तत्त्व है; तत्=उस परमात्माको; निचाव्य=जानकर (मनुष्य); मृत्युमुखात्=मृत्युके मुखसे; प्रमुच्यते=सदाके लिये छूट जाता है ॥ १५ ॥

व्याख्या —इस मन्त्रमें उस परब्रह्म परमात्माको प्राकृत शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्धसे रहित बतलाकर यह दिखलाया गया है कि सांसारिक विषयोंको ग्रहण करनेवाली इन्द्रियोंकी वहाँ पहुँच नहीं है। वे नित्य, अविनाशी, अनादि और असीम हैं। जीवात्मासे भी श्रेष्ठ और सर्वथा सत्य हैं। उन्हें जानकर मनुष्य सदाके लिये जन्म-मरणसे छूट जाता है ॥ १५ ॥

सम्बन्ध —यहाँतक एक अध्यायके उपदेशको पूर्ण करके अब इस आख्यानके श्रवण और वर्णनका माहात्म्य बतलाते हैं—

नाचिकेतमुपाख्यानं मृत्युप्रोक्तः सनातनम्।

उक्त्वा श्रुत्वा च मेधावी ब्रह्मलोके महीयते ॥ १६ ॥

मेधावी=बुद्धिमान् मनुष्य; मृत्युप्रोक्तम्=यमराजके द्वारा कहे हुए;